आधुनिकता और समकालीनता का अन्तर - difference between modernity and contemporary
भारत में आधुनिकता का मतलब पश्चिमी आधुनिकता या औपनिवेशिक आधुनिकता है। सन् 1857 के बाद विकसित औपनिवेशिक आधुनिकता का स्वरूप आजादी के बाद भी बदस्तूर जारी है। जिसमें आधुनिकीकरण की प्रक्रिया पश्चिमीकरण का ही प्रतिरूप है। अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भारत में आधुनिकता का अपना परिवेशगत विकास हो रहा था, जिसे हम भारतीय आधुनिकता कहते हैं उसे अंग्रेजी आधुनिकता ने नष्ट कर दिया। भारतीय कृषि, उद्योग, व्यापार, स्थापत्य और अन्य सांस्कृतिक अभियानों को बेतरह नष्ट कर पश्चिमी आधुनिकता को भारतीयों पर थोपा जिसमें विकास के नाम पर भारतीय परिवेश के अनुरूप विकसित चेतना और व्यापार को नष्ट कर पश्चिमी गुलामी की ओर ढकेल दिया।
गौरतलब बात यह है कि आजादी के बाद भी पश्चिम केन्द्रित आधुनिकता का ही विकास अधिक हुआ। भारतीय आधुनिकता कम पश्चिमी आधुनिकता के इस स्वरूप का समकालीन कविता में पुरजोर विरोध हैं जिसने मनुष्य को अकेलेपन और अमानवीयकरण की ओर उन्मुख किया है। आधुनिकता के परिवेश में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, पूँजी का अनैतिक विकास अधिक हुआ। यूरोप और अमेरिका के पूँजीवादी आधुनिकीकरण ने भारत में बौद्धिक विवेकशीलता की जगह अन्धविश्वास और अन्धविकास को अधिक फैलाया। सत्तर के दशक में यूरो केन्द्रित इस आधुनिकता का हिन्दी कविता में प्रबल विरोध दर्ज किया गया है। औपनिवेशिक आधुनिकता के प्रभाव में भारतीय जनतन्त्र के कमजोर होते रूप का मुक्तिबोध (अँधेरे में), धूमिल (पटकथा) में स्पष्ट शिनाख्त करते हैं।
समकालीनता, समसामयिकता का पर्याय नहीं है। इसी तरह समकालीनता से तात्कालिक मात्र का भी बोध नहीं होता। असल में अपने समय में हर कविता समसामयिक होती है। हिन्दी कविता में 'समकालीनता' का प्रयोग व्यापक साहित्यिक-सामाजिक-राजनैतिक सरोकार के सन्दर्भ में किया गया है। समकालीन कविता में अपने समय के तमाम अन्तर्विरोधों, आग्रहों और द्वन्दों की संवेदना है। साहित्यिक रूप में हिन्दी की पूर्ववर्ती और समसामयिक काव्यधाराओं का पुँज ही समकालीन कविता की जद में आता है। मनुष्य को केन्द्र में रखकर लिखी जाने वाली इस कविता के विविध काव्य रंग है।
समकालीन कविता के प्रतिनिधि कवि धूमिल की कविता 'मोचीराम' समकालीन काव्य संवेदना को पूरी तरह से रूपायित करती है।
जिसमें वे कहते हैं-
मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है जो मरम्मत के लिए खड़ा है।
'आधुनिकता' किसी भी देश और काल में परिवेश में विकसित वह मूल्य है जिसमें बौद्धिकता, वैज्ञानिकता, तार्किकता, मानवीयता जैसे गुण विद्यमान हैं जबकि 'समकालीनता' में समसामयिक जैसे मूल्यों के विन्यस्त होने के बावजूद वह कालबोधक अधिक होता है। हिन्दी कविता में आधुनिकता की चेतना सिर्फ़ आधुनिककाल के लिए प्रयुक्त नहीं हुआ। भक्तिकाल की आधुनिक चेतना से हम सब परिचित हैं। समकालीनता में अपने समय और समाज से जुड़ने और प्रासंगिक होने की बात अधिक है।
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