सांकृतिक चेतना - cultural consciousnes

संस्कृति से तात्पर्य


मानव जीवन जिजीविषा को निर्धारित करने वाले कारक को संस्कृति कहते हैं। इसके अन्तर्गत मानव समाज, धर्म, राजनीति, अर्थ तथा भूत, भविष्य और वर्तमान के साथ चलने वाले आदर्श होते हैं। इन आदर्शों का सामूहिक नाम है, 'संस्कृतिं । रीति-रिवाज और सामाजिक संस्थाएँ भी इसके अन्तर्गत आती हैं। डॉ. द्वारिकाप्रसाद ने 'कामायनी में काव्य संस्कृति और दर्शन' नामक पुस्तक में संस्कृति के व्यापक रूप पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- "संस्कृति का सम्बन्ध मानव के भौतिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, दार्शनिक, साहित्यिक, कलात्मक आदि सभी प्रकार के महत्त्वपूर्ण विकासों एवं जीवन के विविध पहलों से है।

मानव के इन विकासों में परम्परागत संस्कृतियों का सदा हाथ रहता है। इसलिए संस्कृति और संस्कारों का घनिष्ठ सम्बन्ध है । इसके अतिरिक्त इन विकासों द्वारा ही किसी देश की समस्त चेष्टाएँ रूप हैं और संस्कृति उसका आन्तरिक रूप है। अतः देश की संस्कृति से उस देश के रहन-सहन, आचार-विचार, रीति-रिवाज, ज्ञान-विज्ञान, परम्परागत अनुभव, जीवन यापन के ढंग, कला, प्रेम, रुचि आदि का बोध होता है।" इस आधार पर कहा जा सकता है कि संस्कृति मानव जीवन का एक विशाल चित्रपट्ट है और कविता उसी की आलोचना, उसी की व्यवस्था है। यही कारण है कि प्रत्येक देश के काव्य-साहित्य में उस देश की संस्कृति सम्पदा रूप में सुरक्षित रहती है।

संस्कृति मानव जीवन की सम्यक् व्यवस्था है और कविता मानव जीवन की मूलतः आलोचना । इस तरह से प्रत्येक युग की कविता में तत्कालीन सांस्कृतिक मान्यताओं की झलक मिलती है। संस्कृति जीवन, जाति, समाज और युग को सम्यक् रूप से देखती है और उसकी सम्यक् व्याख्या भी करती है जबकि कविता मंगलकारिणी होती हुई भी जीवन के किसी पहलू विशेष को ही अभिव्यक्ति देती है।


प्राचीन और नवीन संस्कृतियों का समन्वय


दिनकर की सांस्कृतिक चेतना युग की माँगों की पूर्ति का ही एक प्रयास है।

मानवतावादी धर्म और संस्कृति का विकास आधुनिक युग की देन है। दिनकर ने भारत की प्राचीन संस्कृति को बहुत श्रद्धा से पूजा है किन्तु जब वह युग के साथ मेल नहीं खाती तब दिनकर बड़े ही निःसंकोच भाव से उससे विदा ले लेते हैं। परम्पराओं और रूढ़ियों का अवरोध उनको सह्य नहीं है। प्राचीनता के वे वहीं तक समर्थक हैं जहाँ तक वह वर्तमान के साथ चलकर उपयोगी हो सके । 'नये सुभाषित' नामक कविता में दिनकर ने प्राचीन और नवीन संस्कृतियों तथा देशी और विदेशी संस्कृतियोंके समन्वय की चाह को अभिव्यक्त किया है। यथा- खींचते हैं जो तुम्हें दाँए की बाँए मूर्ख हैं,


ठीक वह बिन्दु दोनों का विलय होता जहाँ है ।

ठीक है वह बिन्दु जिससे फटता है पथ का भविष्य, ठीक है वह मार्ग जो स्वमेव बँटा जा रहा है। नूतन और पुरातन,


प्राच्य और प्रतिचय के संघर्ष से ।


किन्तु इन बदलते हुए मूल्यों के बीच दिनकर भारत की गरिमा को नहीं भूलना चाहते। वह विदेशी वस्तुओं को अपने में मिलकर भारतीय बना लेना चाहते हैं। आधुनिक शिक्षण और यूरोप के प्रभाव से जब भारत का सांस्कृतिक स्तर बदला तो लोगों ने उनकी निन्दा प्रारम्भ की। भारतीयों ने भारतीय संस्कृति को अनुपयोगी कहकर यूरोप की संस्कृति को अपनाया। इस पर दिनकर को दुःख हुआ और 'नये सुभाषित' में वे कहते हैं-


जब चलो आगे


ज़रा-सा देख लो मुड़कर चिरन्तन रूप वह अपना ।


अखिल परिवर्तनों में जो अपरिवर्तित रहा है,


करो मत अनुकरण ऐसे । न बदलो यों कि भारत को


कि अपने आप से ही दूर हो जाओ


कभी पहचान ही पाए नहीं इतिहास भारत का ।


कवि बदली हुई सांस्कृतिक चेतना के समर्थक होकर भी कवि ने भारतीय प्राचीन संस्कृति की गरिमा को भुलाया नहीं है। उन्होंने दोनों का समन्वय किया है।


प्रत्येक संस्कृति का निर्माण धर्म, दर्शन, राजनीति, सामाजिक अर्थ व्यवस्था आदि के साथ होता है। कला भी इसमें योगदान करती है। मानव जीवन के इन्हीं आवश्यक पक्षों को व्यवस्थित और पूर्ण बनाने के लिए जिन आचार-व्यवहारों का प्रयोग किया जाता है उसी का नाम संस्कृति है।


सामासिक संस्कृति का निर्माण


दिनकर की सांस्कृतिक चेतना की प्रमुख विशेषता है, 'भारत की बहुलतावादी राष्ट्रीयता में सामासिक संस्कृति की रचना ।' दिनकर के अनुसार हिन्दू धर्म की विशेषता यह है कि वह बाहर से आयी हुई संस्कृतियों से मिलकर जाग्रत् और नवीन हो उठती है। ऐसी बात नहीं है कि सामासिक संस्कृति का निर्माण केवल इस्लाम के साथ हिन्दुत्व की टकराहट और सामंजस्य से हुआ है। इसका प्रारम्भ प्रागैतिहासिक काल (कम-से-कम आर्य और द्रविड़ के मिश्रण के समय) से ही आरम्भ हो गई थी। 'संस्कृति के चार अध्याय' में दिनकर लिखते हैं- "इतिहास की अटल गहराइओं में जाने पर भी हम यही देखते हैं कि आर्य और द्रविड़ नाम से अभिहित किये जाने वाले भारतीयों का धर्म एक है,

संस्कार एक है भाव और विचार एक है, तथा जीवन के विषय में उनका दृष्टिकोण भी एक ही है। शैव, शाक्त, वैष्णव, जैन और बौद्ध, ये आर्य भी थे और द्रविड़ भी।"


भारत में शताब्दियों तक हिन्दू और मुसलमान झगड़ते रहे। यह स्पष्ट है कि भारत में इस्लाम का अत्याचार इतना भयानक रहा कि अन्य कहीं इसके दृष्टान्त नहीं मिलते। परन्तु धीरे-धीरे मुसलमान और हिन्दू दोनों फिर कहीं-न-कहीं एक हुए और उनके मिलन से बहुत-से रीति-रिवाज, तहजीब एक नये तरीके से विकसित हुए । दोनों संस्कृतियों के मिलन से एक सामासिक संस्कृति की रचना हुई। हिन्दू और मुसलमानों के बीच इस सामासिक संस्कृति के निर्माण की भूमिका सूफी आन्दोलन ने तैयार की।


दिनकर ने अपने ग्रन्थ 'संस्कृति के चार अध्याय' के तीसरे अध्याय में हिन्दू और मुसलमानों के मध्य सामासिक संस्कृति की रचना के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं यथा "हिन्दुओं के बीच अन्धविश्वास और रूढ़ियाँ बहुत अधिक प्रचलित थीं। इनके प्रभाव से मुस्लिम समाज में भी कुछ रूढ़ियाँ उत्पन्न हो गई और हिन्दुओं की देखा-देखी मुसलमान जनता भी गाजी मियाँ, पाँच पीर, पीर बदर, ख्वाजा खिजिर आदि कल्पित देवताओं की पूजा करने लगी। मुसलमाओं के ये पीर अक्सर ग्राम देवता बन बैठे और हिन्दू-मुस्लिम सब दरगाह पर माथा टेकने लगे ... हिन्दुओं के बहुत से रिवाज़ ऊँचे तबकों के मुसलमानों में आप से आप चल पड़े। नज़र लगने से बचने के लिए न्योछावर उतारने की परिपाटी बादशाहों की हवेलियों में भी थी। शहजादे भी यात्रा पर निकलने से पहले बाँहों पर मन्त्रसिद्ध यन्त्र बँधवाते थे।"


समाजबोध


व्यक्ति की अलग-अलग इकाइयों का नाम ही समाज है। आधुनिक समाज के दो पक्ष हैं- ग्राम और नगर। दिनकर के काव्य में दोनों ही पक्षों का सर्वांग निरूपण हुआ है। दिनकर का जन्म गाँव में हुआ था। उनका बचपन और लड़कपन गाँव में जबकि शेष जीवन वैभवनगरी दिल्ली में व्यतीत हुआ। समाज के दोनों ही पक्षों को उन्होंने बहुत नजदीक से देखा किंवा जीया है। तात्पर्य यह है कि कवि का ग्राम्यबोध और नगरीयबोध दोनों ही अनुभूतिजन्य हैं, काल्पनिक नहीं। दिनकर में धरती के प्रति आकर्षण है, स्वर्ग के प्रति नहीं। उसकी काव्य-चेतना ही नहीं, मानवीय चेतना का भी निर्माण इसी धरती पर, अपने गाँव घर के वातावरण में हुआ है। उनमें स्वर्ग के प्रति कोई आकर्षण नहीं है। धरती के प्रति आकर्षण और स्वर्ग के प्रति विकर्षण की अभिव्यक्ति कवि करता रहा है।


ग्राम्य-जीवन


ग्रामीण संस्कृति के आधार कृषकों से कवि का परिचय अच्छा था। वे स्वयं भी कृषकपुत्र थे। इसी कारण उन्होंने कृषकों के दैनिक जीवन में कई सजीव चित्र अंकित किए हैं। गोधूलि की वेला में सारा ग्राम्य जीवन कैसा सुन्दर प्रतीत होता है इसका सजीव चित्रण 'रेणुका' में कवि इस प्रकार करता है-



स्वर्ण चला अहा ! खेतों में उत्तरी संध्या श्याम परी, रोमंथन करती गायें आ रहीं रौंदती घास हरी । घर-घर से उठ रहा धुआँ, जलते चूल्हे बारी-बारी, चौपालों में कृषक बैठ गाते "कहँ अटके बनवारी ?" पनघट से आ रही पीतवसना युवती सुकुमार, किसी भाँति ढोती गागर-यौवन का दुर्वह भार ।

बनूँगी मैं कवि ! इसकी माँग, कलश, काजल, सिन्दूर, सुहाग।


वन-तुलसी की गन्ध लिये हलकी पुरवैया आती है, मन्दिर की घण्टा ध्वनि युग-युग का सन्देश सुनाती है। टिमटिम दीपक के प्रकाश में पढ़ते निज पोथी शिशुगण, परदेशी की प्रिया बैठ गाती यह विरह गीत उन्मन,


दिनकर की कविता 'चलो कवि वन फूलों की ओर' में तो ग्राम्यजीवन का ही दृश्य साकार हुआ है। 'कविता की पुरकार' शीर्षक कविता में कवि ने ग्राम्यजीवन में रम जाने की जो कामना की है उसमें उनका ग्राम्यबोध ही उद्घाटित हुआ है।

'रेणुका' में कवि ने ग्राम्य संस्कृति की पृष्ठभूमि में कविता की कामना का शिवपक्ष भी कवि ने प्रस्तुत किया है। कविता कामना करती है कि कृषकों की प्यास वह गंगाजल बनाकर बुझाएगी। स्वेदकण बनकर अनाज के दाने उगाएगी -


सूखी रोटी खायेगा जब कृषक खेत में घर कर हल, तब दूँगी मैं तृप्ति उसे बनकर लोटे का गंगाजल । उसके तन का दिव्य स्वेदकण बनकर गिरती जाऊँगी, और खेत में उन्हीं कणों-से में मोती उपजाऊँगी 


ग्रामीण कृषक के श्रमसाध्य जीवन का यह बड़ा ही यथार्थ चित्र है।

दिनकर के काव्य में एक ओर जहाँ भारतीय ग्राम्यजीवन के सुन्दर और रमणीक चित्र उकेरे गए हैं वहीं दुःख दारिद्र्य, करुणा, विवशता का भी यथार्थ चित्रण हुआ है। ग्रामीण कृषक अपने पाले हुए पशुओं का दूध भी अपने बच्चों को नहीं पिला पाता । ऋण को चुकाने के लिए दूध-घी का एक-एक बूंद बेच देता है।


ग्राम्य जीवन की कारुणिक दशा के चित्रण के साथ-साथ कवि ने 'रसवंती' में ग्रामीण नारी के सौन्दर्य और अल्हड़पन का सौन्दर्य भी खींचा है।

उसमें जो सहजता और सरलता विद्यमान है वह कवि के ग्रामबोध को भली- भाँति व्यक्त करती है। ग्राम्य-प्रणय के निरूपण में ग्रामीण प्रेमिका की मनोदशा तो प्रकट होती ही है साथ ही ग्रामीण जीवन का इतिहास भी। यथा- 


दो प्रेमी हैं यहाँ एक जन बड़े साँझ आल्हा गाता है, पहला स्वर उसकी राधा को घर से खींच लाता है। हुई न मैं क्यों बड़ी गीत की, विधना यों मन में गिनती है।


ठीक इसी प्रकार 'ग्राम्य वधू' शीर्षक कविता में ग्रामीणों की सरलता, सहजता और उसके लावण्य का मनोहारी चित्रण कवि ने किया है।

दिनकर की कविताओं में ग्राम्य चित्रों के निरूपण में ग्रामीण जीवन की सादगी, सहजता, ग्रामीणों की जीवन-विधि, उनका आचार-व्यवहार का कुशलतापूर्वक निर्वहन हुआ है। ग्राम्य संस्कृति के इन समस्त उपादान कारकों के प्रति दिनकर की तीव्र अनुभूतियाँ अभिव्यक्त होती हैं।


नगरीय बोध


पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से भारतीय संस्कृति में विकृति आने से जिस मिलावटी संस्कृति का जन्म हुआ उसका प्रतिनिधित्व नगरीय जीवन करता है। दिनकर ने भारतीय संस्कृति में आगत इस विकृति को क्षोभ से देखा है और स्थान-स्थान पर उन विसंगतियों पर कटाक्ष किया है।

संकर संस्कृति के प्रभाव से घृणा द्वेष आदि की प्रवृत्ति बढ़ी है । 'इतिहास के आँसू' नामक कविता में कई आश्चर्य व्यक्त करते हुए दिनकर कहते हैं-


आह ! सभ्यता के प्रांगण में आज गरल-वर्षण कैसा !


घृणा सिखा, निर्वाण दिलाने वाला यह दर्शन कैसा !


'इन्द्रधनुष' और 'हस्तिनापुर प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रतीक रहे हैं लेकिन आज संकर संस्कृति दिल्ली के रूप में बदल चुके हैं।

दिल्ली का जनजीवन आज भारतीय जनजीवन का आदर्श बना हुआ है लेकिन वस्तुस्थिति तो यह है कि दिल्ली की नगर संस्कृति भारतीय संस्कृति की हासोन्मुख दिशा का अन्तिम छोर है। दिनकर इससे परिचित हैं। इसलिए 'दिल्ली' शीर्षक कविता में नगर संस्कृति की प्रतीक दिल्ली को व्यग्य अंदाज में देखते हैं।


आज का नगर आधुनिकता के नाम पर कृत्रिमता में फँसता जा रहा है। ऊपरी चकाचौंध में उसका सहज और स्वाभाविक आन्तरिक सौन्दर्य नष्ट होता जा रहा है।

नगरोद्यान में बेला, चमेली की जगह कैक्टस लग रहे हैं। सभ्यता की सृष्टि करने वाले मोटे सूती वस्त्रों की जगह नायलोन के झीने पारदर्शी वस्त्र प्रयुक्त हो रहे हैं। इस तरह प्राचीन भारत के नगरीय जीवन का सौम्य आज कृत्रिमता और दिखावे में उलझता जा रहा है। दिनकर ने इस नगरीय जीवन के इस दृश्य को प्रस्तुत करते हुए कहते हैं -


आधुनिकता का वही पर नाम अब तो चढ़ा दो नायलोन का कोट हम सिलवा चुके हैं। और जड़ से नोचकर बेली चमेली के डुमों को, कैक्टसों से भर चुके हैं बाग हम अपना ।


'कुरुक्षेत्र', 'द्वन्द्वगीत' और अन्य कविताओं में मानव मन की द्वन्द्वात्मक स्थिति का कवि ने बखूबी चित्रण किया है। वस्तुतः मानवीय मन में द्वन्द्वात्मक स्थिति का जन्म नगरीय परिवेश में ही हुआ है। अतः कवि का खिन्न मन द्वन्द्व, कृत्रिमता, एकाकीपन, संत्रास आदि आधुनिकता के परिणामों से उबकर गाँवों की ओर जाना चाहता है। 'रसवंती' में कवि ने आधुनिकता का जो चित्र खींचा है, वह सभ्य कहीं जाने वाली तथाकथित नगरीय आधुनिकता पर व्यंग्य ही है।


नारी भावना


दिनकर ने नारी के मातृ रूप, पत्नी रूप, प्रेमिका रूप तथा आधुनिकता से प्रभावित नारी के रूप पर विचार किया है ।

भारतीय संस्कृति में नारी के मातृ रूप की ही गरिमा सर्वाधिक है। दिनकर ने नारी के इस रूप को 'रसवंती' और 'उर्वशी' दोनों में संवारा है। 'उर्वशी' में माता के रूप का विकास दिखाई देता है जब उर्वशी पुरुरवा प्रणय सूत्र में बँधना चाहती है तो अप्सराएँ उर्वशी पर व्यंग्य करती हैं। उसके मातृ स्वरूप की भावी कल्पना पर व्यंग्य करती हैं। इसी उपहास का उत्तर देती हुई मेनका ने जो कुछ भी कहा है उसमें नारी के मातृत्व स्वरूप की विस्तृत गरिमा उदात्त हो उठी है। यथा-


माँ बनते ही प्रिया कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है ? गलती है हिमशिला सत्य है गठन देह की खोकर पर हो जाती है वह असीम कितनी पयस्वनी होकर।


नारी के इस स्वरूप में जो गरिमा और शान्ति है, उसकी तुलना नारी के किसी अन्य रूप में सम्भव कहाँ ! 'दिनकर ने 'उर्वशी' में नारी के इसी रूप को सबसे अधिक सुन्दर कहा है-


युवा जननि को देख शान्ति कैसी मन में जाती है रूपमती भी सखी! मुझे तो वही प्रिया लगती है जो गोदी में लिये क्षीर मुख शिशु को सुला रही हो अथवा खड़ी प्रसन्न पुत्र का पालना झूला रही हो।


नारी के पत्नी रूप की झाँकी 'रसवंती' में देखी जा सकती है जहाँ प्रिया रूप में नारी अधरामृत दान कर जीवन की सारी शुष्कता को हर लेती है।

'पुरुष प्रिया' कविता में नारी के इसी रूप का विकास दिखाई देता है जहाँ नारी अजेय नर को जीतने आती है। जब-जब पुरुष प्रिया के सान्निध्य में आता है उसका सारा शैथिल्य दूर हो जाता है। फिर उसकी होठों पर प्रिया के नाम के सिवाय और कुछ नहीं आता। यथा- जब-जब फिर आता पुरुष श्रान्त तब तुम करती रसमान प्रिया मिलती न उसे फिर बात नयी मुख से कढ़ते दो वर्ण प्रिया ।


ध्यातव्य है कि भारतीय संस्कृति में 'प्रिया' शब्द केवल 'पत्नी' के लिए प्रयुक्त होता है। प्रिया बनने का सौभाग्य प्रेमिका को विरले ही हो पाता है।


धर्म


भारतीय संस्कृति में पुरुषार्थं चतुष्टय में धर्म को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। खेद है कि इसकी गलत व्याख्या की गई और अल्पज्ञान के परिणामस्वरूप धर्म के ठेकेदारों ने इसे मिथ्याडम्बर और अन्धविश्वासों के दलदल में झोंक दिया । दिनकर धार्मिक मिथ्याडम्बरों और अन्धविश्वासों के कटु आलोचक रहे हैं। धर्म की निर्जीव कल्पनाएँ जीवन को हताश करती हैं। इसलिए हताश निराश मानव को भीष्म के माध्यम से दिनकर सन्देश देते हुए 'परशुराम की प्रतीक्षा' में लिखते हैं-


जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर जो उससे डरते हैं. वह उनका जो चरण रोप निर्भय होकर लड़ते हैं।


युगधर्म की प्रतिष्ठा के लिए संन्यास, त्याग और एकान्त की आवश्यकता नहीं है।

कर्मक्षेत्र में प्रवृत्त होकर धर्म को व्यावहारिक बनना ही युग धर्म है। इसी विचार को प्रकट करते हुए 'कुरुक्षेत्र' कविता में दिनकर लिखते


पहले नर अमरत्व चाहता था मरने पर पर अब खोजता दीर्घायु सुयश है यद्यपि है यह भेद अमरता के अन्वेषी आत्मदेवता से कुछ भी न छिपा सकते थे कीर्ति कमियों को पर साधन सभी सुलभ हैं। निजन अकीर्तियाँ छिपा कीर्ति उत्तम पाने की क्योंकि दृश्य है सत्य झूठ जो कुछ अदृश्य है।


दिनकर ने धर्म की व्यावहारिकता पर बल दिया है और युगधर्म के अनुरूप चलने की सलाह दी है । दिनकर ने अपने काव्य में इसी युगधर्म को प्रश्रय दिया है।