रीतिकालीन काव्यशास्त्र पर आधारित आलोचना - criticism based on ritual poetics
द्विवेदी युग में रीतिबद्ध काव्य-रुचि वाले आलोचकों ने रीति साहित्य की व्याख्या और कवियों की तुलनात्मक समीक्षा प्रस्तुत की। इनमें मिश्र बन्धु पण्डित कृष्णबिहारी मिश्र, पण्डित पद्मसिंह शर्मा और लाला भगवानदीन के नाम प्रमुख हैं।
(1) मिश्र बन्धु
हिन्दी आलोचना के विकास में मिश्र बन्धुओं- श्री गणेश बिहारी मिश्र, रावराजा श्याम बिहारी मिश्र और रायबहादुर शुकदेव बिहारी मिश्र का ऐतिहासिक योगदान है। इनका ग्रन्थ 'हिन्दी नवरत्न' कविता के सम्बन्ध में उनकी समझ का प्रमाण है। इसकी भूमिका में समालोचना के उद्देश्य और प्रकार्य बताते हुए लिखा है कि "समालोचना केवल किसी कवि का हाल ही नहीं बताती,
वरन् साधारण पाठक-समाज में औचित्य भी बढ़ाती है।" इससे पाठकों को उचित और उपयोगी रचनाओं के चुनाव में सहायता मिलती है और वे अच्छे-बुरे का अन्तर समझ कर सही निर्णय कर सकें। इसलिए आलोचक का "कर्तव्य है कि वह ग्रन्थों के ठीक-ठीक गुण-दोष बताकर ऐसे मनुष्यों की रुचियों की भी उन्नति करे।" यह ग्रन्थ हिन्दी में तुलनात्मक आलोचना का प्रारम्भिक प्रयास है। इसमें कवियों को श्रेणियों में बाँटकर उनकी श्रेष्ठता और निकृष्टता दर्शाई गई है। देव को बिहारी से बड़ा कवि सिद्ध करने के प्रयासों ने हिन्दी जगत् में एक विवाद खड़ा कर दिया।
अपने दूसरे ग्रन्थ 'मिश्रबन्धु विनोद' में मिश्र बन्धुओं ने जिस परिश्रम से कवियों का परिचय और श्रेणी- विभाग प्रस्तुत किया है, वह साहित्य के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।
अपने समकालीन कवि श्रीधर पाठक पर भी मिश्र बन्धुओं ने एक स्वतन्त्र लेख लिखा था। इस लेख में श्रीधर पाठक की कविताओं में स्वाभाविकता की प्रशंसा की है, परन्तु उन्हें छन्दोभंग तथा समस्यापूर्ति और चित्रकाव्य करने का दोषी भी बताया है । इन आलोचनाओं में उनके दृष्टिकोण की उदारता और नये विचारों के प्रति आकर्षण को देखा जा सकता है। परन्तु उनकी रुचि और काव्य मूल्य रीतिकालीन काव्यशास्त्र पर आधारित थे। उनमें साहित्य के सम्बन्ध में किसी सामाजिक दृष्टि का अभाव था, इसलिए कृति की समीक्षा में उन्होंने विशुद्ध साहित्यिक प्रतिमानों को ही आधार बनाया । उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि की कहीं-कहीं चर्चा तो की लेकिन उसे अपने समीक्षादर्शों में शामिल नहीं किया।
(2) पण्डित कृष्णबिहारी मिश्र
पण्डित कृष्णबिहारी मिश्र 'आनन्द प्रदान करना' ही कविता का मुख्य उद्देश्य मानते थे। उनके अनुसार आनन्द रस के परिपाक से प्राप्त होता है और रसों का राजा शृंगार है, अतः शृंगार रस का कवि श्रेष्ठ कवि हुआ। 'देव और बिहारी' पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि "कविता के लिए केवल रस-परिपाक चाहिए। उपयोगितावाद के चक्कर में डालकर ललित कला का सौन्दर्य नष्ट करना ठीक नहीं।" 'मतिराम ग्रन्थावली' की भूमिका में वे लिखते हैं कि "कविता के सभी प्रयोजनों में आनन्द का ही बोलबाला है।" यहाँ भी उन्होंने शृंगार रस की श्रेष्ठता और कविता में उसकी अनिवार्यता को स्थापित किया है।
मिश्र जी की जीवन-दृष्टि सामन्तवादी और आलोचना-दृष्टि रीतिवादी थी। 'मतिराम ग्रन्थावली' की भूमिका में शृंगारिक कविता की पैरवी करते हुए उन्होंने लिखा है कि "विषय-रस में सराबोर कविता में रमणीयता है, इसलिए चाहे वह उपयोगिनी न हो और चाहे उसके द्वारा समाज में किसी प्रकार के कुरुचि के भावों को आश्रय मिला हो, परन्तु वह कविता अवश्य है। कविता क्षेत्र से उसका बहिष्कार नहीं किया जा सकता।" उन्होंने यह भी लिख दिया कि "यदि विषय प्रेम पर कविता लिखने वाले कवियों का भी अभाव हो गया होता तो संसार से काव्यलोक का सदा के लिए विच्छेद हो गया होता।"
स्पष्ट है कि उनकी दृष्टि शृंगारिक कवियों को छोड़ कर अन्य कवियों पर गई ही नहीं। उनकी आलोचना में भाषा को लेकर एक स्पष्ट दृष्टि है, जिसमें आधुनिकता दिखाई देती हैं। मिश्र जी की भाषा प्रायः आडम्बरहीन और स्वाभाविक है। उसमें सरलता और सहजता के साथ अभिव्यक्ति की स्पष्टता दृष्टिगोचर होती है। भाषा सम्बन्धी इस रुख के कारण कहीं-कहीं आधुनिक जैसी लगने पर भी मूलतः उनकी आलोचना रीतिबद्ध संस्कारों से ग्रसित है।
(3) पण्डित पद्मसिंह शर्मा
पण्डित पद्मसिंह शर्मा प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी, फारसी और उर्दू साहित्य के ज्ञाता थे। वे रीतिकालीन काव्य के प्रेमी थे। उनके काव्य-संस्कार रीतिकालीन और आलोचना- दृष्टि परम्परागत थी।
वे कविता में चमत्कार प्रदर्शन के कायल थे। जहाँ चमत्कार दिखाई दिया वहाँ उनकी अपनी भाषा चमत्कारपूर्ण हो जाती थी और वे उसी अंदाज़ में कवि की प्रशंसा कर देते थे। प्राचीन भावों को नये शब्दों में प्रस्तुत कर चमत्कार प्रदर्शित करने वाला कवि उन्हें महाकवि लगता था । पण्डित शर्मा रीतिकालीन काव्य के रसिक थे, इसलिए कविता में सरसता को विषय-वस्तु और रूप-रचना से अधिक महत्त्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने खड़ी बोली की कविता को भावहीन, निर्जीव, नीरस और कर्ण कटु कह कर उसकी आलोचना की है। शर्मा जी ने तुलनात्मक आलोचना को इतना अधिक महत्त्व है दिया कि तुलना ही उनके लिए साध्य हो गई, काव्य या कवियों के साहित्यिक मूल्यांकन का कार्य पीछे छूट गया।
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