आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जायसी की आलोचना - Criticism of Jayasi by Acharya Ramchandra Shukla
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी साहित्य में मालिक मुहम्मद जायसी के प्रतिष्ठापक आलोचक हैं। यह सच है कि तुलसी उनके प्रिय और आदर्श कवि हैं और उनके आलोचना-सिद्धान्तों के विकास में तुलसी के काव्य की आधारभूत भूमिका है, लेकिन जिस तन्मयता और लगन के साथ उन्होंने जायसी की आलोचना की है वैसी अन्य कवियों की नहीं की है। जायसी सूफ़ी कवि थे। शुक्ल जी ने उन्हें सूर और तुलसी के साथ भक्त कवियों की कोटि में रखकर उनका मूल्यांकन किया है और तुलसी और सूर के बाद हिन्दी का तीसरा श्रेष्ठ कवि बताया है।
उन्होंने 'जायसी ग्रन्थावली' का सम्पादन कर उसका प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत किया। इतना ही नहीं, उन्होंने जायसी के काव्य का विवेचन कर हिन्दी जगत् को इस महान् कवि का महत्त्व भी बताया। जायसी के ग्रन्थ 'पद्मावत' को शुक्ल जी ने न केवल पसंद किया बल्कि उसे हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ प्रबन्ध-काव्यों की श्रेणी में रख कर उसका साहित्यिक मूल्य उद्घाटित किया। पद्मावत लोक कथा पर आधारित काव्य है। प्रबन्ध काव्य की सभी कसौटियों पर पद्मावत की परीक्षा करने के बाद शुक्ल जी ने इस काव्य को हिन्दी साहित्य में 'रामचरित मानस' के समकक्ष स्थान दिया है।
पद्मावत प्रेमकाव्य है और जायसी रहस्यवादी कवि भी हैं। शुक्ल जी रहस्यवाद के विरोधी आलोचक हैं। लेकिन उन्होंने सूफियों की चिन्तन पद्धति को सर्वबाद से प्रभावित बताया और कहा कि सूफी कवि इस जगत् को ही सत्य मानते थे और इसी के नानाविध रूपों का वर्णन अपनी कविता में करते थे। शुक्ल जी ने ज्ञानाश्रयी निर्गुणधारा के कवियों के रहस्यवाद से जायसी के रहस्यवाद को अलग मानते हुए लिखा है कि "कबीर में जो रहस्यवाद मिलता है वह बहुत कुछ उन पारिभाषिक संज्ञाओं के आधार पर है जो वेदान्त और हठयोग से निर्दिष्ट हैं पर इन प्रेम-प्रबन्धकारों ने जिस रहस्यवाद का आभास दिया है उसके संकेत स्वाभाविक और मर्मस्पर्शी हैं।"
(- 'हिन्दी साहित्य का इतिहास') शुक्ल जी जायसी की भावुकता को उच्च कोटि की भावुकता मानते हैं इसलिए जायसी के रहस्यवाद को वे कबीर के रहस्यवाद से भिन्न अधिक रमणीय और अद्वैती रहस्यवाद कहकर उसकी प्रशंसा करते हैं। उन्होंने लिखा है कि "जायसी कवि थे और भारतवर्ष के कवि थे। भारतीय पद्धति के कवियों की दृष्टि फ़ारसवालों की अपेक्षा प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों पर कहीं अधिक विस्तृत तथा उनके मर्मस्पर्शी स्वरूपों का आभास देने के लिए जायसी बहुत ही रमणीय और मर्मस्पर्शी दृश्यसंकेत उपस्थित करने में समर्थ हुए हैं।" (- 'जायसी ग्रन्थावली) शुक्ल जी ने दिखाया है कि जायसी ने प्रकृति के विभिन्न रूपों और घटनाओं का उपयोग मूल आभ्यन्तरिक जगत् का प्रतिबिम्ब-सा दिखाते हुए किया है।
शुक्ल जी को जायसी का प्रेमवर्णन कहीं-कहीं लौकिक पक्ष में अलौकिक की ओर संकेत करता जान पड़ता है। पद्मावत में 'रतिभाव' वर्णन पर शुक्ल जी कहते हैं कि "एक प्रबन्ध के भीतर शुद्ध भाव के स्वरूप का ऐसा उत्कर्ष जो पार्थिव प्रतिबन्धों से परे होकर आध्यात्मिक क्षेत्र में जाता दिखाई पड़े, जायसी का मुख्य लक्ष्य है। क्या संयोग, क्या वियोग, दोनों में कवि प्रेम के उस आध्यात्मिक स्वरूप का आभास देने लगता है, जगत् के समस्त व्यापार जिसकी छाया से प्रतीत होते हैं। वियोगपक्ष में जब कवि लीन होता है, तब सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र सब उसी परम विरह में जलते और चक्कर लगाते दिखाई देते हैं।" (- 'जायसी ग्रन्थावली')
पद्मावत में नागमती के विरह-वर्णन को शुक्ल जी ने हिन्दी साहित्य में एक अद्वितीय वस्तु कहकर उसकी व्याख्या की है। नागमती के आँसुओं से सारी सृष्टि भीगी हुई है। नागमती की वियोगदशा का विस्तार मनुष्य जाति से आगे बढ़कर पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों तक देखा जा सकता है। जायसी की भावुकता अपने चरम पर पहुँच जाती है जब रानी नागमती विरह दशा में अपना रानीपन भूल कर स्वयं को एक साधारण स्त्री के रूप में देखती है। इस लोक-सामान्य भावभूमि पर आकर नागमती के विरह वाक्य सभी के हृदय को समान रूप से स्पर्श करते हैं। इसलिए शुक्ल जी कहते हैं कि पद्मावत में विप्रलम्भ शृंगार की ही प्रधानता है। ( 'जायसी ग्रन्थावली')
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