काव्य के तत्त्व - elements of poetry

अज्ञेय ने हिन्दी की प्रयोगवादी काव्य-समीक्षा के अन्तर्गत काव्य-तत्त्वों की चर्चा सविस्तार की है। उन्होंने अनुभूति को काव्य के प्राथमिक और अनिवार्य तत्त्व के रूप में मान्यता प्रदान की है। यह सही है कि वर्तमान सन्दर्भों में अनुभूति के साथ-साथ बुद्धि अथवा बौद्धिकता को भी उन्होंने पर्याप्त महत्त्व दिया है, किन्तु अनुभूति के सम्बन्ध में उनकी धारणा बराबर यही बनी रही है कि अनुभूति काव्य का अनिवार्य तत्त्व है और आज के यान्त्रिक युग में भी, कम से कम रचना के सन्दर्भ में जिसमें एक सचेतन मानव मस्तिष्क का योग होता है, उसे अमान्य नहीं किया जा सकता।


अज्ञेय ने स्वीकार किया है कि "हम यन्त्र के सहारे उन्नति करते हैं, यन्त्र में जैसे नैतिक बोध नहीं है, वैसे ही अनुभूति भी नहीं है। पर हम जैसे नैतिकता से मुक्त नहीं हो सके हैं, वैसे ही अनुभूति से मुक्ति भी हमने नहीं पाई हैं। इस प्रकार यन्त्र के सहारे क्रमशः आगे बढ़ते हुए हम पाते हैं कि उसी अनुपात में यन्त्र के सन्दर्भ में हमारी अनुभूति का मूल्य दिन - दिन कम होता जाता है। अगर हम इससे इस नतीजे पर पहुँच सकते कि स्वयं अपनी अनुभूति को नगण्य मान लेते तो शायद समस्या नहीं होती; पर वैसा हम नहीं कर सकते। संवेदनशील प्राणी (और लेखक कुछ अधिक संवेदनशील होता है कम नहीं चाहे इसी रूप में कि कुछ क्षेत्रों या आयामों में उसकी संवेदना अधिक तीव्र या घनी हो जाती है;

भले ही कुछ दूसरे में संकुचित हो जाय या कुन्द हो जाये) अनुभूति को अमान्य कभी नहीं कर सकता। परिणाम यह होता है कि वह अनुभूति पर अतिरिक्त आग्रह करने लगता है। आलोचक इसे असन्तुलन कहकर उड़ा दे सकते हैं या वे प्रश्न उठा सकते हैं, जैसा कि कुछ शास्त्रीय आलोचकों ने उठाया है कि अनुभूति की इतनी चर्चा से लाभ क्या निजी सुख-दुःख या संघर्ष आखिर निजी ही तो है, उससे जो व्यापक या सार्वजनिक उपलब्धि हो, वही सामने लानी चाहिए। किन्तु उपलब्धि की व्यापकता खण्डन किए बिना भी यह कहा जा सकता है कि कलाकार के सत्य और वैज्ञानिक सत्य में अन्तर है,

तो यही कि कलाकार का सत्य रागात्मक सम्बन्ध पर आश्रित है अर्थात् मानवीय संघर्षों और अनुभूतियों के सन्दर्भ में ही सार्थक है उसे सन्दर्भ से काटकर ग्रहण नहीं किया जा सकता।" इस प्रकार अनुभूति पर अज्ञेय का आग्रह एक तात्त्विक आग्रह है जो उसे काव्य-रचना के सन्दर्भ में प्राथमिक और अनिवार्य बना देता है।


क्षण की चर्चा के सन्दर्भ में भी अज्ञेय ने अनुभूति को ही प्राथमिक मानते हुए अपना अभिमत प्रकट किया हैं। उनके अनुसार "अनुभूति और परिस्थिति में जब विपर्यय,

असन्तुलन या विरोध होता है, तब कलाकार अनुभूति पर आग्रह करता है। यदि वह अतिरिक्त आग्रह है तो इसीलिए कि वह सन्तुलन और सामंजस्य का आग्रह है .... जब-जब परिस्थिति और अनुभूति में ऐसा विपर्यय हुआ है, तब-तब ऐसा आग्रह पाया गया है। क्षण का आग्रह क्षणिकता का आग्रह नहीं है, अनुभूति की प्राथमिकता का आग्रह है और अनुभूति को अनुभावक से अलग नहीं किया जा सकता। अनुभूति द्वितीय है; क्योंकि कोई दूसरे की अनुभूति नहीं भोग सकता। सहानुभूति में सह विशेषण में ही इसकी स्वीकृति है और कवि साधारणीकरण द्वारा जिस अनुभूति का प्रेषण करता है, वह काव्यानुभूति जीवन की अनुभूति से अलग होती है।"

अज्ञेय की प्रबल धारणा है कि काव्यानुभव आनन्दपूर्ण है। इस मायने में वह गोचर अनुभव के सुख से अधिक महत्त्वपूर्ण है। अज्ञेय का यह दृष्टिकोण परम्परागत मान्यताओं से बहुत कुछ भिन्न नहीं है। हालाँकि, इसमें कुछ नयापन अवश्य है। इसका कारण है कि अपने काव्यचिन्तन में अज्ञेय ने पश्चिम के कतिपय आधुनिकतावादी काव्य-चिन्तकों के मतों को शामिल कर लिया है।


काव्य सम्बन्धी मान्यताओं में वे टी. एस. एलियट के विचारों से तथा मनोविज्ञान की निष्पत्तियों से गहरे प्रभावित हैं। एलियट की भाँति ही कविता उनके लिए अनुभूति की अभिव्यक्ति नहीं,

बल्कि अनुभूति से मुक्ति है; वे कहते हैं कि "कविता अनुभूति से मुक्ति अवश्य है; किन्तु कविता के लिए अनुभूति का पहले होना आवश्यक है।" इस प्रकार अज्ञेय ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि काव्य अनुभूति की अभिव्यक्ति न होकर अनुभूति से मुक्ति है। जब तक अनुभव लेखक के निजी अनुभव रहते हैं, तब तक वे साहित्य की वस्तु नहीं बनते, जब वे इतने गहरे हो जाते हैं कि लेखक के लिए उन्हें संभाल पाना कठिन हो जाता है, तब वे काव्य का अंग बनने के योग्य हो जाते हैं और लेखक उन अनुभवों को साहित्य में अभिव्यक्त कर उनसे मुक्ति पा जाता है।


'आत्मनेपद' के अपने महत्त्वपूर्ण वक्तव्य में अज्ञेय ने कहा है कि "हर प्रकार के अनुभव या हर प्रकार की अनुभूतियाँ साहित्य या काव्य का तत्त्व नहीं मानी जा सकतीं।"

उन्होंने साहित्यिक रचना में सम्पुंजन और सघनीकरण के साथ साथ चयन की भी अनिवार्यता पर जोर दिया है। कहने का आशय यह है कि साहित्य रचना में केवल वही अनुभूतियाँ स्थान पाती हैं जो अन्ततः दृष्टि बन सकें, और इसलिए साहित्यकार अनुभवों की अपनी विशाल राशि में से चयन करता है। बौद्धिकता के पक्ष को प्रस्तुत करते हुए अज्ञेय ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि "साहित्य का सौन्दर्य बुद्धि तत्त्व पर आधारित है और उसके आस्वादन की दोनों ही क्रियाओं में बुद्धि सक्रिय रहती है।" इसके अभाव में रचना और आस्वादन दोनों ही सम्भव नहीं हैं, साहित्य का प्रतिमान बुद्धि द्वारा विद्यमान है। निस्सन्देह, इस बौद्धिकता के कारण आधुनिक वैज्ञानिक तथा यान्त्रिक युग के सन्दर्भ हैं।