कवि आलोचना का मर्म - the essence of poetic criticism
अज्ञेय ने पूर्ववर्ती साहित्य एवं समकालीन कृतित्व का तार्किक विश्लेषण किया है। उन्होंने समकालीन विकर्म के लिए परम्परा के मूल्य व आधुनिकता की दृष्टि पर विस्तारपूर्वक विचार किया है। कहना गलत न होगा कि विश्व साहित्य में अज्ञेय जैसे बहुत कम कवि आलोचक हुए हैं जिन्होंने साहित्य संवेदना और काव्य-परम्परा का इतने मनोयोग से अध्ययन कर विश्लेषण एवं मूल्यांकन किया है। उनका काव्य चिन्तन अपनी रचना यात्रा की वकालत भर नहीं रहा, अपितु उसने एक स्वतन्त्र चिन्तन यात्रा का पथ भी निर्मित किया है। साथ ही, वे अपनी साहित्यिक अवधारणाओं को निरन्तर संशोधित भी करते रहे हैं।
आधुनिकतावाद अस्तित्ववाद, नव्य समीक्षा पर विमर्श करते हुए अज्ञेय ने काव्य में सम्प्रेषण के सैद्धान्तिक महत्त्व की पहचान की है। पाश्चात्य और पूर्व की काव्य- चिन्तन परम्पराओं की तुलना और महत्त्व से कृति केन्द्रित आलोचना के विद्रूपता स्वीकार की है। कृति के अनुशीलन में मूल्य निर्णय सम्बन्धी नये आयाम जोड़े हैं। वस्तुतः कविता में शब्द अपने में न सम्पूर्ण होता है और नही आत्यान्तिक स्वयंभूत अर्थ देता है। उनकी दृष्टि में "शब्द तो पात्र है जिसमें कवि अर्थ भरता है, सन्दर्भ उसे अर्थ देता है, हालाँकि जो लकीर के फकीर हैं उन्हें शब्द का नया प्रयोग नहीं सुहाता। वे पुराने अर्थ देवता को अन्तर्ध्वनित होते नहीं देख सकते। शब्द प्रयोक्ता के साथ पाठक की समीक्षा सम्प्रेषक भी करते हैं।
यह भी सम्भव है विषय पुराना रहे पर वस्तु नयी रहे। पर विषय नये हो सकते हैं मौलिक नहीं। मौलिकता वस्तु से सम्बन्ध रखती है। मौलिकता की कसौटी का यही क्षेत्र है और यही कवि की शक्ति अथवा रचनात्मक प्रतिभा का क्षेत्र है। क्योंकि, यह कवि मानस की पहुँच का क्षेत्र हैं। यहाँ स्वीकार किया जाय कि नये कवियों में ऐसे की संख्या कम नहीं है जिन्होंने विषय को वस्तु समझने की भूल की है और इस कारण वे स्वयं भी पथभ्रष्ट हुए हैं और पाठकों में नयी कविता के बारे में अनेक भ्रान्तियों के कारण बने हैं।"
कवि आलोचक अज्ञेय यह स्वीकार करते हैं कि "आलोचक का काम है कि वह असली की शकल बिगड़ने न दे और नकली के प्रति सावधान करे।
हमारे यहाँ नकली कवियों से ज्यादा नकली आलोचक हैं। उनका धातु भी खोटा है और कसौटियाँ भी खोटी हैं। कसौटी पर वे आज भारतेन्दु और मैथिलीशरण गुप्त को 'हिन्दू' कवि कहकर नीचा दिखाना चाहते हैं।" निश्चित ही अज्ञेय ने द्विवेदी युग और छायावादी युग के नकलचियों की बात प्रभावी ढंग से रखी है। उनके अनुसार "प्रगतिवाद ने भी कम नकलची पैदा नहीं किए हैं। हमें किसी भी वर्ग में उनका समर्थन या पक्ष पोषण नहीं करना है। पर यह चिन्ता भी करनी है कि उनके पक्षपात के कारण मूल्यवान् की उपेक्षा न हो।"
प्राचीन समय से रचना कर्म में साधना का विशेष महत्त्व रहा है। अज्ञेय ने इस साधना परम्परा का महत्त्व निरूपित करते हुए कहा है कि "साधना अभ्यास का ही दूसरा नाम है।" हालाँकि,
समकालीन परिवेश में वाक् शिल्पी कहलाना अपेक्षाकृत अधिक गौरव की बात समझा जा सकता है। उनकी दृष्टि में "आज तो शिल्पी एक गाली है और एक नया वर्ग नयी काव्य प्रवृत्ति के आन्दोलन को मात्र 'रूपवाद' का आन्दोलन कहकर उड़ा देना चाहते हैं, जबकि नयी प्रकृति का यह आन्दोलन वस्तु और रूप की अभिन्नता का आन्दोलन हैं जिसमें कविता बुद्धि की मुक्तावस्था की ओर उन्मुख है।" उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 'तारसप्तक' में संगृहीत सभी कवि ऐसे हैं जिन्होंने कविता को प्रयोग का विषय स्वीकार किया है और जो यह नहीं कहते कि काव्य का सत्य उन्होंने पा लिया है।
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