आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी का सांस्कृतिक काव्योत्थान : छायावाद - Cultural Poetry of Acharya Nanddulare Vajpayee: Shadowism
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी छायावादी काव्य का गम्भीर विवेचन करने वाले हिन्दी के पहले आलोचक थे। उन्होंने छायावादी काव्य में अन्तर्निहित नवीन जीवन-मूल्यों, उसकी भाव-धारा तथा नवीन कल्पना- छवियों और अभिनव भाषा रूपों से युक्त सौन्दर्य-बोध का विश्लेषण किया। इसमें उन्होंने छायावादी कवियों के बाह्य जगत् के विश्लेषण की अपेक्षा काव्य के अन्तः सौन्दर्य को अधिक महत्त्व दिया है।
आचार्य वाजपेयी हिन्दी की छायावादी काव्यधारा के प्रथम सहृदय आलोचक हैं। अपनी पुस्तक 'नया साहित्य : नये प्रश्न' की भूमिका में उन्होंने हिन्दी आलोचना में अपने आगमन की परिस्थितियों के सम्बन्ध में लिखा है कि "मेरा आगमन हिन्दी के छायावादी कवि प्रसाद,
निराला और पंत की कविता के विवेचक के रूप में हुआ था। नये जीवनदर्शन, नयी भावधारा, नूतन कल्पना छवियों और अभिनव भाषारूपों को देखकर मैं इनकी ओर आकृष्ट हुआ था। इनके जीवनदर्शन में मानवीय आदर्शों की एक सम्पूर्णता थी, इनकी भावधारा में गाम्भीर्य था, इनकी कल्पना छवियाँ निसर्गजात, समग्र और एकतान थीं तथा इनके भाषा रूप एक चमकती हुई मोहक लाक्षणिकता लिए हुए थे । इन तत्त्वों ने मुझे इतना आकृष्ट किया कि दूसरे कवि और शैलियाँ मुझे अनाकर्षक लगने लगीं।"
वाजपेयी जी ने छायावाद के सामाजिक सन्दर्भ को उसकी आध्यात्मिकता से अधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व बताया है।
उन्होंने कहा है कि इस काव्यधारा का आध्यात्मिक पक्ष भी है, परन्तु उसकी मुख्य प्रेरणा धार्मिक न होकर मानवीय और सांस्कृतिक है। छायावादी काव्य की भक्ति काव्य से तुलना करते हुए वाजपेयी जी ने लिखा है कि "आधुनिक और परिवर्तनशील समाज-व्यवस्था और विचार-जगत् में छायावाद भारतीय आध्यात्मिकता की नवीन परिस्थिति के अनुरूप स्थापना करता है। जिस प्रकार मध्ययुग का जीवन भक्तिकाव्य में व्यक्त हुआ, उसी प्रकार आधुनिक जीवन की अभिव्यक्ति इस काव्य में हो रही है।
अन्तर है तो इतना ही कि जहाँ पूर्ववर्ती भक्ति- काव्य में जीवन के लौकिक और व्यावहारिक पहलुओं को गौण स्थान देकर उनकी उपेक्षा की गई है, वहाँ छायावादी काव्य प्राकृतिक सौन्दर्य और सामयिक जीवन परिस्थितियों से ही मुख्यतः अनुप्राणित हैं । " (- 'आधुनिक साहित्य' ) प्राकृतिक सौन्दर्य और सामयिक जीवन परिस्थितियों को छायावाद की मुख्य प्रेरणा बताते हुए भी छायावाद की व्याख्या वे उसे 'मानव अथवा प्रकृति के सूक्ष्म किन्तु व्यक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भान' कह कर करते हैं। ऐसा कहकर वाजपेयी जी ने छायावाद के अर्थ को कुछ उलझा सा दिया है।
वाजपेयी जी के अनुसार छायावादी कविता विद्रोहात्मक और आत्मपरक है।
वह राष्ट्रीय जागरण की प्रतिध्वनि है। उसमें करुणा, आशा और उत्तरदायित्व के स्वर प्रमुख हैं। इन स्वरों में मानव जीवन की उदात्तता है, जो हमारे भूले हुए गौरव का पथ-निर्देश करते हुए परिस्थितियों पर मानवता की विजय का सन्देश देते हैं।
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने छायावादी काव्यधारा के साहित्य को अपना व्यापक समर्थन दिया और 'प्रसाद', 'पंत' और 'निराला' के काव्य-सौन्दर्य को पूर्ण मनोयोग से उद्घाटित कर हिन्दी जगत् के सामने रखा। उन्होंने 'पंत' और 'निराला' को साहित्य के इतिहास में नवीन क्रान्ति और प्रवर्तन का कार्य करने का श्रेय दिया।
'प्रसाद' को कविता विषय का सबसे प्रथम विस्तार करने तथा कल्पना और सौन्दर्य के नये स्पर्श अनुभव करवाने वाला कवि बतलाया । उन्होंने छायावादी कवियों का समर्थन करते हुए साहित्य की स्वायत्त सत्ता को स्वीकार किया और लिखा कि "काव्य का महत्त्व तो काव्य के अन्तर्गत ही है, किसी भी बाहरी वस्तु में नहीं। सभी बाहरी वस्तुएँ काव्य-निर्माण के अनुकूल या प्रतिकूल प्रस्थितियों का निर्माण कर सकती हैं, वे रचयिता के व्यक्तित्व पर विभिन्न प्रकार के प्रभाव डाल सकती हैं और डालती भी हैं,
पर इन स्वीकृतियों के साथ हम यह अस्वीकार नहीं कर सकते कि काव्य और साहित्य की स्वतन्त्र सत्ता है, उसकी स्वतन्त्र प्रक्रिया और उसकी परीक्षा के स्वतन्त्र साधन हैं।" (- 'आधुनिक साहित्य) छायावाद को द्विवेदीयुगीन बौद्धिकता और नीतिमत्ता के विरुद्ध अनुभव- प्रवण काव्यधारा घोषित करते हुए वाजपेयी जी जी उसमें अनुभूति, दर्शन और शैली का अद्भुत सामंजस्य दिखाते हैं और उसके आध्यात्मिक पक्ष को रेखांकित करते हैं। उन्होंने लिखा है कि छायावाद युग का उद्भव राष्ट्रीय इतिहास में कुछ स्पष्ट प्रेरणाओं से हुआ था और उसने राष्ट्र की ऐतिहासिक आवश्यकताओं को पूरा किया है। आचार्य वाजपेयी द्वारा छायावाद के महत्त्व को स्थापित किए जाने से छायावाद सम्बन्धी अनेक भ्रमों और समस्याओं का समाधान हुआ और इस काव्यधारा के विभिन्न पक्षों का मूल्यांकन शुरू हुआ।
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