नन्ददुलारे वाजपेयी की आलोचना दृष्टि - Criticism of Nanddulare Vajpayee

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी वाजपेयी ने आलोचना के सिद्धान्त प्रतिपादित करने या साहित्य और समीक्षा सम्बन्धी अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए किसी स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना नहीं की है। उनके समीक्षादर्शों का निर्माण उनकी व्यावहारिक समीक्षा के अन्तर्गत ही हुआ है। उनकी साहित्य और समीक्षा सम्बन्धी मान्यताओं का निरूपण उनके साहित्यिक निबन्धों और निबन्ध-संग्रहों की भूमिकाओं में सामने आता है। उनकी अधिकांश पुस्तकें उनके निबन्धों के अलग-अलग संग्रह हैं। उनकी आलोचना का क्षेत्र बहुत व्यापक है। उन्होंने मध्ययुगीन और आधुनिक काव्य तथा गद्य की सभी विधाओं के साहित्य को अपने विवेचन का विषय बनाया है।

उनकी गद्य साहित्य की आलोचना भी गम्भीर आलोचना है, परन्तु उनका मुख्य क्षेत्र काव्यालोचना है। वाजपेयी जी की आलोचना -दृष्टि का विकास निरन्तर होता रहा है। उन्होंने समय-समय पर अपने पूर्ववर्ती लेखन का पुनरावलोकन किया है और साहित्यिक और सामाजिक परिवर्तनों की दृष्टि से अपनी मान्यताओं में भी संशोधन और परिवर्तन किया है।


आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की आलोचना 'हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी', 'जयशंकर प्रसाद', 'महाकवि सूरदास', 'प्रेमचंद', 'आधुनिक साहित्य', 'कवि निराला',

'नया साहित्य : नये प्रश्न' आदि पुस्तकों के रूप में उपलब्ध है। इनमें उन्होंने हिन्दी साहित्य का मूल्यांकन किया और अपने आलोचना- सिद्धान्त विकसित किए | वे साहित्य के मूल्यांकन में स्वच्छन्दता को उच्चतम मूल्य मानते हैं, इसलिए उनकी आलोचना को 'स्वच्छन्दतावादी आलोचना' कहा जाता है। उन्होंने कविता के इतर बाह्य मानों की तुलना में कविता के आन्तरिक तत्त्वों और 'काव्य-सौष्ठव' पर ही अधिक बल दिया है, इसलिए उनकी आलोचना को 'सौष्ठववादी आलोचना' भी कहा जाता है। अपने विचारों में भौतिकवाद और भाववाद का समन्वय करने के कारण कुछ आलोचकों ने इनकी आलोचना को 'समन्वयवादी आलोचना' भी कहा है। उनकी साहित्यिक मान्यताएँ उनकी व्यावहारिक आलोचना की उपलब्धियाँ ही हैं। इस प्रक्रिया में उन्होंने साहित्य के गम्भीर और मूलभूत तत्त्वों का विश्लेषण किया है। आइए, इन्हें समझने का प्रयास करें।