भारतीय पूँजीवाद का प्रादुर्भाव - Emergence of Indian Capitalism
सन् 1917 की सर्वहारा वर्ग की क्रान्ति ने रूस में पूँजीवाद तथा साम्राज्यवाद का उन्मूलन किया। भारत में भी उस समय पूँजीवाद पनप रहा था। टाटा-बिड़ला जैसे पूँजीपति अपने उद्योगों का विस्तार कर रहे थे। विदेशी व्यापार की प्रतिद्वन्द्विता के कारण उन्हें राष्ट्र का समर्थन प्राप्त था। इसके बावजूद साहित्यकार दीन जनों की समस्याओं और उनके चीत्कारों का चित्रण कर रहे थे। आभिजात्य वर्ग और ज़मींदार किसानों पर अत्याचार कर रहे थे। इन अत्याचारों की ओर साहित्यकार का ध्यान गया। जनकवि नागार्जुन भूख के सन्दर्भ को रेखांकित करते
मरो भूख से फौरन आ धमकेगा थानेदार लिखवा लेगा घर वालों से वह तो था बीमार अगर भूख की बातों से तुम कर न सके इनकार, फिर तो खायेंगे घर वाले हाकिम की फटकार । *
मरी भूख को मारेंगे फिर सर्जन के औजार जो चाहेगी लिखवा लेगी, डॉक्टर से सरकार । 18
'दोन बोल्गा यमुना आज हो रही एक' जैसी कविताओं में भी नागार्जुन ने भूख की समस्या को उपसन्दर्भ के रूप में वाणी प्रदान की है- "गली-गली में रोता मानव" माँग रहा है भीख।"
पन्त, निराला, नागार्जुन, सुमन, मुक्तिबोध कवियों ने काव्य के क्षेत्र में जनता की आवाज़ को उठाया ।
निराला ने 'भिक्षुक' शीर्षक कविता में सर्वहारा की पीड़ा को वाणी प्रदान की तो नागार्जुन ने 'जया' शीर्षक कविता में चिकित्सा और बुभुक्षा के सन्दर्भ को चरम सीमा पर पहुँचाया। नागार्जुन आर्थिक अभाव रेखांकित करते हुए कहते हैं-
माँ-बाप गरीब न कर सकते प्रतिकार बहरापन का
कैसा असा कितना बर्बर
यह मध्य वर्ग का निचला स्तर । ^ 20
वार्तालाप में शामिल हों