अलंकार स्रोत - decking source

 अलंकार स्रोत - decking source


विशिष्ट अलंकारों के निरूपण के लिए आचार्य केशवदास दण्डी के 'काव्यादर्श' का आधार ग्रहण करते हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत चालीस विशिष्ट अलंकारों में गणना, वक्रोक्ति, व्यधिकरणोक्ति, व्याजनिन्दा, अमित, युक्त, सुप्रसिद्ध, प्रसिद्ध और विपरीत मौलिक हैं। शेष सभी अलंकार 'काव्यादर्श' से लिए गए हैं। इस प्रकार केशवदास ने विशिष्ट अलंकारों के प्रतिपादन में मूलतः दण्डी का अनुसरण किया है। दण्डी के 'भेद-प्रपंच' को उन्होंने नहीं अपनाया है। अलंकार विवेचन में उन पर कहीं-कहीं मम्मट, रुय्यक और अप्पयदीक्षित का प्रभाव भी परिलक्षित होती है। आचार्य केशवदास द्वारा विवेचित चालीस विशिष्ट अलंकारों के स्रोत आधारों को निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया जा सकता है-


(i) दण्डी के अनुरूप


(ii) दण्डी के प्रायः अनुरूप


(iii) दण्डी से भिन्न


(iv) नवीन अलंकार


रस निरूपण


: विभावना, आशिष, अन्योक्ति, सहोक्ति, यमक, रसवत्, उर्ज और समाहित। :

स्वभावोक्ति, युक्त, विरोध, उत्प्रेक्षा, आक्षेप, श्लेष, रूपक, व्यतिरेक, अपह्नुति, हेतु, सूक्ष्म, लेश, व्याजस्तुति, व्याजनिन्दा और चित्र । क्रम, पर्यायोक्त, परिवृत, प्रेम, अर्थान्तरन्यास, विशेषोक्ति, दीपक, निदर्शना । गणना, वक्रोक्ति, व्यधिकरणोक्ति, अमित, विपरीत, सुसिद्ध और विशेष ।


केशवदास के 'रसिकप्रिया' ग्रन्थ में रस का पर्याप्त विवेचन हुआ है।

उन्होंने रस के विभिन्न अंगों, भेदों तथा उपभेदों का चित्ताकर्षक वर्णन किया है। भाव को उन्होंने कवियों का पिता माना है। विभावों और अनुभावों को वे भावों के ही भेद स्वीकार करते हैं। अनुभावों में उन्होंने उद्दीपन को सर्वाधिक महत्त्व दिया है। केशवदास के अनुसार सात्विक अनुभाव आठ हैं तथा संचारी भाव पैंतीस हैं। केशवदास की दृष्टि में शृंगार रसराज है । 'रसिकप्रिया' में विवेचित आठ रस शृंगार के ही अंग हैं। रसवादी न होते हुए भी कवि आचार्य केशवदास ने रस परिपाक अत्यन्त कुशलतापूर्वक दिखलाया है।