मुक्तिबोध और फैंटेसी - emancipation and fantasy

फैंटेसी शब्द की उत्पत्ति यूनानी शब्द 'फैंटेसिया' से हुई है, जिसका अर्थ है अमूर्त को दृश्य बनाना - अर्थात् काल्पनिक या स्वप्न दृश्यों को बिम्बात्मक रूप देने का सामर्थ्य काव्य रूप में फैंटेसी वह काव्य है जिसमें स्वप्न के माध्यम से यथार्थ का चित्रण किया जाता है, जिससे कवि वास्तविकता के प्रदीर्घ चित्रण से बच जाता है। दूसरे शब्दों में फैंटेसी स्वप्न-कथा है। जार्ज टामसन के अनुसार "फैंटेसी इच्छित यथार्थ की पूर्ति है। यह एक जादू एक भ्रान्ति है जो यथार्थ के ही ढंग की है।" सफल फैंटेसी उसे ही माना जाता है जिसमें यथार्थ और फैंटेसी सम्बन्धी विचार इस तरह एकाकार हो जाते हैं कि उन्हें फिर अलग नहीं किया जा सकता।

इसमें रचनाकार को कल्पना के माध्यम से रचना संसार में स्वछन्द विचरण करने की छूट मिल जाती है। मुक्तिबोध के अनुसार "फैंटेसी में मन की निगूढ़ वृत्तियों का अनुभूत जीवन समस्याओं का, इच्छित विश्वासों और इच्छित जीवन परिस्थितियों का प्रक्षेप होता है।"


मुक्तिबोध ने फैंटेसी द्वारा द्वन्द्वात्मक समाज और मानव-मन के द्वन्द्व को सृजनात्मक अभिव्यक्ति दी है। उनकी अनेक कविताएँ फैंटसीपरक हैं, जैसे ब्रह्मराक्षस, अँधेरे में, लकड़ी का रावण, दिमागी गुहान्धकार का ओरांग उटांग मेरे सहचर मित्र, एक अन्तर्कथा,

एक स्वप्नकथा आदि। इन कविताओं में उन्होंने भारतीय मनुष्य की पीड़ा, भारतीय समाज के तनाव और भारतीय जीवन की त्रासदी को फैंटेसी के विविध रूपों में संयोजित किया है। नन्दकिशोर नवल के शब्दों में "मुक्तिबोध फैंटेसी शैली की तरफ धीरे-धीरे बढ़े और यथार्थ बोध की परिपक्वता के साथ उनका ढंग स्वयमेव बदलता गया था। दूसरे उन्होंने अपनी कविताओं में फैंटेसी का कई प्रकार से इस्तेमाल किया है। कहीं फैंटेसी का स्पर्श हल्का है, कहीं प्रगाढ़, कहीं वह सरल रूप में आती है, कहीं बहुत जटिल रूप में। उनकी फैंटेसी शैली की सफलता उनकी इस क्षमता में निहित है कि वे जिस तरह यथार्थ को फैंटेसी में बदल सकते थे, उसी तरह फैंटेसी का चित्रण भी बिल्कुल यथार्थ की तरह कर सकते थे। उनका यथार्थ लोक जैसे फैंटास्टिक है, वैसे ही उनका फैटास्टिक-लोक अत्यन्त यथार्थ। "


मुक्तिबोध ने फैंटेसी को सृजन प्रक्रिया की एक महत्त्वपूर्ण इकाई स्वीकार करते हुए कहा है- "कला का पहला क्षण हैं, जीवन का उत्कृष्ट तीव्र अनुभव-क्षण। दूसरा क्षण है इस अनुभव का अपने कसकते दुखते हुए मूलों से पृथक हो जाना और एक ऐसी फैंटेसी का रूप धारण कर लेना मानों वह फैंटेसी अपनी आँखों के सामने ही खड़ी हो। तीसरा और अन्तिम क्षण है इस फैटेसी के शब्द बद्ध होने की प्रक्रिया का आरम्भ और उस प्रक्रिया की परिपूर्ण अवस्था तक की गतिमानता ।"


मुक्तिबोध ने फैंटेसी के माध्यम से अपने परिवेश की भयानकता और मनुष्य की दर्दनाक दशा का चित्रण किया है।

उन्होंने बाहरी कटु यथार्थ के सम्पर्क में आने पर मन में हुई प्रतिक्रिया को कल्पना का योग देखकर ऐसे चित्र प्रस्तुत किए हैं जिसमें अद्भुत और विलक्षण का रोमांचक योग होता है। वे भयानक रहस्यमयता से भरपूर, दिल दहला देने वाली फैंटेसी की सृष्टि करते हैं और उसमें अपने विचारों की लड़ियाँ पिरोते चलते हैं। इन फैंटेसियों में पाठक के मानस को उद्वेलित करने की असाधारण शक्ति है। उनकी फैंटेसियाँ प्याज के छिलकों की तरह परत- दर-परत खुलती जाती हैं और दृश्य फिल्म- रील की तरह बदलते जाते हैं और यथार्थ के सजीव चित्र पाठक के समक्ष उद्घाटित होते चले जाते हैं। पाठक तीखे, मर्म तक चुभने वाले कटु सत्य का साक्षात्कार करता है

और वह निर्णय नहीं कर पाता कि जिस कटु यथार्थ को उसने अभी-अभी देखा है वह फैंटेसी था या जीवन्त प्रत्यक्ष । 'अँधेरे में' कविता में सफेदपोश षड्यन्त्रकारियों पर व्यंग्य करने वाली फैंटेसी की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-


उनमें कई प्रकाण्ड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण


मंत्री भी, उद्योगपति और विद्वान्


यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात


डोमाजी उस्ताद ।


इस प्रकार मुक्तिबोध की फैंटेसी मनुष्य की तबाह होती जिंदगी और उसमें सक्रिय ताकतों को बड़े ही प्रभावपूर्ण ढंग से उद्घाटित करती है। उनके लिए फैंटेसी अनुभवलोक में चलने वाली यात्रा है, जो मनुष्य को पूरी तरह अपने में शामिल करते हुए शत्रुओं की पहचान कराती है तथा उसे षड्यन्त्र के चक्रव्यूह से निकलने की शक्ति देती हैं । अन्ततः यह कहा जा सकता है कि मुक्तिबोध जन चेतना के कवि हैं जिन्होंने अपनी फैंटेसी के माध्यम से यथार्थ के गहनतम सत्यों का उद्घाटन कर पाठक की सामाजिक चेतना को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है।