प्रगतिशील कवियों की जनवादी एवं सामाजिक चेतना - Democratic and social consciousness of progressive poets
हिन्दी साहित्य के सुधी पाठकों, आप 'प्रगतिशील कवियों की जनवादी चेतना, सामाजिक चेतना' के सघन पक्ष की पड़ताल करना चाहते हैं। अब तक आप प्रगतिशीलता की अवधारणा, प्रगतिवाद का मूलभाव, प्रगतिवाद का वैचारिक आधार का अध्ययन कर चुके हैं। यहाँ प्रगतिशील कवियों की रचनाओं के माध्यम से उनका मूल्यांकन करने का प्रयास कियाजाएगा। किन्तु इस कार्य को सम्पन्न करने से पहले 'जनवादी चेतना' और 'सामाजिक चेतना' के आशय को समझना बहुत जरूरी है, उसके बाद प्रगतिशील कवियों और उनकी रचनाओं का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया जाएगा।
यहाँ 'चेतना' शब्द केन्द्रीय स्थिति में है और व्यापक अर्थ में 'चेतना' का प्रयोग बोध, बुद्धि, सुधि, मनोवृति, स्मृति, होश, संज्ञा, जीवन्तता, ज्ञानात्मक मनोवृति आदि शब्दों के समान किया जाता है। इसे मनुष्य के मानस की प्रमुख विशेषता के रूप में ग्रहण किया जाता है और इसका सम्बन्ध जीवनगत विषयों एवं व्यवहारों के ज्ञान से है । चेतना सामाजिक संसर्ग से विकसित होती है और मनुष्य चेतना के कारण उत्पन्न प्रेरणा से ही किसी कार्य में संलग्न होता है। किसी मनुष्य की चेतना उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति न होकर सामाजिक उपक्रम का परिणाम होती है। चेतना के तीन स्तर माने जाते हैं चेतन, अवचेतन और अचेतन। इनमें से चेतन सहज सुलभ स्तर है,
जिसके द्वारा मनुष्य सोचता, समझता और दैनिक कर्म में संलग्न होता है। सामाजिक दृष्टि से मनुष्य जड़ता और अपूर्ण चेतना से पूर्ण चेतना की दिशा में निरन्तर गतिशील रहता है। साहित्य और समाज के सन्दर्भ में यही चेतना स्वयं और अपने आस-पास के वातावरण और उससे सम्बद्ध जटिल जीवन को समझने और मूल्यांकन करने की शक्ति उत्पन्न करती है।
सामाजिक चेतना व्यक्तिमूलक और समाजमूलक दोनों रूपों में प्रकट होती है। इनमें से व्यक्तिमूलक सामाजिक चेतना मनुष्य के व्यक्तित्व के दो छोरों की सूचक है- एक छोर उसके क्षुद्र व्यक्तित्व को दर्शाता है,
जबकि दूसरा छोर उसके विराट् व्यक्तित्व को सजग व्यक्ति जितने बृहत्तर स्तर पर सामाजिक चेतना से जुड़ता जाता है उसका जीवन उतना ही समाज सापेक्ष होता जाता है। बल्कि गौर से देखा जाए तो मनुष्य की सामाजिक चेतना और उसके बौद्धिक चिन्तन का स्वरूप समाज की भौतिक-आर्थिक परिस्थितियों द्वारा निर्मित होता है।
सामाजिक चेतना के समानान्तर साहित्य में जनवादी चेतना का भी उल्लेख किया जाता है। यहाँ जनवाद कला, साहित्य और जीवन के प्रति एक विशिष्ट दृष्टिकोण का सूचक है, जिसमें जन सामान्य को महत्त्व दिया जाता है और मानव मंगल की भावना इसका केन्द्रीय विषय है।
इसी कारण क्षुद्र व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय के आदर्श को प्राप्त करना इसका चरम लक्ष्य है। कल्पित स्वर्गिक आनन्द का आकांक्षी न होकर जनवाद भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है। जनवादी दर्शन के अनुसार संसार के सुख-साधनों पर व्यक्ति या वर्ग-विशेष के एकाधिकार के परिणामस्वरूप अन्य व्यक्ति या वर्ग अपने नैसर्गिक अधिकारों से वंचित हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में मनुष्य की सामूहिक प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। इसीलिए जनवाद सुख-साधनों के सम्यक् और समान वितरण की माँग करता है तथा राष्ट्र की पूँजी पर सबके बराबर अधिकार की वकालत करता है।
इस विवेचन से जनवाद समाजवाद का समानार्थी प्रतीत होता है और हिन्दी की प्रगतिशील कविता में जनवादी स्वर स्वभाविक रूप से व्यक्त हुआ है। हिन्दी की प्रगतिशील कविता के सन्दर्भ में जनवादी चेतना वह इंकलाबी चेतना है जो मानव की व्यापक संभावनाओं के विकास के महान् भविष्य के प्रति गहरी आशा और दृढ़ विश्वास रखती है। साथ ही जो वर्तमान की सचेतन कसौटी पर आम जन की जटिल शोषण प्रक्रिया को ध्वस्त करने का जोखिम लेती है। यह मानव समूह के अधिकार और आजादी की वकालत ही नहीं करती, बल्कि उसमें क्रान्तिशीलता और सामूहिक शक्ति में विश्वास का भाव भी भरती है। यह समाज के सन्दर्भ में ऐसी परिवर्तनकारी चेतना है जो शोषण व्यवस्था सामन्तवादी,
पूँजीवादी, साम्राज्यवादी, छद्म-समाजवादी का खुलकर विरोध करती है और जन समुदाय को जाग्रत् कर विरोधियों के विनाश के लिए प्रेरित करती है। लल्लन राय के शब्दों में- "जनवादी चेतना निश्चित रूप से जन-चेतना है, जो अपने आधार, स्वरूप और मूल प्रकृति में वामपंथी वर्गीय चेतना है। वर्गीय विषमता से ग्रस्त समाज में यह वर्ग-चेतना रचनाकार को वास्तविक जन-गण के करीब ले जाती है, जनता से एकात्म करते हुए उसे यह समझा देती है कि जनता ही उसकी शक्ति और प्रेरणा का मूल स्रोत हैं। जनता की जिंदगी, उसकी भूख-प्यास, आशा-आकांक्षा आदि मात्र उसके लेखन का विषय नहीं वरन् वही उसकी अपनी वास्तविक आशा-आकांक्षाएँ भी हैं।"
सचमुच जनवादी कविता जन-जन की भावनाओं का दर्पण है। धूमिल की मानें तो "जनवादी कविता से हमारा तात्पर्य उस कविता से है, जो जनता के मानसिक परिष्कार, उसके आदर्श और मनोरंजन से लेकर क्रान्ति- पथ की तरफ मोड़ने वाला, प्राकृतिक शोभा और प्रेम शोषण और सत्ता के घमण्ड को चूर करने वाला, स्वतन्त्रता और मुक्ति गीतों को अभिव्यक्ति देने वाला, ये सभी कोटियाँ जनवादी काव्य की हो सकती हैं। बशर्ते वह मन को मानवीय, जन को व्यापक जन बना सके।" इन कथनों के आलोक में हिन्दी की प्रगतिशील कवियों की जनवादी और सामाजिक चेतना के निम्नलिखित आयाम निर्धारित किए जा सकते हैं सामाजिक विसंगतियों का उद्घाटन,
किसान एवं मजदूरों की दशा का चित्रण, शोषितों- उपेक्षितों के प्रति सहानुभूति, जातिवाद का खण्डन, मानवीय मूल्यों का प्रतिपादन नारी की दासता का निरूपण, दलित जीवन की पीड़ा का वर्णन एवं उनके शोषण मुक्ति का पथ-प्रदर्शन, आर्थिक विषमता का खण्डन, वर्गीय दृष्टिकोण का विश्लेषण, मार्क्सवादी साम्यवादी एवं प्रगतिवादी चिन्तन, व्यवस्था के दमन और तानाशाही रवैये का पर्दाफाश करना, संघर्ष और क्रान्ति की शक्ति का निरूपण, सामन्ती मूल्यों, ईश्वरीय सत्ता, अन्धविश्वासों आदि के प्रति नकार भाव, राजनैतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध हल्ला बोल, स्वतन्त्रता, लोकतन्त्र, संविधान और कानून के खोखलेपन पर प्रहार,
जन-विरोधी तत्त्वों के प्रति आक्रोश, जन- शक्ति में विश्वास, उत्कट जिजीविषा, संघर्षशीलता और क्रान्तिकारी तेवर, सहज और सरल भाषा, लोक शैली, लोक-लय, लोक धुन आदि। हिन्दी की प्रगतिशील कविता में इन विशेषताओं की खोज-खबर ली जा सकती है, ताकि इस विचारधारा से जुड़े कवियों का सही-सही मूल्यांकन किया जा सके।
चूँकि पिछली इकाई में प्रगतिवादी कविता की प्रवृतियों पर विस्तार से विचार किया गया था, इसलिए यहाँ फिर से प्रवृतिमूलक विवेचन नहीं किया जाएगा। इस इकाई का मूल विषय प्रगतिशील कवियों की जनवादी और सामाजिक चेतना है। अतः इस इकाई में प्रगतिशील कवियों में से तीन प्रमुख कवियों के रचनात्मक वैशिष्ट्य को यहाँ उद्धृत किया जा रहा है।
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