प्रयोगवाद, प्रगतिशील कविता और नयी कविता - Experimentalism, Progressive Poetry and New Poetry


डॉ. रामविलास शर्मा ने छायावाद और उसके बाद की हिन्दी कविता का विवेचन करके यथार्थवादी काव्यधारा के विकास पथ की खोज की है। निराशावाद, रहस्यवाद और यथार्थवाद को छायावाद के उत्तरकाल की मुख्य काव्य प्रवृत्तियाँ बताते हुए उन्होंने प्रगतिशील काव्य का सम्बन्ध यथार्थवादी काव्य प्रवृत्ति से जोड़ा हैं। वे मानते हैं कि छायावाद का स्वाभाविक संक्रमण यथार्थवाद की ओर ही हुआ था। इस प्रक्रिया में "प्रगतिशील कविता ने छायावादी काव्य की अस्पष्टता, भाषा की दुरूहता, निराशावादी भावनाओं और पलायनवादी प्रवृत्ति को छू किया, जीवन में आस्था, दलित और शोषित जनता की मुक्ति की उत्कण्ठा, सामाजिक दायित्व की भावना व्यक्त की ।”

(- 'आस्था और सौन्दर्य) विचार पक्ष की अस्पष्टता और कलात्मक शिथिलता को प्रगतिशील कविता की कमजोरी बताते हुए डॉ. शर्मा कहते हैं कि पंत की 'ग्राम्या' से लेकर बच्चन की कविता 'बुद्ध और नाचघर' तक यथार्थवाद की धारा अनेक विषमताओं का सामना करते हुए आगे बढ़ी हैं। इन विषमताओं में एक विषमता प्रयोगवाद था।


डॉ० रामविलास शर्मा के अनुसार हिन्दी की यथार्थवादी काव्य-धारा का प्रवाह निराला, पंत, गिरिजाकुमार माथुर, रामधारी सिंह दिनकर, शिवमंगल सिंह 'सुमन',

केदारनाथ अग्रवाल आदि कवियों की बहुत सी रचनाओं में दिखाई देता है। दूसरे महायुद्ध के दौरान और उसके बाद स्वाधीनता आन्दोलन के नये उत्थान के समय यह धारा विशेष रूप से पुष्ट हुई। 'प्रतीक' के प्रकाशन से पहले अज्ञेय की कविता में भी यथार्थवादी स्वर प्रमुख थे। डॉ. शर्मा के अनुसार 1947 से पहले 'प्रयोगवाद' शब्द का व्यवहार नहीं हुआ था। 'प्रयोगवाद' शब्द की जरूरत तब हुई जब प्रगतिवाद के विरोध में एक नये वाद को स्थापित करना जरूरी हुआ । सन् 1947 में 'प्रतीक' के प्रकाशन से प्रयोगवाद की शुरूआत होती है। प्रयोगवाद का मुख्य उद्देश्य साहित्य को सामाजिक हलचल से दूर रखना और 'कला के लिए कला' के सिद्धान्त का प्रतिपादन करना था।

अज्ञेय प्रयोगवाद के प्रवक्ता बने, किन्तु प्रगतिशील साहित्य पर पहले आक्रमण करने वालों में वे प्रयोगवादी लेखक थे जो 1947 से पहले प्रगतिशील थे।


प्रगतिशील कवियों की ओर से भी प्रयोगवाद की आलोचना हुई। चूँकि प्रयोगवाद की शुरूआत प्रगतिवाद पर आक्रमण से हुई थी, इसलिए स्वाभाविक था कि वे प्रयोगवाद की आलोचना करते। लेकिन प्रगतिवादियों द्वारा विषयवस्तु पर अत्यधिक बल दिए जाने के कारण कविता के कलात्मक सौन्दर्य की अवहेलना हुई।

साथ ही प्रगतिशील साहित्य में उग्र और संकीर्णतावादी रुझान भी प्रबल हुए। डॉ. शर्मा ने प्रगतिशील साहित्य के इन रुझानों की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि कुछ प्रगतिवादियों ने केवल सामाजिक विषयवस्तु पर अत्यधिक बल देकर कविता के कला पक्ष की अवहेलना की है। इनकी बहुत सी कविताओं में चीत्कार-फटकार ही अधिक होता था। उनमें न यथार्थवादी चित्रण होता था और न ही कलात्मक सौन्दर्य । कुछ प्रगतिशील लेखक सामाजिक यथार्थ से आँख मूँदे हुए थे। डॉ. शर्मा ने दिखाया है कि प्रगतिशील साहित्य के इन अन्तर्विरोधों के कारण साहित्य को प्रगति-विरोधी दिशा में ले जाने वाले और प्रयोगवादियों को आगे बढ़ने का अवसर मिला।