नन्ददुलारे वाजपेयी की आलोचना: प्रेरणा और प्रतिमान - Criticism of Nanddulare Vajpayee: Inspiration and Paradigm

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी आलोचना को न तो रचना की अनुगामिनी मानते हैं और न ही साहित्य- सृजन को नियमित नियन्त्रित करने वाली कोई विधा मानते हैं। उनके अनुसार आलोचना वस्तुतः "रचनात्मक साहित्य की प्रिय सखी, शुभैषिणी सेविका और सहृदय स्वामिनी कही जा सकती है।" (- 'आधुनिक साहित्य') वाजपेयी जी के अनुसार प्रधान वस्तु साहित्य है और आलोचना का मूल्य साहित्य के सम्यक् मूल्यांकन में ही निहित है। आलोचना के कुछ प्रतिमान अवश्य होने चाहिए, लेकिन उनका उपयोग सहृदयतापूर्वक रचना के सही अर्थ- प्रकाशन में किया जाना चाहिए। वाजपेयी जी ने साहित्य के मूल्यांकन में अपनी कसौटियों को ही आधार बनाया है। इसलिए उनकी आलोचना को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए उनकी कुछ साहित्यिक मान्यताओं को जान लेना उचित होगा।