प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की काव्य-दृष्टि का अन्तर - The difference between the poetic vision of progressivism and experimentalism
प्रगतिवाद और प्रयोगवाद दोनों अलग-अलग समय में, अलग-अलग परिस्थितियों में, अलग-अलग विचारधाराओं और मानसिकताओं के कारण उपजे साहित्यिक वाद हैं। अतः बहुत स्वाभाविक बात है कि इनका काव्य की ओर देखने का दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न है। इस भिन्नता की पड़ताल हिन्दी काव्य की विकास-यात्रा को समझने के लिए अत्यावश्यक है। इस पड़ताल से पहले अनिवार्यतः यह बात ध्यान में रखनी होगी कि समय चाहे जो हो,
जब भी साहित्य में कोई नयी प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होने लगती है तो उसके मूल में विशिष्ट विचारधारा से व्युत्पन्न दृष्टि होती है। यह दृष्टि उस साहित्य में कमोबेश मात्रा में छाई रहती है। समयान्तर में जब जीवन और समाज की आवश्यकताओं के अनुसार नवीन विचारधारा अपनी जड़ें जमाने लगती है तो बहुत हद तक वह अपनी पूर्ववर्ती विचारधारा से भिन्न होती है। इस विचारधारा से प्रभावित साहित्य भी अपने पूर्ववर्ती साहित्य से भिन्न होता है। यहाँ दृष्टियों का अन्तर भिन्नता निर्माण करता है। यही कारण है कि प्रत्येक समय का साहित्य अपने पूर्ववर्ती साहित्य की प्रतिक्रिया कहलाता है।
काव्य-दृष्टियों में निहित अन्तर की पड़ताल करनी हो तो काव्य की पृष्ठभूमियों में कार्यरत विचारधाराओं की जानकारी अत्यावश्यक है। इन सभी मुद्दों पर विचार करते हुए सर्वप्रथम प्रगतिवादियों के लिए कविता क्या थी और किस विचारधारा से व्युत्पन्न थी, इस पर विचार करेंगे। पश्चात् प्रयोगवादियों ने कविता को किस अर्थ में ग्रहण किया और वह किस विचारधारा से अनुप्रेरित थी इसकी पड़ताल की जाएगी। इन दोनों काव्य-प्रवृत्तियों द्वारा अभिव्यक्त काव्य-दृष्टियों को समझने के पश्चात् इनमें निहित अन्तर स्वतः स्पष्ट हो जाएगा।
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