मिथक की परिभाषा - definition of myth

मिथक के सम्बन्ध में अनेक पाश्चात्य एवं भारतीय समीक्षकों ने गम्भीर चिन्तन किया है। पहले पाश्चात्य विचारकों द्वारा की गई मिथक की परिभाषाओं का अध्ययन कर लिया जाए-


युंग के अनुसार " मिथक पहला, अग्रवर्ती और प्रधान चितिपरक तत्त्व है, जो आत्मा की प्रकृति का उद्घाटन करता है।" (मनोवैज्ञानिक और मिथकीय आलोचना : डॉ. पाण्डेय शशि भूषण शीतांशु के पृ. 114 से उद्धृत) ।


अर्नस्ट कैसिरेर के मत से "मिथकीय संसार नाटकीय संसार होता है। क्रिया व्यापारों, शक्ति ऊर्जाओं और संघर्षपरक शक्ति क्षमताओं से भरा संसार ।

मिथकीय कल्पनाओं में विश्वास अन्तर्भुक्त होता है । (मनोवैज्ञानिक और मिथकीय आलोचना : डॉ० पाण्डेय शशि भूषण शीतांशु के पृ. 115 से उद्धृत) ।


मार्क शोरर के अनुसार "मिथक एक बृहत् नियन्त्रक बिम्ब है जो सामान्य जीवन के तथ्यों को दार्शनिक अर्थ प्रदान करता है। " ( मिथक और साहित्य : डॉ. नगेन्द्र के पू. 6 से उद्धृत ) ।


रिचर्ड चेज के अनुसार - "एक मिथक एक कहानी है, वृत्तान्त या काव्य साहित्य है, यह एक कला है, महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह उसी सीमा तक किसी संज्ञान या पद्धत्ति,

किसी विचार या चिन्तन की व्यवस्था और किसी जीवन का मार्ग है, जिस सीमा तक कोई भी कला है।" (मनोवैज्ञानिक और मिथकीय आलोचना के पृ.- 115 से उद्धृत)।


बेलेक और वारेन के मत से "कोई भी ऐसी गुमनाम कहानी जो उत्पत्ति और नियति के विषय में बताती है, मिथक है।" (मनोवैज्ञानिक और मिथकीय आलोचना के पृ. 115 से उद्धृत) ।


भारतीय समीक्षकों ने भी मिथक को भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्त किया है।

उनकी मान्यता है कि मिथक शब्द का प्रयोग देवी-देवताओं अथवा अति प्राकृत पात्रों, और मानव जीवन के परे, किसी (सु) काल की असाधारण घटनाओं एवं परिस्थितियों से सम्बद्ध आख्यानों के लिए होता है।


आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार "मिथक तत्त्व वास्तव में भाषा का पूरक है। सारी भाषा इसके बल पर खड़ी है। आदि मानव के चित्त में संचित अनेक अनुभूतियाँ मिथक के रूप में प्रकट होने के लिए व्याकुल रहती हैं। ... मिथक वस्तुतः ऐसे सामूहिक मानव भाव निर्मात्री शक्ति की अभिव्यक्ति है जिसे कुछ मनोवैज्ञानिक 'आर्किटाइपल इमेज' आद्यबिम्ब कहकर सन्तोष कर लेते हैं।" (डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रन्थमाला, खण्ड-7, पृ. 85)।


डॉ० नगेन्द्र के मत से "मिथक का अर्थ है ऐसी परम्परागत कथा जिसका सम्बन्ध अतिप्राकृत घटनाओं और भावों से होता है। मिथक मूलतः आदिम मानव के समष्टि मन की सृष्टि है जिसमें चेतन की अपेक्षा अचेतन प्रक्रिया का प्राधान्य रहता है। मिथक की रचना उस समय हुई जब मानव और प्रकृति के बीच विभाजक रेखा स्पष्ट नहीं थी दोनों एक सार्वभौम जीवन में सहभागी थे।" (मिथक और साहित्य, पृ. 7 ) । -


डॉ॰ विजयेन्द्र स्नातक के अनुसार "मिथक तत्त्व माया की भाँति ही मनुष्य की निश्चित सर्जना शक्ति का विलास है। यह ऊपर से देखने में असत्य या अन्धविश्वास भले प्रतीत हो,

किन्तु गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर उसमें किसी प्रच्छन्न या परोक्ष सत्य को पा लेना कठिन नहीं है।" (भारतीय मिथक, कोश भूमिका) ।


डॉ. शीतांशु के मत से "मिथक आत्मा की प्रकृति की उद्घाटिका एक चितिपरक सत्ता है। यह अचेतन की चेतन अभिव्यक्ति और ब्रह्मा की अथक शक्तियों की सांस्कृतिक विवृत्ति है। यह अघटनीय की सम्भाव्यता, उत्पत्ति और नियांत विषयक गुमनाम कथा और वर्तमान की संगति के नजरिए से अतीत की की गई निर्वचन व्याख्या है। उसमें नाटकीयता, संघर्षपरक शक्ति क्षमता व विश्वसनीयता के तेवर मिलते हैं।" (मनोवैज्ञानिक और मिथकीय आलोचना, पू. - 115 ) ।


डॉ. रमेश कुन्तल मेघ के अनुसार "मिथक वाक् का एक आद्य / पुरातन रूप है जो बाद में समझ में नहीं आई। इस वाक् (भाष) का अर्थ रूपक, अन्योपदेश (एलिगरी), नीतिकथा (पैरेबल्स), कर्मकाण्ड (रिचुअल), आद्यबिम्ब (रूप) के धुँधले चिह्नों या संकेतों की अधिभाषा (मेटा लैंग्वेज) तथा आदिभाषा (प्रोटो-लैंग्वेज) तथा रूपकात्मक भाषा (मेटा- फारिकल लैंग्वेज) के मिथिधुंध में झिलमिलाता, कँपकँपाता रहता है। अतः इसका उद्गम (भाषा की ) अर्थभ्रान्ति में ढूँढ़ा जाता रहा है, ('वह तेजस पुरुष उषा रमणी का अरुणोन्मत्त होकर पीछा कर रहा है' = सूर्य उषा के बाद उगता है।) अतः मिथक का अर्थ गोपित, ग्रंथित, कूटस्थ, अवगुण्ठित होता है। इसके विश्लेषण की कई आधुनिक विधियाँ विकसित हुई हैं।" (साक्षी है सौन्दर्य प्राश्निक, पृ. 285 ) ।


डॉ. पशुपति नाथ उपाध्याय के मत से "मिथक आदिम मानव मस्तिष्क की प्राकृतिक संवेदना है जिसमें कथात्मकता की अभिव्यक्ति होती है। मिथक पुरामानव के आनुभविक वैचारिक रहस्यमय प्राकृतिक तथ्यों की कथात्मक अभिव्यक्ति है। इसमें धार्मिक एवं अलौकिक तथ्यों, कथ्यों एवं सत्यों की सहजानुभूति की प्रस्तुति होती है।" ( मिथकीय समीक्षा, पृ. 49 ) ।


उपर्युक्त परिभाषाओं लक्षणों का अध्ययन करने के उपरान्त कहा जा सकता है कि मिथक आदिम - मानव मस्तिष्क की एक प्रतीक मूलक वर्णनात्मक कथा है जिसमें मानव जाति के अवचेतन के सामूहिक अनुभव के कर्मकाण्डीय एवं अनुष्ठानिक संस्कार आस्था विश्वास एवं निष्ठा के साथ सुरक्षित होते हैं। मिथक के सम्बन्ध में कहा जा सकता है-


मिथक का रूप कथात्मक होता है जिसमें आस्था एवं विश्वास का भाव निहित होता है। मिथक के लिए दन्तकथा, पुरावृत्त, धर्मगाथा, पुराकथा और पुराख्यान शब्दों का ही प्रयोग किया जाता है।


मिथक की रचना में कल्पना का अनिवार्य योगदान होने पर ही उसकी प्रतीति सत्य रूप में ही होती है।


मिथक में प्रकृति का मानवीकरण होता है। दैनन्दिन अनुभवों के तथ्यों की मिथकों से रूपान्तरित करने वाला सर्वप्रथम कारण प्रकृति की चेतनता है,

जिसका सर्वोच्च रूप मानवीकरण को माना जाता है। मिथक में मानव का प्रकृतीकरण ही होता है। अवतारों एवं लोकनायकों के चरित्र में इसे देखा जा सकता है। मानवीय मुखमण्डल के चारों ओर सूर्य और चन्द्रमा की शान्त दिव्य ज्योति के वलय का निरूपण मिथकीय उत्स से ही होता है।


मिथकों में लोकमंगल एवं लोककल्याण काभाव निहित होता है।


प्रबन्ध रचनाओं में मिथक जनश्रुति, लोकास्था, पुराख्यान या महान् व्यक्तियों के आदर्शों पर आधारित होते हैं ।