काव्य के तत्त्व - elements of poetry
काव्य-तत्त्व की शुष्क यान्त्रिक सैद्धान्तिकी का खण्डन करते हुए साही काव्य-चिन्तन को रचना की राह से गुजरने एवं मूल्यक्कन के औजारों को रचना के भीतर ही खोजने पर बल देते हैं। ऐसा नहीं है कि साही ने बदलते समय की अपनी कविता के लिए किन्हीं सर्वथा नये तत्त्वों की बात की हो, लेकिन काव्य के जिन तत्त्वों की चर्चा परम्परा से होती आई है, उन्होंने उन्हीं तत्त्वों के सापेक्ष कविता के बुनावट को अपने ढंग से व्याख्यायित और विश्लेषित करते हुए नयी काव्य-सर्जना के लिए स्वीकार किया है।
ज्ञातव्य है कि भावना, बुद्धि या विचार तथा कल्पना ये तीन ऐसे मूल घटक हैं जो प्रत्येक युग की कविता के साथ मूलभूत रूप से सम्बद्ध रहे हैं; उनके साथ ही वह इन्द्रियबोध भी है जिसके माध्यम से कवि संसार से परिचित होता है और जिसकी गहरी छाप उसकी कविता में होती है। यह सही है कि प्रतिक्रिया के आवेश में कुछ भी कह दिया जाए, किन्तु शान्त मस्तिष्क से विचार करने पर यह सहज ही अनुभूत है कि आधुनिक कवि आलोचक भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष ढंग से इन तीन घटकों की संगति में ही काव्य की स्थिति को देखने और प्रतिपादित करने की कोशिश करते हैं।
वस्तुतः यही वे घटक अथवा तत्त्व हैं जिन्हें साही जैसे कवि आलोचक ने भी अपने ढंग से बदलती हुई संवेदनाओं के अनुरूप अपनी नयी व्याख्या से समन्वित करके नयी सर्जना के प्रमुख तत्त्वों के रूप में स्वीकार किया है। साथ ही साथ काव्य-सर्जना को सन्दर्भों से जोड़ते हुए युगीन तनावों के साथ अलक्षित सामाजिक चेतना को उद्घाटित करने का दृढसंकल्प भी उनकी आलोचनात्मक दृष्टि में सर्वत्र परिलक्षित होता है।
रस चिन्तन
नये काव्य-चिन्तन का जो समेकित स्वरूप कवि आलोचकों के नाना वक्तव्यों से उभरकर सामने आया है,
उसके बारे में एक सामान्य धारणा यह बनती है कि वह परम्परागत काव्यदृष्टि के सम्पूर्ण निषेध पर आधारित है। इस धारणा के आधार नये कवि आलोचकों के अनेक वक्तव्यों में प्राप्त होते हैं और उसे बिल्कुल बेबुनियाद भी नहीं
कहा जा सकता, तथापि यह कहना सही नहीं होगा कि नये काव्य-चिन्तन में रस यानी भाव या अनुभूति का पूर्णतया निषेध है।
रस के प्रति सम्पूर्ण स्वीकार अथवा सम्पूर्ण अस्वीकार से अधिक महत्त्वपूर्ण बात उसे समझने और उसकी चुनौतियों का सामना करने की है, इस बात पर सबसे अधिक जोर कवि आलोचकों में विजयदेवनारायण साही ने दिया है।
उनके अनुसार " अधिकांशतः आज के लेखकों और आलोचकों की धारणा या आदत पड़ती जा रही है। कि रस सिद्धान्त पर बहस बंद हो जानी चाहिए और लगभग प्रछिन्न रूप से सब सहमत होते जा रहे हैं कि अब फायदा नहीं मिलेगा । रस कहने से जो सहसा साहित्यिक रुचि प्रतीत होती है, उससे मैं निश्चय ही अपने मत को भिन्न पाता हूँ। लेकिन विचारों को उत्तेजित करने के लिए इस शास्त्र से उलझना आवश्यक है । प्रच्छन्नतः यह मान्यता विद्यमान है कि आज का लेखक या विचारक आधुनिक साहित्य पर ही विचार करेगा, प्राचीन पर नहीं।
यदि प्राचीन के लिए रस सिद्धान्त जरूरी है तो फलतः दो रुचियाँ सामने आती हैं, यानी जब कालिदास को पढ़ें तो रस सिद्धान्त लागू करें और लक्ष्मीकान्त वर्मा को पढ़ें तो आज की रुचि लागू करें। यह अवसरवादिता साहित्यिक रुचि से बहिष्कृत करना बहुत जरूरी है। "
रस के विषय में विशेषकर आज के सन्दर्भों में यह एक सही दृष्टि है और नये काव्य-चिन्तन में तत्त्वतः इसी का अनुसरण हुआ है। जैसा कि डॉ. नामवर सिंह ने कहा है कि "जब तक कुछ लोगों ने अतिवादी रुख अपनाये हैं,
किन्तु गम्भीर दृष्टि यही है कि यदि हिन्दी में आज काव्य के नये प्रतिमान बनाते समय इंग्लैंड अमेरिका की नव्य आलोचना की सहायता ली जा रही है तो फिर अपनी परम्परा के रस सिद्धान्त ने ही क्या बिगाड़ा है। प्रश्न यह है कि काव्य के वस्तुगत स्वरूप को समझने की दिशा में सही प्रयास हो। विजयदेवनारायण साही ने तो कहा है कि गीण प्रश्नों को छोड़कर आगे आने की जरूरत है, कविता के ढाँचे की ओर जाने की आवश्यकता है।
आवश्यकता है। काव्य की आत्मा को कवि में न खोजकर शब्दार्थमूलक काव्य में खोजने की। "
विजयदेवनारायण साही के रस चिन्तन में रस के प्रति एक विशेष प्रकार की प्रश्नाकुल दृष्टि की प्रधानता है। उन्होंने रस दृष्टि को स्वीकार या अस्वीकार करने से अधिक महत्त्व इस बात को दिया है कि उसे भली-भाँति समझा जाए, उस पर सवाल लगाए जाएँ, उसके उत्स खोजे जाएँ और तब उसके विषय में कोई अन्तिम धारणा बनायी जाए।
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