यथार्थ के गतिशील रूप - dynamic forms of reality

यथार्थ के गतिशील रूप को सही ढंग से पकड़ने और उसकी सही ढंग से अभिव्यक्ति करने की क्षमता लम्बी कविता की अपनी खास विशेषता है। कवि जब अपनी रचना में अपने परिवेश, जन-जीवन और भावबोध को ग्रहण कर उसे समाहित करता है तो वह रचना प्राणवान् हो जाती है। निराला की कविता में यथार्थ के गतिशील रूप दिखाई देते हैं, उनके काव्य में सामाजिक यथार्थ को ग्रहण करने की विशेष प्रबल प्रवृत्ति दिखाई देती है,

जिसके कारण मनुष्य और समाज से सम्बन्धित विभिन्न पहलू उभर कर आते हैं। 'राम की शक्ति-पूजा' में कवि निराला ने पौराणिक कथानक में तत्कालीन परिवेश और परिस्थितियों को अत्यन्त स्वाभाविक रूप से समाहित कर उसे और गहन आयाम प्रदान किया है। इसमें राम और रावण के माध्यम से सात्त्विक और तामसिक वृत्तियों का संघर्ष दिखाया गया है लेकिन यह संघर्ष जहाँ एक ओर निराला के जीवन संघर्ष को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक युग में जीने वाले मनुष्य की दशा का भी चित्रण करता है।


'राम की शक्ति-पूजा' का रचनाकाल वह काल है जब देश गुलामी और निराशा के अन्धकार में डूबा हुआ था । निराला ने जहाँ राम को देशभक्ति और राष्ट्रीयता की भावना के अनुरूप प्रस्तुत किया है, वहीं रावण को अंग्रेजी शासन की क्रूरता, अनीति और अत्याचार के रूप में प्रस्तुत कर यथार्थ के साथ संयोजन किया है। राम की निराशा पूरे देश की निराशा है, इस निराशा में आशा का संचार करते हुए कवि निराला ने शक्ति की मौलिक कल्पना का सन्देश दिया है। इसके साथ ही निराला ने तत्कालीन रूढ़िवादी समाज में नारी की मुक्ति की बात को सीता की मुक्ति के माध्यम से उठाया है।