आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का सांस्कृतिक चिन्तन - Cultural thought of Acharya Hazariprasad Dwivedi
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की दृष्टि मूलतः सांस्कृतिक है। उन्होंने विश्व मानव समुदाय के आधार पर एक 'सामान्य मानव संस्कृति' की कल्पना की है इसलिए वे संस्कृति को किसी देश या जाति की अपनी मौलिकता नहीं मानते। फिर भी वे विभिन्न संस्कृतियों की भौगोलिक और राष्ट्रीय विशिष्टताओं को पर्याप्त महत्त्व देते हैं और उनके स्तर भेदों को स्वीकार करते हैं। वे विश्व की एक समान संस्कृति की बात करते समय भारतीय संस्कृति की अपनी विशिष्टता और पहचान को भी ध्यान में रखते हैं। विश्व संस्कृति के सन्दर्भों में उन्होंने भारतीय संस्कृति के स्वरूप और सामर्थ्य की खोज और विवेचना अपने सम्पूर्ण लेखन में की है।
अपनी धारणा को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं कि "मैं संस्कृति को किसी देश विशेष या जाति विशेष की मौलिकता नहीं मानता। मेरे विचार से सारे संसार के मनुष्यों की एक सामान्य मानव संस्कृति हो सकती है। यह दूसरी बात है कि वह व्यापक संस्कृति अब तक सारे संसार में अनुभूत और अंगीकृत नहीं हो सकी है।" (- 'अशोक के फूल') द्विवेदी जी को केवल भारतीय होने के कारण कोई बुरी चीज ग्राह्य नहीं है और विदेशी होने के कारण किसी अच्छी चीज को वे त्याज्य नहीं मानते हैं। इस दृष्टि से संस्कृति के देशी-विदेशी का विभाजन भी वे अनुचित समझते हैं। इस प्रकार के विभाजन को कृत्रिम मानते हुए भी विभिन्न संस्कृतियों के बीच के अन्तर को समझने की आवश्यकता को भी वे नज़रअंदाज़ नहीं करते हैं - "इन अन्तरों को, बाह्याचरण सम्बन्धी अन्तरों को हमें नहीं भूलना चाहिए क्योंकि इनके भूल जाने से चीज को समझने में भूल हो सकती है।"
( विचार और वितर्क) आचार्य द्विवेदी का सांस्कृतिक चिन्तन हमें उनके निबन्धों के अतिरिक्त 'कालिदास की लालित्य योजना' और प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद' जैसी पुस्तकों में विस्तार से देखने को मिलता है। उन्होंने अपने लेखन में विभिन्न संस्कृतियों के अध्ययन के क्रम में कला, संस्कृति और सौन्दर्यबोध सम्बन्धी समकालीन सवालों पर भी विचार किया है। सांस्कृतिक परम्परा का अनुशीलन उनकी साहित्य-साधना का मुख्य सरोकार है। उन्होंने विभिन्न सांस्कृतिक दृष्टियों का विवेचन करके संस्कृति सम्बन्धी अपनी विशिष्ट दृष्टि का विकास किया है।
द्विवेदी जी भारतीय वाक्य का अवगाहन करते हुए हिन्दी साहित्य और हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में आए थे।
इसलिए उनकी दृष्टि साहित्य को अपने आप में स्वतन्त्र न मानकर संस्कृति की जीवनधारा के एक अंग के रूप में ही देखती हैं। उनके अनुसार संस्कृति कोई शाश्वत या एकदेशीय वस्तु न होकर परिवर्तनशील और प्रगतिशील है । साहित्य संस्कृति के इस गतिशील प्रवाह का ही अंग है। अपने निबन्ध संग्रह 'अशोक के फूल' में उन्होंने लिखा है कि "मनुष्य की जीवन-शक्ति बड़ी निर्मम है। वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है .... देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बात की बात है। शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा ।" द्विवेदी जी के चिन्तन में सामाजिक विकास का सम्बन्ध सांस्कृतिक विकास से है और साहित्यिक विकास सांस्कृतिक विकास से जुड़ा हुआ है। वे साहित्य को सांस्कृतिक प्रक्रिया का एक अंग मानते हैं।
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