आधुनिक हिन्दी आलोचना का उद्भव - Emergence of Modern Hindi Criticism
आधुनिक हिन्दी आलोचना का प्रवर्तन भारतेन्दु युग में हिन्दी गद्य के विकास के साथ ही हुआ। डॉ. रामविलास शर्मा ने पण्डित बालकृष्ण भट्ट को आधुनिक हिन्दी आलोचना का जन्मदाता कहा है। पण्डित बालकृष्ण भट्ट के लेख 'साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है' (1881) और भारतेन्दु के निबन्ध 'नाटक अथवा दृश्यकाव्य' (1883) आदि में आधुनिक दृष्टिकोण से साहित्य को समझने-समझाने के गम्भीर प्रयास देखे जा सकते हैं । परन्तु आलोचना साहित्य का शास्त्र नहीं होती, वह सिद्धान्त और रचनात्मक साहित्य के मध्य द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों की सतत प्रक्रिया होती है। रचना के विश्लेषण की प्रक्रिया में ही आलोचना की सार्थकता सिद्ध होती है।
अतः सही अर्थों में आधुनिक हिन्दी आलोचना की शुरूआत का श्रेय पण्डित बालकृष्ण भट्ट और चौधरी बदरीनारायण 'प्रेमघन' द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाओं को दिया जाता है। इसकी चर्चा करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है- "समालोचना का सूत्रपात हिन्दी में एक प्रकार से भट्ट जी और चौधरी साहब ने ही किया। समालोच्य पुस्तक के विषयों का अच्छी तरह विवेचन करके गुण-दोष के विस्तृत निरूपण की चाल उन्हीं ने चलाई।" इन पुस्तक समीक्षाओं में आलोचना का जो स्वरूप उभरकर सामने आया उसी ने हिन्दी आलोचना के भावी विकास को दिशा दी। कहा जा सकता है कि आधुनिक हिन्दी आलोचना का आरम्भ व्यावहारिक आलोचना से हुआ।
'साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है' के उद्घोष के साथ साहित्य को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने के प्रयास भारतेन्दु युग के आरम्भ से ही होने लगे थे और यह सामाजिक चेतना और आधुनिक दृष्टि इस युग की पुस्तक समीक्षाओं में भी व्याप्त है। साहित्य की अन्य विधाओं के साथ-साथ आलोचना को युग चेतना और लोकजीवन से युक्त करने की इसी परम्परा का विकास आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह आदि की आलोचना में हुआ है।
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