डॉ. रामविलास शर्मा का सांस्कृतिक विकास और मानवीय मूल्य - Cultural Development and Human Values of Dr. Ramvilas Sharma
डॉ० रामविलास शर्मा ने विकासमान सामाजिक जीवन के सन्दर्भ में साहित्य और कला के सामाजिक आधारों और मूल चिन्ताओं का विश्लेषण किया है। जीवन और जगत् के प्रति अनास्था और मूल्यहीनता के विचारों का पूर्ण तिरस्कार करते हुए उन्होंने मनुष्य के दीर्घकालीन संघर्ष द्वारा अर्जित मानव मूल्यों को मानव-जाति के सांस्कृतिक विकास के लिए अनिवार्य बताया तथा उनके संरक्षण और विकास पर बल दिया है। इसलिए भौतिक जगत् की समस्याओं और जीवन-सौन्दर्य से विलग अपनी कल्पना के निष्क्रिय लोक में विचरण करने वाले साहित्य का उन्होंने कोई मूल्य नहीं माना है, बल्कि उसे समाज के लिए हानिकारक बताकर उसकी तीव्र आलोचना की है।
डॉ. शर्मा के अनुसार व्यक्ति और समाज का अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर है। साहित्य में सामाजिक संघर्ष के चित्रण के साथ-साथ व्यक्ति के भाव जगत् और मानसिक संघर्ष का भी चित्रण अनिवार्य है। डॉ. शर्मा की मान्यता है कि साहित्य मनुष्य को सामाजिक जीवन में भाग लेने और उसकी समस्याओं को हल करने की प्रेरणा देता है। श्रेष्ठ साहित्य की रचना के लिए साहित्यकार का यथार्थवादी होना आवश्यक है। डॉ० शर्मा यथार्थवादी साहित्य को ही मानवता का उन्नायक मानते हैं। यथार्थवाद में मानवीय स्नेह, प्रकृति-प्रेम, सौन्दर्यबोध और साहित्य की कलात्मकता आदि सभी शामिल हैं। उनके अनुसार प्रकृति और मानव जीवन के सौन्दर्य की व्याख्या किए बिना कलात्मक सौन्दर्य का विवेचन निरर्थक है।
सौन्दर्य और उसकी अनुभूति के विवेचन का उद्देश्य मनुष्य की सौन्दर्य चेतना के उत्तरोत्तर विकास के साथ मनुष्य के सामाजिक जीवन और उसके परिवेश को सुन्दर बनाना है।
मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा की चिन्ता डॉ. शर्मा की केन्द्रीय चिन्ता है। भारतीय और विदेशी साहित्य का मूल्यांकन हो या मानव-सभ्यता और इतिहास का विवेचन, वे सदैव सामाजिक विकास को आगे बढ़ाने वाले नैतिक मूल्यों की खोज और सामाजिक सम्बन्धों के उद्घाटन में संलग्न रहे हैं।
उनका विचार है कि जातीय चेतना को व्यापक मानवीय चेतना का अंग मानकर ही मनुष्य के सांस्कृतिक विकास की समस्या का समाधान किया जा सकता है। इस दृष्टि से अपनी विरासत की पहचान और परम्परा के मूल्यवान् तत्त्वों का विकास सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है । भारतीय साहित्य में अनेक मूल्यवान् स्थायी तत्त्व हैं जिन्हें हमारे कवियों ने सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की लम्बी यात्रा में प्राप्त किया और उन्हें सहेजकर अनेक दिशाओं में आगे बढ़ाया। ये तत्त्व आज भी भारतीय साहित्य की अन्तर्धारा में प्रवाहित हैं।
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