युयुत्सावादी कविता - euphoric poetry

शलभ श्रीराम सिंह ने 'रूपाम्बरा' पत्रिका के माध्यम से युयुत्सावादी भाव रखनेवाली कविता का विचार प्रस्तावित किया । इसे क्रुद्ध पीढ़ी के साथ जोड़ा गया। शलभ श्रीराम सिंह ने 'युयुत्सा' पत्रिका का सम्पादन किया था। 'युयुत्सा' शब्द का अर्थ ही 'युद्ध की इच्छा' बताया जाता है। स्वाभाविक रूप से युयुत्सावादी कविता ने विद्रोह के तेवर अपना लिए थे। ओम प्रभाकर, विमल पाण्डेय जैसे कवि भी युयुत्सावादी कविता से जुड़े । सन् 1965 के अप्रैल में प्रकाशित 'रूपाम्बरा' में स्वदेश भारती ने शलभ श्रीराम सिंह को कोट किया था "मैं साहित्य-सृजन की मूल प्रेरणा के रूप में उसी, आदिम युयुत्सा को स्वीकारता हूँ जो कहीं न कहीं प्रत्येक क्रान्ति, परिवर्तन अथवा विघटन के मूल में प्रमुख रही है। वह युयुत्सा जिजीविषावादी, मुमूर्षावादी, विद्रोहात्मक अथवा प्लैटोनिक कुछ भी हो सकती है।"18.


युयुत्सावादी कविता ने संतुलित विद्रोह, यान्त्रिकता का विरोध, परोक्ष पराधीनता के प्रति विद्रोह जैसी विशेषताओं के साथ अपना रूपाकार गढ़ना आरम्भ किया "फैशन के नाम पर अंधाधुंद साहित्य लिखने वाले लेखकों की एक भीड़ अनजाने इस षड्यन्त्र की जड़ मजबूत करने में लगी हुई है। व्यक्तिगत स्थापना की लालसा इन लेखकों को मूल बिन्दु से हटाकर एक ऐसी आधुनिकता के समीप ले जा रही है जहाँ जातीय बोध आधारहीनता की स्थिति को सहज ही प्राप्त होता जा रहा है। इसका एक मात्र और भयानक कारण यह है कि आज साहित्य और जनसाधारण के बीच तीसरा व्यक्ति आ गया है... आवश्यकता है, गलत हाथों की पकड़ से यान्त्रिकता को मुक्त कराने के लिए संतुलित विद्रोह की । विद्रोह जो एक विचारधारा के व्यक्तियों द्वारा चिन्तन के स्तर पर हो। "19


शलभ श्रीराम सिंह के साथी ओम प्रभाकर ने भी 'युयुत्सा' पत्रिका में युयुत्सावादी काव्य-प्रवृत्ति का समर्थन किया- "युद्धेच्छा एक सनातन वृत्ति है, एक आदिम स्वभाव है। ... मनुष्य मात्र अपने से ही जिस वृत्ति के वशीभूत होकर सबसे अधिक सक्रिय होता रहा है वह वृत्ति युयुत्सा ही है... युयुत्सा हमारी नियति है। 20


15 अगस्त सन् 1968 को 'युद्ध युद्ध युद्ध संकलन प्रकाशित हुआ था। 'मुखौटे सलीब, युद्ध जैसे सहकारी संकलन ने भी युयुत्सा को भली-भाँति परिभाषित किया।

इसमें चन्द्रमौलि उपाध्याय, राजीव सक्सेना, रामाश्रय सविता, नीलम, उमेश, शरद, आनन्द सोनवलकर जैसे कविगण शामिल थे। इससे पहले भी चन्द्रमौलि उपाध्याय ने अपने काव्य-संकलन को 'युद्ध श्रेयस्' शीर्षक से प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने वीरपूजा, धर्म भावना व जन-संस्कृति को अपना उपजीव्य माना था। इस संग्रह की कविताएँ निश्चित रूप से युद्ध ओज से भरपूर थीं। इसमें अपनी स्थिति की संकटापन्न व यंत्रणापूर्ण संभावनाओं का भानथा। इन्हें ही कविता के माध्यम से वाणी प्रदान की गई-


सिर्फ़ धरती रहने दो, सिर्फ़ धरती, तुम उठा लो अपनी जाति मेरे वक्ष से मैं बंजर नहीं रहूंगी


फिर कभी पैदा होगा कोई मनुजात


जिनके हाथों में होंगे


एक लाख साल के बाद सही रचना के सामान इतिहास की सच्ची रास ।


सच्चे विध्वंस के हथियार


तुम इतिहास को मुक्त कर दो छोड़ दो मेरी छाती


मेरा मातृत्व अब सो जाना चाहता है। रा


धरती की यह ललकार और ऐसे ही कई अनोखे स्वर इस वाद की कविता में देखे जा सकते हैं। 26 जनवरी सन् 1969 को लखनऊ से प्रकाशित 'मुखौटे, सलीब, युद्ध में उमेश ने लिखा है "युद्ध सही भूमि पर सही कारणों और स्थितियों पर होना चाहिए। उसका थोड़ा-सा भी कोण बदल जाने पर वह अर्थ के स्थान पर अनर्थवाहक हो जाता है। क्रान्ति की पहली शर्त ही हर चीज़ को गलत समझना है, तभी विद्रोह में तेजी आएगी।"22 युयुत्सावादी कविता की अच्छी बात यह कि दिशाहारा होने की स्थिति में आन्दोलन की क्या थ होगी, इस बात से भी वे भली-भाँति परिचित थे तभी उमेश अपने वक्तव्य में आगे यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि - "नये निर्माण का नक्शा भी दिमाग में होना चाहिए वरना लक्ष्यभ्रष्ट विद्रोह केवल आत्महंता ही साबित होता है। 23


सेक्स को अपनी रचनाधर्मिता की आधारशीला न मानने वाला युयुत्सावादी कविता जैसा कोई काव्यान्दोलन साठोत्तरी समय में हो रहा था, यही अपने आप में अनोखी बात थी। किन्तु धीरे-धीरे जनसाधारण और साहित्य के बीच की खाई को पाटने की आकांक्षा रखने वाला यह काव्यान्दोलन क्षीण होने लगा। जनवरी 1967 के 'युयुत्सा' के अंक में शलभ श्रीराम सिंह ने 'सामाजिक स्थिति में दोहरे परिवर्तनों के आ जाने' और 'दो प्रक्रियाओं से एक साथ गुजरने की विवशता' के कारण अपने मूल वैचारिक स्वरूप के 'कुछ का कुछ' हो जाने को लेकर शिकायत की और लिखा कि "हम स्वयं से अधिक बीटनिक दिखने लगते हैं। "24 स्वयं को बीटनिकों से भिन्न ठहराने की परिवर्तनकामी कोशिश कोरे कथनों, घोषणाओं के कारण समाप्त होती गई और युयुत्सावादी कविता के रूप में उभर आया आन्दोलन ठण्डा पड़ गया।