आलोचना और अनुसंधान - criticism and research

आलोचना और अनुसंधान अपनी प्रकृति और व्यवहार में एक दूसरे से भिन्न हैं। परन्तु साहित्यिक आलोचक कभी-कभी अनुसंधानकर्त्ता का कार्य भी करता है तथा अज्ञात और अप्रकाशित रचनाओं (पाण्डुलिपियों) का सम्पादन करके उन्हें प्रकाश में लाता है। इसमें आलोचक की विलक्षण योग्यता कृति को सामान्य जन के ध्यान में लाने के अति साधारण आलोचकीय कार्य में होता है, लेकिन यह बहुत महत्त्वपूर्ण आलोचना-कर्म है। 'पृथ्वीराज रासो' से लेकर 'सीमतनी उपदेश तक कितनी ही रचनाएँ आलोचना के इसी कार्य के परिणामस्वरूप प्रकाश में आई और उनका साहित्यिक मूल्य पहचाना जा सका।


आलोच्य साहित्य के सम्बन्ध में नवीन तथ्यों की खोज तथा नये साक्ष्यों और नवीन परिस्थितियों में उस साहित्य के सम्बन्ध में उपलब्ध पुराने निष्कर्षों के स्थान पर नये निष्कर्षों की स्थापना करना अनुसंधान का कार्य हैं। अनुसंधान की प्रक्रिया अनुसंधान पद्धति के अन्तर्गत तथ्यों, तर्कों और विश्लेषण पर आधारित होती हैं । आलोचना के अन्तर्गत आलोचक की वैचारिक दृष्टि, उसका आलोचकीय विवेक और रुचि आदि कृति की व्याख्या और मूल्यांकन के आधार होते हैं। अनुसंधान से प्राप्त निष्कर्ष कृति की व्याख्या और मूल्यांकन में सहायक हो सकते हैं।