प्रयोगवाद और नकेनवाद का अन्तर - Difference between Empiricism and Nakenism
'तारसप्तक' की भूमिका में अज्ञेय का यह कथन लगभग सारी बातें स्पष्ट करता है- "तारसप्तक किसी गुट्ट का प्रकाशन नहीं है क्योंकि संगृहीतसात कवियों के साढ़े सात अलग-अलग गुट्ट हैं, उनके साढ़े सात व्यक्तित्व हैं। ... सातों अन्वेषी हैं। काव्य के प्रति अन्वेषी का दृष्टिकोण उन्हें समानता के सूत्र में बाँधता है.... बल्कि उनके एकत्र होने का कारण ही यह है कि वे किसी एक स्कूल के नहीं हैं, किसी मंजिल पर पहुँचे हुए नहीं हैं, अभी राही हैं। - राही नहीं, राहों के अन्वेषी । " 17
इस पृष्ठभूमि पर विशुद्ध प्रयोग की पक्षधरता करते हुए बिहार के तीन कवियों नलिन विलोचन शर्मा, - केसरी कुमार और नरेश ने 1956 में 'नकेन के प्रपद्य' का प्रकाशन कर प्रयोगवाद की टक्कर में 'प्रपद्यवाद' नामक आन्दोलन का आरम्भ किया।
इन तीनों कवियों ने नामों के प्रथमाक्षरों को मिलाकर 'नकेन' शब्द गठित किया गया था। इसलिए यह 'प्रपद्यवाद' और 'नकेनवाद' दोनों नामों से जाना जाता है। 'प्रयोगवादी पद्य' की अवधारणा को आगे बढ़ाने के लिए 'पद्म' के साथ 'प्र' जोड़ा गया था। प्रपद्यवादियों ने स्वयं को विशुद्ध प्रयोगवादी और अज्ञेयादि को प्रयोगशील घोषित किया। प्रपद्यवाद के तीनों कवि उच्चशिक्षित थे और पश्चिम की विविध विचारधाराओं तथा काव्यान्दोलनों के जानकार थे। अतः उन्होंने अत्यन्त योजनाबद्ध रूप में 'प्रपद्यवाद' का सूत्रपात किया ।
प्रयोगवाद और नकेनवाद के बीच सबसे पहला अन्तर तो यही कहा जा सकता है कि जहाँ प्रयोगवाद के प्रतिनिधि संकलन 'तारसप्तक' की न कोई सुनियोजित प्रकाशन योजना थी न समविचारी कवियों की सोची-समझी नीति जैसा कि अज्ञेय के उपर्युक्त कथन से स्पष्ट होता ही है। वही दूसरी ओर 'नकेनवाद' अत्यन्त सुनियोजित ढंग से स्थापित किया गया वाद था। 'नकेन' के केसरी कुमार को इस बात पर आपत्ति थी कि हिन्दी आलोचकों ने अज्ञेय को प्रयोगवादी कविता का व्याख्याकार घोषित किया। वास्तविकता यह कि सर्वप्रथम प्रयोगवादी कविताएँ 'नकेन' की ही हैं जबकि अज्ञेय ने कहीं भी उनके नाम का उल्लेख नहीं किया।
अतः 'नकेन' की ओर से विशुद्ध प्रयोगवाद अर्थात् नकेनवाद की स्थापना हेतु प्रयोग की दशसूत्री का प्रस्तुतीकरण किया गया। यह एक तरह से 'नकेन' द्वारा जारी किया गया प्रयोगवाद का मेनीफेस्टो था। इसका प्रारूप निम्न प्रकार है-
i. प्रपद्य भाव और व्यंजना का स्थापत्य है ।
ii. प्रपद्य सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र है। उसके लिए शास्त्र या दल निर्धारित नियम अनुपयुक्त हैं।
iii. वह महान् पूर्ववर्तियों की परिपाटियों को निष्प्राण मानता है। iv. वह दूसरों से भी अधिक अपना अनुकरण वर्जित समझता है।
V. उसे मुक्त काव्य नहीं, स्वच्छन्द काव्य की स्थिति अभिष्ट है।
vi. प्रयोगशील प्रयोग को साधन मानता है जबकि प्रपद्यवादी साध्य ।
vii. प्रपद्यवाद की दृक्वाक्यपदीय प्रणाली है।
viii प्रपद्यवाद के लिए जीवन और कोष कच्चे माल की खान है। ix प्रपद्यवादी प्रयुक्त प्रत्येक शब्द और छन्द का स्वयं निर्माता है।
X. प्रपद्यवाद दृष्टिकोण का अनुसंधान है।
पश्चात् इस दशसूत्री में दो और सूत्र जोड़ दिए गए-
i. प्रपद्यवाद मानता है कि पद्य में उत्कृष्ट केन्द्रण होता है और यही गद्य और पद्य में अन्तर है।
ii प्रपद्यवाद मानता है कि चीजों का एकमात्र सही नाम होता है।
इस द्वादशसूत्री के आधार पर प्रपद्यवाद का प्रयोगवाद के विपरीत अतियोजनाबद्ध होना सिद्ध होता है। मात्र इतना ही नहीं, पश्चात् जब 'नकेन-2' का प्रकाशन किया गया तो उपर्युक्त 12 सूत्रों के साथ पुनः छह नये सूत्र जोड़कर 'प्रपद्य अष्टादशसूत्री' की घोषणा की गई। ये छह नये सूत्र इस प्रकार हैं-
i. प्रपद्यवाद आयाम की खोज है और अभिनिष्क्रमण भी ठीक वैसे, जैसे वह भाव और व्यंजना का स्थापत्य है और उससे अभिनिष्क्रमण भी।
ii. प्रपद्यवाद चित्रेतना है।
प्रपद्यवाद मिथक का संयोजन नहीं, स्रष्टा है।
iv. प्रपद्यवाद बिम्ब का काव्य नहीं, काव्य का बिम्ब है।
V. प्रपद्यवाद सम्पूर्ण अनुभव है।
vi. प्रपद्यवाद अविभक्त काव्य-रुचि है।
प्रपद्यवाद के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए तीनों कवियों ने समय-समय पर कुछ वक्तव्य जारी किए। जैसे नलिन विलोचन शर्मा ने विनोद भाव से एक द्विपदी रची-
दिल तो बेकार हुआ जो कुछ है सो ब्रेन गाय हुई बकेन है, कविता हुई नकेन 18
'दिल' के बेकार और 'ब्रेन' के सर्वेसर्वा होने का संकेत इस कविता ने स्पष्ट किया।
'नकेन' के 'पस्पशा' में केसरी कुमार ने प्रपद्यवाद की व्याख्या इस प्रकार की "तो प्रयोगशील, - प्रयोगप्रधान, प्रयोगात्मक आदि शब्दों की धारणा से अलग प्रयोगवाद या प्रपद्यवाद की धारणा है। प्रपद्यवाद मात्र प्रयोग नहीं है चाहे वह किसी वस्तु का हो,
प्रपद्यवाद प्रयोग का दर्शन है। सही है कि प्रयोग सभी युगों में हुए हैं पर अभी-अभी प्रयोग को काव्य का साध्य कहा गया है। इस प्रकार आज प्रयोग की स्थिति निश्चित है। " 19 नकेनवाद में कविता को अत्यधिक बौद्धिक बनाने का उपक्रम किया गया। कविता में भावुकता का स्थान ही गायब हो गया। प्रयोगवाद भी बुद्धिप्रधान कविता को महत्त्व देता है किन्तु उसमें बौद्धिकता उस प्रकार सर्वोपरि नहीं रही जैसे ननवाद में इस अन्तर के अलावा प्रयोगवाद और नकेनवाद की मान्यताओं में कई बार ज़मीन आसमान का सा अन्तर उभरकर आता है।
नकनवादियों ने प्रयोग को साधन समझनेवाले प्रयोगवादियों को 'प्रयोगशील' माना और प्रयोग को 'साध्य' मानते हुए स्वयं को विशुद्ध प्रयोगवादी घोषित किया। प्रयोग को साध्य और कविता को नितान्त बौद्धिक वस्तु मानने के कारण नकेनवाद जनसामान्यों की पहुँच के बाहर की वस्तु बना रहा। दूसरी ओर अज्ञेय 'स्वान्तः सुखाय' रचना-सिद्धान्त को अमनोवैज्ञानिक बताते हुए सफल अभिव्यक्ति के लिए 'ग्राहक, पाठक या श्रोता' का अस्तित्व अनिवार्य मानते हैं। अज्ञेय तो 'काव्य-लेखन और प्रेषण' में "यह अनुभव अद्वितीय जो केवल मैंने जिया, सब तुम्हें दिया" की प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण मानते हैं।
केसरी कुमार ने ननवाद की कविता सम्बन्धी मान्यताओं को स्पष्ट करते हुए कहा है- "प्रयोग के बाद से तात्पर्य यह है कि वह भाव और भाषा,
विचार और अभिव्यक्ति, आवेश और आत्मप्रेषण, तत्त्व और रूप, इनमें से कई में या सभी में प्रयोग को अपेक्षित मानता है। "20 प्रपद्यवादी न केवल सतत प्रयोग अपनाते हैं बल्कि प्रयोग को ही अपना एकमात्र लक्ष्य मानते हैं। प्रयोग ही कविता बन जाए तो कोई 'कविता' के निर्माण के लिए कोशिश क्यों करेगा? प्रपद्यवादियों ने कई बार प्रयोग के नाम पर अत्यधिक जटिल और अनर्गल रचनाओं का निर्माण किया। इस सन्दर्भ में 'नकेन' की एक स्वीकारोक्ति द्रष्टव्य है "सही है कि प्रयोगवाद के नाम पर बहुत सस्ती चीजें भी और लब्धप्रतिष्ठ व्यक्तियों द्वारा सम्पादित पत्र-पत्रिकाओं तक में छपने लगी हैं। और ऐसी रचनाएँ भी आलोचकों के लिए प्रयोगवाद के विश्लेषण तक का आधार बन रही है।
यहाँ मैं वैसी आलोचनाओं का उल्लेख आवश्यक समझता हूँ, जैसी उदाहरण के लिए उत्तरप्रदेश के नामवर सिंह जैसे लोग नकेनवाद के सम्बन्ध में करते पाए जा सकते हैं"?" चाहे जिस सन्दर्भ और भाव-भूमिका के साथ अपनी रचनाओं की अनर्गलता का स्वीकार 'नकेन' में किया गया, बावजूद इसके, वे अपनी भूमिका पर अडिग रहे। उनकी दृष्टि में कविता भावना या दर्शन की निष्पति नहीं, वह नये विचारों और नये शब्दों से भी नहीं लिखी जाती बल्कि इनके केन्द्रण से गठित होती है। दैनन्दिन भाषा-व्यवस्था को व्यतिरेकित करके ही इसे पाया जा सकता है। दैनन्दिन जीवन की भाषा और अनुभव के आगे की भाषा व अनुभव को कविता प्रकट करती है।
प्रयोग के प्रति इस प्रकार का अतिवादी जुनून अज्ञेय और सहयोगियों में नहीं। उनके लिए वास्तव में प्रयोग एक ऐसा साधन रहा जिसके अन्तर्गत जीवन से जुड़ने का (सुलभ नहीं किन्तु) नया रास्ता अपनाया जाता है। नकेनवादी तो ऐसा कोई रास्ता शेष ही नहीं रखते जिस पर सामान्य भावकों के चलने की कोई गुंजाइश बचे।
अज्ञेय समेत सभी प्रयोगवादी कवियों ने वस्तुतः साधारणीकरण का विरोध नहीं किया । वे केवल साधारणीकरण की प्रक्रिया में परिवर्तन चाहते थे। दूसरी ओर प्रपद्यवादी थे जिन्होंने समूचे साधारणीकरण को ही नकार दिया।
उन्होंने कविता में विशिष्टीकरण का नारा दिया। साधारणीकरण और रसग्रहण की प्रक्रिया में कवि और पाठक की एक ही भाव-सत्ता में उपस्थिति, एक ही भावभूमि पर खड़ा होना अनिवार्य होता है। प्रपद्यवादियों ने न भाव-सत्ता को स्वीकारा न रसानुभूति को । उन्होंने कविता को वैयक्तिक वस्तु माना, सार्वजनिक नहीं । वे अपनी ऐसी निजी अनुभूतियों और शब्दार्थों पर बल देते हैं जिनमें साधारणीकरण के लिए कोई स्थान नहीं । वे कविता में जिस विशिष्टीकरण पर जोर देते हैं, उसका आधार विज्ञान है। नलिन विलोचन शर्मा मानते हैं कि कवि के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विज्ञानसम्मत दर्शन आवश्यक होता है क्योंकि कविता का उद्देश्य सत्य का संधान है ।
अतः ज्ञान के अन्य क्षेत्रों में जिस प्रकार विशिष्टीकरण आवश्यक होता है, उसी प्रकार कविता में भी विशिष्टीकरण अनिवार्य है। बुद्धि और ज्ञानप्रधानता का कविता में क्या स्थान है, यह बताते हुए केसरी कुमार ने लिखा है "जब कविता अपने समय की बौद्धिकता से सम्पर्क विच्छेद कर लेती है, तब भाव प्रवण जाग्रत्-मति समाज की उसमें दिलचस्पी नहीं रहा जाती। यह अत्यन्त खेदजनक स्थिति है, क्योंकि यह समाज यद्यपि अल्पसंख्यकों का होता है, पर यही बड़े समाज को गति देने वाला सिद्ध होता है। "22
'बड़े समाज को गति देने वाले' अल्पसंख्यक समाज की बुद्धिवादिता में विशिष्टीकरण ही अहम रहेगा। यहाँ भला साधारणीकरण को क्या स्थान ?
अज्ञेय और उनके सहयोगी कवियों का प्रयोगवाद पूर्णतः निर्दोष कदापि नहीं कहा जा सकता। किन्तु ननवाद-के-से दोषों से प्रयोगवाद बहुत हद तक मुक्त था। 'नकेनवाद' मानों अतिवाद का दूसरा नाम बनकर उभर आया। अपनी 'फक्किका' अर्थात् टिप्पणी से ही उन्होंने उटपटाँग चमत्कार निर्मिति आरम्भ की। जिस रूप में उन्होंने अपने सूत्रों की उद्घोषणा की, उस रूप में उन्हें चरितार्थ नहीं किया। दूसरी ओर सूत्र भी ऐसे थे जिनमें वायवीपन अत्यधिक मात्रा में भरा हुआ था। प्रपद्यवादी अपने पहले ही सूत्र में कहते हैं कि प्रपद्यवाद भाव और व्यंजना का स्थापत्य है । नयेपन का अतिरेकी आग्रह करनेवाले प्रपद्यवादी यह बात भूल गए कि काव्य आपाततः भाव और व्यंजना का स्थापत्य ही हुआ करता है।
काव्य स्वयं स्फूर्त तत्त्व हैं। लेकिन उसे विज्ञान की भाँति नियमावली के साथ बद्ध किया गया। रचना के पहले, रचना का संविधान बनाने का यह दुराग्रह सहा भी जा सकता था किन्तु एक ओर नकेनवादी नियमावली गढ़ते हैं और दूसरी ओर सारे नियमों को धता बताने वाला "प्रपद्यवाद सर्वतन्त्र स्वतन्त्र है" जैसा सूत्र भी गढ़ते हैं। अर्थात् एक ओर नियम और तत्काल ही उसे तोड़ने का संकल्प भी प्रयोगवाद एक नियोजनहीन योजना थी किन्तु नियोजनबद्ध योजना के रूप में उभरे नकेनवाद के अन्तर्गत ऐसी विरोधाभासी स्थितियाँ सर्वथा ग्राह्य नहीं ।
पारम्परिक अथवा पुरानी परिपाटी को निष्प्राण मानने वाले प्रपद्यवाद ने भाषा, अप्रस्तुत योजना, शैली, छन्दादि में कुछ नवीन प्रयोग अवश्य किए जिनमें प्राचीन काव्यशास्त्र का आधार भी लिया गया था। इस आधार को समूल नकारने का साहस प्रयोगवादियों ने कभी नहीं किया किन्तु डंके की चोट पर उसे नकारकर, पुरानी लीक पर ही चलकर प्रपद्यवादियों ने अपनी ही बात को खोटा साबित किया। यही बात प्रपद्यवादियों द्वारा अनुकरण को नकारने के सन्दर्भ में भी लागू है।
प्रपद्यवादियों को मुक्त काव्य की नहीं, स्वच्छन्द काव्य की स्थिति अपेक्षित थी। इस वक्तव्य को कहते हुए यह बात भुला दी गई कि रचना अपने उद्भव के समय मुक्त, छन्द,
अछन्द जैसी बातें नहीं देखती। कविता में प्रयोग को ही साध्य मानने के सन्दर्भ में भी यह कहा जा सकता है कि कविता बौद्धिक व्यायाम नहीं जो उसे इतनी सजगता के साथ रचा जाए। 'जीवन और कोष' को 'कच्चे माल की खान' कहकर भी प्रपद्यवादी भ्रम व्युत्पन्न करते हैं। जीवनानुभवों से काव्य का अनुप्राणित होना तो समझा जा सकता है किन्तु 'कोष' के सन्दर्भ में (यदि नकेनवादी 'कोष' का प्रयोग 'शब्दकोश' के अर्थ में कर रहे हों तो) यह कहना होगा कि कोशगत शब्द माने काव्य नहीं न ही कोशों को उलटने-पुलटने से काव्य-सृजन सम्भव है।
आगे नकेनवादी अपने प्रयुक्त प्रत्येक शब्द और छन्द का निर्माता स्वयं को घोषित करते हैं किन्तु स्वच्छन्द की बात कहकर उन्होंने छन्द निर्माण की संभावनाओं को स्वयं ही नकारा था। छन्द- निर्माण और स्वच्छन्दता दोनों को एक ही 'फक्किका' में दर्ज कर नकेनवादियों ने अपने अन्तरर्विरोधों को ही अधोरेखित किया है। ऐसे अन्तर्विरोध (सम्भवतः घोषणा-पत्र जारी न करने के कारण) प्रयोगवादियों में कम मात्रा में पाए जाते हैं। घोषणा-पत्र व सूत्रों के अन्तर्विरोध के सन्दर्भ में डॉ. रघुवंश ने कहा है - "यदि पहले भूमिका का अध्ययन कर लेने के बाद संकलन की कविताओं को पढ़ा जाएगा, तो कठिनाई होगी।
कि इनमें भाव और व्यंजना का वह विशिष्ट स्थापत्य कहाँ है ? वह दृक्वाक्यपदीय शैली या प्रणाली कहाँ है ? इन प्रपद्यों में उत्कृष्ट केन्द्रण कहाँ है? हाँ,
यह ऐसा अवश्य लगता है कि ये सर्व तन्त्र स्वतन्त्र हैं, महान् पूर्ववर्तियों की परिपाटियों को त्याज्य मानते हैं, इनमें मनमानेपन का आग्रह है।"23 ऐसी विरोधाभासी स्थितियाँ नकेनवादियों में बराबर बनी रहीं। कट्टरता के साथ यह कवि 'वाद' के प्रचार में जुटे रहे लेकिन बाद के प्रति अपनी आग्रही भूमिका को नकारते रहे । कविता में एक ओर सतर्क बौद्धिकता का समावेश उन्हें अनिवार्य लगा तो दूसरी ओर "लापरवाही के बीच कविता मार्ग खोजती रही है", जैसे कथन भी जारी किये गए।
अपने घोषणा-पत्र, उसमें निहित सूत्रों, भाषा, छन्दादि सम्बन्धी विचार, वस्तु व संवेदना सम्बन्धी विचार आदि में कई अन्तर्विरोध समेटने के बावजूद प्रयोगवादी काव्य की एक सशक्त कड़ी होने के नाते नकेनवाद का महत्त्व नकारा नहीं जा सकता।
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