प्रगतिवादी काव्य में समसामयिक राजनैतिक सन्दर्भों की अभिव्यक्ति - Expression of contemporary political contexts in progressive poetry
'प्रगतिवाद' आधुनिक हिन्दी साहित्य की सर्वाधिक जीवन्त एवं सशक्त काव्यधारा हैं। प्रगतिवादी काव्यधारा के श्रेष्ठ रचनाकारों ने घोर वैयक्तिकता का विरोध कर समसामयिक राजनीति के परिप्रेक्ष्य में साहित्य का सृजन किया है। यह काव्यधारा युग की समसामयिक परिस्थितियों के अनुरूप निरन्तर आगे बढ़ती रही है तथा आज भी अन्तः सलिला सदृश भारतीय जनता के मन-प्राण में अविराम प्रवाहित हो रही है। प्रगतिवादी कवियों में 'मुक्तिबोध' प्रगतिवादी काव्ययात्रा के तृतीय चरण (62-64 के बाद) तक नहीं आ पाते। 11 सितम्बर 1964 को नयी दिल्ली में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। तृतीय चरण के रचनाकार प्रमुखतः केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन और शमशेर बहादुर सिंह हैं।
इस साहित्य के सन्दर्भ में डॉ० रमाकान्त श्रीवास्तव की कविताओं का भी उल्लेख करना समीचीन प्रतीत होता है। प्रगतिवादी साहित्य को नयी ऊर्जा प्रदान करने वाली मुक्तिबोध की कविता अपनी कविता यात्रा के द्वितीय चरण तक आते-आते अत्यधिक राजनैतिक हो जाती है। उन्होंने 'अँधेरे में' कविता में युगीन संघर्षों और जटिल संवेदनाओं को काव्यात्मक बिम्बों में स्थापित किया है। प्रगतिशील विचारधारा के इस प्रतिभासम्पन्न कवि ने अपनी कविता में आततायी सत्ता के खोखलेपन की निष्क्रियता, भ्रष्टता तथा अनाचार के व्यापक सन्दर्भ को पूरी सघनता से उजागर किया है। इस दृष्टि से मुक्तिबोध हिन्दी के थोड़े से श्रेष्ठ कवियों में हैं। इस प्रकार मुक्तिबोध में प्रथम कोटि की सर्जनात्मक प्रतिभा विद्यमान है। वस्तुतः यह रचनाकार की क्षमता पर निर्भर करता है कि वह प्रलेखन को कितने गहरे आख्यापक स्तर पर स्थापित करता है।
निःसन्देह यह कहा जा सकता है कि मुक्तिबोध प्रगतिवादी कवियों में प्रथम कोटि के कवि के रूप में उपस्थित होते हैं। केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर और रमाकान्त श्रीवास्तव की कविता अपनी काव्ययात्रा के तृतीय चरण तक आते-आते अत्यधिक राजनैतिक हो जाती है जिसका स्तर राज्य से राष्ट्र और राष्ट्र से अन्तर्राष्ट्रीय हो जाता है ।
विपक्ष के एकमात्र प्रवक्ता
समसामयिक राजनैतिक सन्दर्भों की खोज के क्रम में कविवर डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव की श्रेष्ठ काव्यकृति 'साँझ का आकाश', 'जीवन दर्पण', 'अग्नि-पखेरू', 'प्यासा बनपाखी', 'बीसवीं सदी तथा अन्य कविताएँ' और 'सुनहरा पन्ना साँझ का भी विचारणीय है।
ये काव्य-कृतियाँ सत्ता की कटु आलोचना करती हैं। कवि मानता है कि सत्ता का उद्देश्य भ्रमजाल तक सीमित है। सत्ता जनता के लिए और जनता कविता के लिए है। इस प्रकार श्रीवास्तव की कविता राजनैतिक चेतना को जाग्रत करती है। कवि कहता है कि सत्ता सिर्फ़ लोगों को गुमराह करती है, क्योंकि नेताओं के पास कोई चरित्र ही नहीं बचा है। धर्म में धार्मिकों का, राजनीति में प्रशासकों का सलूक जिस तरह हो रहा है उससे समाज का विकास सम्भव नहीं है; बल्कि मानवता के लिए दर्दनाक है। आज समाज में धर्म और राजनीति के नाम पर माफिया विकसित हो रहा है। कवि इसके दर्दनाक उभार की अभिव्यक्ति इस प्रकार करता है-
माफिया कृत विकृत राजनीति देश व्यथित
अपकीर्ति में जो है वही अब राजनीति में
- जीवन दर्पण (हाइकु संकलन) पृष्ठ 29
तृतीय सेमेस्टर
प्रथम पाठ्यचयां (अनिवार्य)
- जीवन दर्पण (हाइकु संकलन) पृष्ठ 30
सत्ता लोलुप
वोटों की राजनीति
देश त्रस्त है
- अग्नि पखेरू (हाइकु संकलन) पृष्ठ 32
द्विजिह्न प्राणी बना राजनीतिज्ञ
सर्प सदृश
- अग्नि पखेरू (हाइकु संकलन) पृष्ठ 26
भारतीय लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली की मर्यादा पर आघात पहुँचते देखकर कवि विक्षुब्धहो जाता है। धोखाधड़ी और शैतानी की राजनीति पर आक्रोश व्यक्त करता हुआ कवि कहता है-
कक्ष में जनदेवता हैं
द्वार पर पहरे लगे।
खो गए जो दूरियों में
वे रहे कितने सगे
पत्थरों के देवता खाते तरस कब घूरते
क्लेश के कंटक बिछे पथ पर कहाँ कितने गिनाऊँ क्या ?
- 'साँझ का आकाश' (काव्य संकलन), पृ.सं. 35
असेंबली में
जूता चप्पल चले
ज्यों गली में।
- अग्नि पखेरू (हाइकु संकलन) पृष्ठ 29
रमाकान्त श्रीवास्तव की राजनैतिक सन्दर्भों की कविता हमें बेचैन ही नहीं करती अपितु सोचने की शक्ति भी देती हैं। इनके काव्य में विद्रोह के साथ सर्जनात्ममकता भी है।
'सुनहरा पन्ना साँझ का' शीर्षक कविता संकलन में प्रगतिशील काव्यधारा के कवि डॉ. श्रीवास्तव ने देश की राजनीति की विकृति को उजागर किया है।
अनुपम भाषा-शिल्प के साथ कवि ने देश और समाज की राजनीति पर तीव्र कटाक्षपूर्ण और मर्मस्पर्शी व्यंग्य किया है-
खोज रहा हूँ अपना भारत कहीं नहीं वह मुझे दिख रहा राजनीति की विकृति
पुती उसके चेहरे पर विकृत हो गया
अता-पता खो गया
हाय ।
लापता हो गया।
- (सुनहरा पन्ना साँझ का - डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव)
राजनैतिक कविताओं में ये सारे कवि विपक्ष के कवि हैं। नागार्जुन ने स्वयं अपने को अगणित बार अपनी कविताओं में 'जनकवि' के नाम से विभूषित किया है। 'प्रतिहिंसा ही स्थायीभाव है' शीर्षक कविता में कवि अपना परिचय देते हुए कहता है-
प्रतिहिंसा स्थायीभाव है मेरे कवि का
जन जन में जो ऊर्जा भर दे मैं उद्गाता हूँ उस रवि का। 21
विपक्ष का पक्षधर होने के नाते वे सत्ता की कटु आलोचनाएँ करते हैं, उसके किसी वैशिष्ट्य का उद्गीत गाते दीख नहीं पड़ते। पर इस प्रकार की कविता में नागार्जुन प्रायः संयमित मर्यादित और न्यायमुक्त नहीं रह गए हैं।
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