नन्ददुलारे वाजपेयी की आलोचना : महाकवि सूरदास - Criticism of Nanddulare Vajpayee: Mahakavi Surdas
यद्यपि वाजपेयी जी आलोचना का मुख्य क्षेत्र आधुनिक साहित्य है, लेकिन उन्होंने 'सूरसागर' का सम्पादन किया था और उनके काव्य को समझा था इसलिए सूरदास के काव्य ने उनके काव्य-संस्कारों को प्रभावित किया था।
सूर की प्रेम-भक्ति
सूर की प्रेम-भक्ति की व्यापकता का उल्लेख करते हुए वाजपेयी जी कहते हैं कि सूरदास ने कृष्ण को बहुनायक के रूप में प्रस्तुत किया है। 'सूरसागर' में कृष्ण व्यापक प्रकृति में प्रवेश करते हैं। यहाँ वे माता को पुत्र रूप से, मित्रों को सखा रूप से, प्रेमिकाओं को प्रियतम रूप से आह्लादित करते हैं।
अपने विविध रूपों में सूर के कृष्ण समस्त ब्रज-वासियों को अपने प्रेम में बाँधे हुए हैं। "ब्रज के समस्त जीवन का सार-रस माता के हृदय का रस, प्रियतमा गोपियों के संयोग-वियोग का रस जो जो सम्पूर्ण श्रीकृष्ण रस है, यही सूरसागर है। सूरदास जी की यही प्रेममयी भक्ति है । यह अत्यन्त मनोरम किन्तु रहस्यपूर्ण कथा सूरसागर कि निजी विशेषता है। सारा ब्रज- मण्डल श्री कृष्ण के सम्बन्ध से सुखी होता, उनके वियोग से दुःख में डूबता और प्रत्येक प्रकार से उनका ही अनुवर्ती बनता है।" (- 'महाकवि सूरदास') सूरदास का मन प्रेम चर्चा के अतिरिक्त किसी बात में नहीं लगता है ।
इसलिए उन्होंने उद्भव के ज्ञान की बातों को बहुत कम स्थान दिया है और गोपियों द्वारा उसके उपहास में प्रेम की महत्ता बताई है। सूरदास ने अपने हृदय के आनन्द और उल्लास को दबाकर कृष्ण के चरित्र का वर्णन नहीं किया हैं। उनकी प्रेमातुर भावना पूरे सूरसागर में उमड़ती हुई दिखाई देती है।
सूर के काव्य-रूप
सूरदास की पद-रचना को उनकी प्रेम-भक्ति से संयुक्त करते हुए वाजपेयी जी उसे उच्च कोटि का गीति काव्य मानते हैं। सूरदास ने अपने काव्य के लक्ष्य के अनुरूप ही उसका रूप चुना है। गीति काव्य में छोटे-छोटे गेय पदों द्वारा मनोरम भाव मूर्तियाँ अंकित की जाती हैं।
उनमें किसी भी प्रकार की कर्कशता नहीं होती, केवल कोमल भावना की अभिव्यक्ति होती है जो प्रत्येक पद के साथ पूर्ण होकर समाप्त हो जाती है। वाजपेयी जी लिखते हैं- "उनकी कविता गेय पदों के रूप में है, जैसे एक-एक लीला के अनेक छोटे-छोटे भाव चित्र खींच लिये गये हों। इन पदों में शब्द की साधना के साथ-साथ स्वर की भी परम उत्कृष्ट साधना है। जैसे शुद्ध भावनामय लयकारी ये पद हैं वैसा ही तन्मयकारी इनका संगीत है।" (- 'महाकवि सूरदास)
वाजपेयी जी ने 'सूरसागर' के विवेचन में दिखाया है कि सूरदास का काव्य गीतिबद्ध होते हुए भी उनके गीतों में छोटे-छोटे कथा-प्रसंगों और घटनाओं का वर्णन किया गया है।
इस वर्णन में सूरदास इतने सजग हैं कि स्थिति विशेष और घटनाक्रम को पूर्णरूप से दिखाते हुए भी उन्होंने उसके रूप-सौन्दर्य और भाव-सौन्दर्य की उत्कृष्टता में कोई कमी नहीं आने दी है। सूरदास ने मुक्तक गीतों के अन्तर्गत कथा-सूत्रों को इतनी कुशलता के साथ प्रस्तुत किया है कि हमें आसानी से यह पता ही नहीं चल पाता है कि हम कथानक के भीतर रूप-सौन्दर्य या मनोगतियों के चित्र देख रहे हैं।
सूर की काव्य-शैली
सूरदास की भक्ति को प्रेम-भक्ति का उत्कृष्ट रूप सिद्ध करने के बाद वाजपेयी जी ने उनकी कविता के गुणों और विशेषताओं पर भी प्रकाश डाला है।
सूरदास की शैली की लाक्षणिकता को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया है कि उनकी यह शैली इतनी उच्च स्तरीय है कि उसमें कविता और दार्शनिक चिन्तन साथ-साथ चलते रहते हैं और दोनों अपने उत्कर्ष पर हैं। उन्होंने लिखा है कि सूरदास की रचना चातुरी ऐसी है कि काव्य रसिक अपना कविता रस लेते हैं और विद्वज्जन कविता के अन्तर्पट में रुचिर दार्शनिक तथ्यों का साक्षात्कार भी करते हैं। वर्णन के प्रवाह में सूर ने बड़े ही मनोवैज्ञानिक चमत्कार का परिचय देने वाले पद रख दिये हैं जिससे काव्यधारा का मज्जन मुख ही नहीं, दर्शन-सुख भी प्राप्त कर सके।" (- 'महाकवि सूरदास')
सूर ने कृष्ण की ईश्वर रूप में ही अर्चना की है।
पहले कृष्ण की व्यापक विभु के रूप में प्रतिष्ठा और फिर उनकी लीलाओं का वर्णन । सूरदास की कवि प्रतिभा की विशेषता बताते हुए वाजपेयी जी कहते हैं कि सूरदास केवल कृष्ण के निस्सीम सौन्दर्य और उसकी विविधता के चित्र ही नहीं उकेरते, बल्कि कला में धर्म की शक्तिपूर्ण भावना भी मिला देते हैं। इसलिए सौन्दर्य की मूर्ति कृष्ण स्तुति के विषय बन जाते हैं और कलाओं का शृंगार पवित्र हो जाता है।
सूरदास की प्राकृतिक उपमाएँ जीवन के विभिन्न रूपों के सहज, सुन्दर और स्वाभाविक चित्र प्रिय हैं, लेकिन सबसे अधिक प्रिय हैं कृष्ण। इसलिए प्रकृति की सब वस्तुओं का कृष्ण के सामने कोई अस्तित्व नहीं है। वाजपेयी जी ने लिखा है कि "जब सूर ने अपनी तूलिका उठायी उन्होंने विनय के पदों में सूरसागर की भक्तिमयी आधार भूमि विशेष चमत्कार के साथ तैयार की और उस पर कृष्ण की शृंगारमयी मूर्ति अपनी श्री शोभा के साथ अंकित की।
चित्रकला के ये रंग हिन्दी में सूर द्वारा आविष्कृत हैं। इस पर सूर की छाप लगी है इस छाप से वे पहचाने जाते हैं।” (- 'महाकवि सूरदास) इस चित्रकला की एक और विशेषता है कि वे कृष्ण की ईश्वर रूप में अर्चना उनकी लीलाओं के चित्रण से पहले करते हैं। वाजपेयी जी के शब्दों में "कविवर सूर की यह काव्य चातुरी विशेष रूप से प्रशंसनीय है कि वे ब्रज के चित्रपट पर कृष्ण का चित्र अंकित करने से पहले विनय के पदों में उसकी भूमिका उत्तम रीति से बाँध देते हैं।" (- 'महाकवि सूरदास') वाजपेयी जी के अनुसार सूर-काव्य की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि उन्होंने पूर्ण मनोयोग के साथ वियोगान्त काव्य रचने का साहस किया, जिसकी परिपाटी हिन्दी में नहीं थी।
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