नन्ददुलारे वाजपेयी की आलोचना - Criticism of Nanddulare Vajpayee
नन्ददुलारे वाजपेयी की आलोचना: आत्मसंघर्ष और उपलब्धियाँ
वाजपेयी जी अपनी आलोचना में साहित्य के अलौकिक आधारों का खण्डन करते हुए रचना के सामाजिक आधारों का विवेचन करते हैं, लेकिन एक साथ ही बौद्धिकता, नैतिकता, उपयोगिता और कलावाद का विरोध करने लगते हैं। अनेक विचार सूत्रों को अपनी समीक्षा में सन्निहित करने के कारण साहित्य के सामाजिक आधारों का विवेचन फीका पड़ जाता है। वे किसी स्पष्ट साहित्य-दृष्टि का विकास करने में सफल नहीं हो पाते,
इसलिए उनकी आलोचना के लिए स्वच्छन्दतावाद, सौष्ठववाद और समन्वयवाद जैसे अलग-अलग अभिधान प्रयुक्त हुए हैं। वाजपेयी जी ने अपने आलोचना-मानों की उपलब्धि के लिए अनवरत संघर्ष किया है। आचार्य शुक्ल और प्रेमचंद जैसे हिन्दी साहित्य के दिग्गजों से वाद-विवाद किया है और अनेक पुरानी मान्यताओं को निरस्त कर नया साहित्यिक दृष्टिकोण सामने रखा है। अपनी मान्यताओं की पुष्टि अथवा उनमें परिवर्तन संशोधन के लिए उन्होंने बहुत परिश्रम किया है। उनकी उपलब्धियाँ और असंगतियाँ इसी आत्म-संघर्ष की उपज हैं। आइए, उनके आत्म-संघर्ष के कुछ मुख्य पक्षों का अवलोकन करें।
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