द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद - dialectical materialism
'डायलेक्टिक' शब्द का प्रयोग सत्य पर पहुँचने की उस पद्धत्ति के लिए होता था जिसमें दो विरोधी दल वाद- विवाद और खण्डन-मण्डन द्वारा अपने-अपने पक्ष का समर्थन करते थे।"17 हीगेल की दृष्टि में 'डायलेक्टिक' पद्धत्ति द्वारा परिवर्तन और विकास के सिद्धान्त को समझा जा सकता है। परिवर्तन में विकास के बीज सन्निहित रहते हैं। इस परिवर्तन से विकास का एक नवीन सजीव रूप प्रकट होता है। हीगेल ने निरपेक्ष ब्रह्म की कल्पना की और हीगेल विचार को मुख्य मानकर बाह्य संसार को उसी का रूप मानता था। मार्क्स ने हीगेल के उत्पत्ति,
परिवर्तन और विकास के सिद्धान्त को तो स्वीकार कर लिया परन्तु उसकी निरपेक्ष ब्रह्म की कल्पना को मानने से इनकार कर दिया। मार्क्स के अनुसार जगत् के इतिहास की व्याख्या आर्थिक आधार को ही लेकर की जा सकती है निरपेक्ष ब्रह्म के अनुसार नहीं। एक अन्य जर्मन दार्शनिक फायर बाख (1804-72) हीगेल के मत का खण्डन कर भौतिकवाद को जन्म दे चुका था। फायर बाख की मान्यता थी कि किसी वस्तु के बिना उसका बोध नहीं हो सकता । हीगेल के अनुसार मनुष्य प्राकृतिक विकास की एक कड़ी है, परन्तु मार्क्स ने मनुष्य को यन्त्र मात्र न मानकर उसे चेतना माना है । उसकी सम्मति में मनुष्य वातावरण की उपज नहीं है बल्कि वह वातावरण बदल देने की आधार क्षमता रखता है।
मार्क्स ने उपर्युक्त दोनों सिद्धान्तों का समन्वय कर अपने मत का आधार भौतिकवाद को बनाया और निरूपण की प्रणाली द्वन्द्वात्मक रखी।
हीगेल और फायर बाख, दोनों ने वर्ग संघर्ष का उल्लेख नहीं किया। वर्ग संघर्ष की व्याख्या सर्वप्रथम चार्ल्स हाक नामक एक अंग्रेज ने की थी। उनकी राय में युद्धादि पूँजीपतियों के आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए होते हैं। अगर देश में शासन के घोड़े पर गरीब सवार हो जाए तो युद्ध स्वतः समाप्त हो जाएगा।
संक्षेप में मार्क्स ने हीगल की द्वन्द्वात्मक पद्धत्ति ली, फायरबाख से भौतिकवाद लिया और हाक से वर्ग- संघर्ष ग्रहण किया।
मार्क्स की दृष्टि में सृष्टि में दो तत्त्व प्रधान हैं स्वीकारात्मक (पॉजिटिव) और नकारात्मक - (निगेटिव)। इन दोनों तत्त्वों के संघर्षों का नाम ही 'जीवन' है। इन्हीं के संघर्ष से चेतना पैदा होती है। इस चेतना का मूलाधार पदार्थ है। उपरोक्त दोनों विरोधी तत्त्व पदार्थ में स्थित रहकर संघर्ष करते रहते हैं जिससे उसमें चेतना उत्पन्न होती है, यह चेतना द्वन्द्व का परिणाम है। इसी कारण इसे द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद कहा जाता है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि मार्क्स के पहले किसी ने भी सबल स्वर में जगत् की विशेषता का मूल कारण अर्थ का असमान विभाजन नहीं बताया था और न ऐतिहासिक आधार पर रेखांकित और व्याख्यायित किया था।
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