डॉ. रामविलास शर्मा भक्ति-काव्य : लोक-जागरण और सामन्त-विरोधी चेतना - Dr. Ram Vilas Sharma Bhakti-Poetry: Public Awakening and Anti-Feudal Consciousness
डॉ. रामविलास शर्मा मुख्यतः आधुनिक साहित्य के आलोचक हैं लेकिन हिन्दी की जातीय चेतना के विकास पर विचार करते हुए अपनी परम्परा के मूल्यांकन की दृष्टि से उन्होंने भक्ति काव्य पर भी यथेष्ट विचार किया है। भक्ति आन्दोलन को उन्होंने 'लोक-जागरण' कहा है। इस लोक जागरण से हमारी जातीय चेतना और जातीय संस्कृति को बल मिला है। जातीय चेतना किस प्रकार राष्ट्रीय चेतना के विकास में सहायक होती है, भक्ति- आन्दोलन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है जातीय चेतना का सम्बन्ध सामन्तवाद के विघटन और व्यापारिक पूँजीवाद के अभ्युदय से है। सामन्ती व्यवस्था का विरोध भक्ति-काव्य की मुख्य प्रवृत्ति है।
डॉ. शर्मा भक्ति आन्दोलन में सक्रिय कवियों को 'सन्त' और उनके साहित्य को 'सन्त-साहित्य' कहते हैं। उनके अनुसार ये सन्त लोकधर्म के संस्थापक हैं क्योंकि ये सभी तरह की कट्टरता और भेदभाव के विरुद्ध मूलतः प्रेम के आधार पर ईश्वर प्राप्ति और जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति के आकांक्षी हैं। सन्त और भक्त के भेद को निरर्थक मानते हुए डॉ. शर्मा सन्त-साहित्य में अन्तर्निहित मूलतत्त्व को रेखांकित करते हैं। वे लिखते हैं कि "सन्त-साहित्य में बहुत से भेद-उपभेद हैं। कोई सूफ़ी है, कोई वैष्णव है, कोई निर्गुणवादी है, कोई शैव है, लेकिन सभी में एक तत्त्व समान है - प्रेम जायसी, तुलसी, मीरा, कबीर इनसे प्रेम का तत्त्व निकाल दीजिए तो भेद- उपभेद बच रहेंगे।
लेकिन उनका मूल स्वर नष्ट हो जाएगा। इसलिए सन्त और भक्त का भेद करना भ्रम है। सन्तों और जायसी जैसे प्रेममार्गी कवियों में मौलिक भेद करना सही नहीं है। इस प्रेम के आधार पर ही हिन्दू और मुसलमान, छूत और अछूत सब मिलकर एक हुए थे। कबीर निर्गुणवादी सन्त हैं तो भक्त भी ।... तुलसीदास भक्त कवि हैं तो सन्त भी।" (- 'विराम चिह्न)
सन्त-साहित्य में विद्यमान भाग्यवाद, मायावाद और निष्क्रियता आदि की भावनाओं को डॉ० शर्मा उस युग की सीमाएँ मानते हैं। उनके अनुसार ये भावनाएँ सन्त-साहित्य की सच्ची परम्परा नहीं है। सामन्त-विरोधी चेतना और लोकधर्मिता ही सन्त-साहित्य की सच्ची परम्परा है।
डॉ. शर्मा ने तुलसीदास को भारत का श्रेष्ठ और अमर कवि कहा है। उनके अनुसार तुलसी की सामाजिक दृष्टि मानस के पात्रों के आचरण में देखी जा सकती है। तुलसी की दृष्टि जीवन को सुखी और सार्थक बनाने वाली लोकोन्मुख दृष्टि है। तुलसी को परलोक से अधिक चिन्ता इस लोक की थी। इसलिए वे इसी जीवन में, इसी संसार में रहते हुए संसार के बन्धनों से मुक्त होने की बात करते हैं। तुलसी के काव्य को जीवन की स्वीकृति और सामन्ती शोषण के सक्रिय विरोध का काव्य मानते हुए डॉ. शर्मा तुलसी के व्यक्तित्व के दो पक्ष बताते हैं - एक है उनका दैन्य और दूसरा उनका गर्व, उनकी आत्मसम्मान की भावना दरिद्रता और सामाजिक उत्पीड़न का भाव जितनी व्यथा और पीड़ा के साथ कवितावली और विनयपत्रिका के पदों में प्रकट हुआ है,
ऐसा उत्कट आत्मनिवेदन हिन्दी साहित्य में और कहीं प्रकट नहीं हुआ। तुलसी के गर्व और आत्मसम्मान की भावना में उनकी लोकधर्मी चेतना की अभिव्यक्ति है । करुणा और सहानुभूति इस लोकधर्मिता का सबसे बड़ा स्रोत । डॉ. शर्मा के अनुसार तुलसीदास का दैन्य और गर्व दोनों उनकी भक्ति के सामन्त-विरोधी मूल्य हैं। इस प्रकार भक्तिकालीन साहित्य के साहित्यिक और ऐतिहासिक योगदान को सामने रखकर डॉ. शर्मा ने प्रमाणित किया है कि इस साहित्य की ऐतिहासिक सीमाएँ अपनी जगह हैं, लेकिन हम उस साहित्य से प्रेरणा लेकर जनता की एकता कायम कर सकते हैं, दमनकारी शक्तियों से संघर्ष करते हुए लोगों को हताश होने से उबार सकते हैं और एक समतावादी समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
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