केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में किसान संवेदना - Farmer's sympathy in the poetry of Kedarnath Agarwal

हम बाहर के वस्तु जगत् को अपने इन्द्रियों के माध्यम से जानते-समझते और महसूस करते हैं। इस वस्तु जगत् का हमारे मन पर जो प्रभाव पड़ता है, उसकी घटनाओं की जो हमारे हृदय पर प्रतिक्रिया होती है उसे ही संवेदना कहते हैं। किसी के दुःख को देखकर जब हमारा मन द्रवित होता है तो उससे हमारी संवेदनशीलता का पता चलता है। किसान संवेदना का तात्पर्य है कि किसान जीवन के दृश्यों और घटनाओं का कवि के हृदय पर कैसा प्रभाव पड़ता है ? किसान जीवन से सम्बन्धित किन विशेषताओं से उसका कवि हृदय प्रभावित होता है और कविता करने को उत्सुक होता है? लेकिन हिन्दी कविता के किसान जीवन की ओर आकर्षित होने की एक वैचारिक पृष्ठभूमि भी है जिसे जानना आवश्यक है। इस पाठ में विभिन्न उपशीर्षकों के माध्यम से इस किसान संवेदना की वैचारिक पृष्ठभूमि और उसकी विशेषताओं का विश्लेषण किया जाएगा।


प्रगतिशील आन्दोलन और किसान जीवन


मार्क्सवादी दर्शन और चेतना के आधार पर लिखे गए काव्य को प्रगतिशील काव्य के नाम से अभिहित किया जाता है। इस दर्शन के अनुसार मानव जाति का इतिहास मुख्य रूप से वर्ग संघर्ष का परिणाम है। यह संघर्ष दो वर्गों में होता है जो आर्थिक हितों में परस्पर टकराहट के कारण एक दूसरे के विरोधी होते हैं। पहला वर्ग शोषकों का है और दूसरा शोषितों का। समाज की अवस्था और उत्पादन की प्रक्रिया के बदलने से इन दोनों वर्गों के स्वरूप में भी परिवर्तन होता रहता है। जैसे सामन्तवादी समाज में मुख्य संघर्ष ज़मींदार और किसान के बीच में होता है जबकि उत्पादन प्रणाली के बदलने से जब पूँजीवादी समाज का विकास होता है तो वहाँ मुख्य संघर्ष मजदू और पूँजीपति में होता है।

सन 1940 के आस-पास जब हिन्दी कविता में प्रगतिशील आन्दोलन अपने परवान पर था, उस समय भारतीय समाज संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। वह एक सामन्तवादी समाज तो था लेकिन वहाँ पूँजीवाद का विकास भी हो रहा था। यानी वह एक अर्द्धसामन्ती और अर्द्धपूँजीवादी समाज था। ऐसे में उस समय भारत में ज़मींदार किसान तथा पूँजीपति-मजदूर में अपने आर्थिक हितों के लिए संघर्ष हो रहा था । प्रगतिशील कवियों ने इस वर्ग संघर्ष को पहचाना और किसान तथा मजदू के पक्ष में अपनी लेखनी उठा ली। हिन्दी कविता के इतिहास में पहली बार कवियों ने किसान-मजबू के जीवन पर दृष्टिपात किया।

इसके पहले द्विवेदी युग के कवियों ने किसानों की दुर्दशा पर कविताएँ लिखी थीं लेकिन वे छिटपुट ही थीं और उस दुर्दशा पर कवि की निगाह वर्ग चेतना की वजह से नहीं गई थी। किसान उस दौर की कविता के केन्द्र में नहीं थे। लेकिन इस बार स्थिति बिल्कुल अलग थी। मार्क्सवादी विचारों की पृष्ठभूमि में किसान, मजलू और गरीब इस बार कविता के केन्द्र में थे और उनका जीवन, उनका संघर्ष, उनके शोषण का विरोध, उनकी जिजीविषा उनका उल्लास और उत्साह ही हिन्दी कविता के प्रमुख विषय बन गए। हिन्दी कविता में इसे प्रगतिवाद अथवा प्रगतिशील आन्दोलन कहा गया । केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवियों का उदय इसी प्रगतिशील आन्दोलन की पृष्ठभूमि में हुआ और इसी से उनकी पहचान भी बनी।

केदार की राजनैतिक कविताओं में इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। उनकी कविता में ज़मींदारों, साहूकारों और पूँजीपतियों के प्रति जो घृणा और विरोध का भाव है वह इस मार्क्सवादी चेतना का ही प्रभाव है। उन्हें किसानों और मजबूरों की शक्ति पर भरोसा है और वे इनके विकास के रास्ते में पड़े पत्थर को ध्वस्त कर देना चाहते हैं-


पत्थर के सर पर दे मारो अपना लोहा वह पत्थर जो राह रोककर पड़ा हुआ है, टूटने के घमण्ड में अड़ा हुआ है जो महान् फैले पहाड़ की अन्धकार से भरी गुफा का, एक भारी टुकड़ा है।


कहना उचित है कि यह पत्थर और कुछ नहीं बल्कि पूँजीवाद और सामन्तवाद का नापाक गठजोड़ है जो किसान और मजदूर के विकास का सबसे बड़ा रोड़ा है।

इस नापाक गठजोड़ ने भारतीय किसानों और मजदूरों के जीवन में अभाव और दरिद्रता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं छोड़ा है। केदारनाथ अग्रवाल इस अभाव और दरिद्रता का विस्तार से वर्णन करते हैं। सामन्तवाद ने अन्नदाता कहे जाने वाले किसान का इतना शोषण किया है। कि आज वह अन्न के दाने के लिए भी तरस गया है। आपके पाठ्यक्रम में लगी कविता 'पैतृक सम्पत्ति' किसान की इस करुण स्थिति का बखूबी वर्णन करती हैं -


जब बाप मरा तब यह पाया


भूखे किसान के बेटे ने : घर का मालवा, टूटी खटिया, कुछ हाथ भूमि- वह भी परती. .... यही नहीं, जो भूख मिली, सौ गुनी बाप से अधिक मिली।

अब पेट खलाये फिरता है चौड़ा मुँह बाए फिरता है। वह क्या जाने आजादी क्या ? आजाद देश की बातें क्या ?


अन्नदाता का बेटा भूखा-खा है। यह बात कवि को सहन नहीं होती और इस गुस्से में ही वह आजादी पर भी प्रश्न उठाने लगता है। वे आजादी का मूल्यांकन किसान, मजदूर, गरीब और फटेहाल की स्थिति की कसौटी पर करते हैं। इस कसौटी के निर्माण में प्रगतिशील चेतना का बहुत बड़ा योगदान है। केदारनाथ अग्रवाल किसान की इस करुण हालत के कारणों की खोज करते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भारत में किसानों के शोषण का सबसे बड़ा जरिया सूदखोरी है। अनेक बुद्धिजीवियों, कथाकारों और कवियों ने सूदखोरी की प्रथा को भारतीय किसान के शोषण का सबसे बड़ा हथियार माना है।

केदारनाथ अग्रवाल सूदखोरी और सूदखोरों का विरोध करते हुए लिखते हैं-


वह समाज के त्रस्त क्षेत्र का मस्त महाजन, गौरव के गोबर गणेश सा मारे आसन, नारिकेल से सिर पर बाँधे धर्म-मुरेठा, ग्राम बधूटी की गौरी गोदी पर बैठा, नागमुखी पैतृक सम्पत्ति का मुख खोले, जीभ निकाले, बात बनाता करुणा घोले, ब्याज स्तुति से बाँट रहा है रुपया पैसा, सदियों पहले से होता आया है ऐसा !!


सूदखोरों के साथ ज़मींदार भी किसानों के शोषण में सामान रूप से भागीदार रहे हैं। बेगार और खेत पर मालिकाना हक का प्रश्न सदियों से किसान और जमींदार के बीच संघर्ष का कारण रहा है।

मार्क्सवादी होने के कारण केदार के लिए श्रम का बहुत महत्त्व है। वे ज़मींदार और किसान के संघर्ष में श्रम का साथ देते हैं। उनकी निगाह में ज़मीन उसकी है जो उस पर अपने खून-पसीने से फसल उगाता है। तभी वे 'धरती' शीर्षक कविता में स्पष्ट रूप से घोषणा करते हैं-


यह धरती है उस किसान की जो बैले के कन्धों पर बरसात घाम में, जुआ भाग्य का रख देता है, खून चाटती हुई वायु में पैनी कुसी खेत के भीतर, दूर कलेजे तक ले जाकर जोत डालता है मिट्टी को,

पाँस डाल कर, और बीज फिर बो देता है नये वर्ष में नयी फसल के. ढेर अन्न का लग जाता है। यह धरती है उस किसान की ।


इस तरह केदार जमींदारी और सूदखोरी को किसानों के शोषण का सबसे बड़ा कारण मानते हैं। उनके लेखक को कोई दुविधा नहीं है। वे श्रमशील और मेहनतकश जनता के पक्ष में अपनी लेखनी की तुला को झुकाए रखते हैं। कहना उचित होगा कि श्रमशील जन के प्रति कवि की यह पक्षधरता उसकी मार्क्सवादी चेतना की अभिव्यक्ति है।


बुंदेलखंडी परिवेश का प्रभाव


यूँ तो प्रगतिशील कवि मार्क्सवादी विचारों के आलोक में कविता की रचना करते हैं लेकिन सिर्फ़ विचार से ही कविता की रचना सम्भव नहीं है।

सिर्फ़ विचारों के आधार पर रची गई कविता को कविता की संज्ञा देना उचित भी नहीं है। अच्छी और सच्ची कविता पदार्थमय होती है। उसमें उसके आस-पास के जीवन और वस्तु जगत् के रूप-रस-गन्ध-ध्वनि आदि की अनुगूँज और स्मृति होती है। इस रूप-रंग-गन्ध और ध्वनि के गुणों की विशिष्टता के कारण वस्तुजगत् में विशिष्टता आती है। किसी क्षेत्रविशेष में वस्तुजगत् की विशिष्टता से ही स्थानीयता और आंचलिकता की धारणा का विकास होता है। इस विशिष्ट वस्तुजगत् के अनुकरण के कारण कविता में स्थानीयता का समावेश होता है। केदारनाथ अग्रवाल की कविता में भी यह गुण विद्यमान है।

उनकी कविता पर बुंदेलखंड की प्रकृति और संस्कृति का गहरा प्रभाव लक्षित होता है। उनकी कविता में रचित किसान दरअसल बुंदेलखंड का किसान है जिसका जीवन वहाँ के जंगल, पहाड़ और केन नदी के प्रवाह से स्पन्दित होता हैं। बुंदेली संस्कृति के लिए पहाड़ और नदी से सजी इस प्रकृति के महत्त्व को स्वीकार हुए केदारनाथ अग्रवाल कहते हैं-


अधिष्ठित है


नगर का परम पुरुष पहाड़


नवागत चाँदनी के कौमार्य में;


आसक्ति को अनासक्ति से साधे,


भोग को योग से बाँधे,


समय में ही


समयातीत हुआ,


पास ही


प्रवाहित है


अतीत से निकल आयी,


वर्तमान को उच्छल जीती,


भविष्य की भूमि की ओर


संक्रमण करती नदी,


गतिशील निरन्तरता की जैसे वही हो


एकमात्र सांस्कृतिक


चेतन अभिव्यक्ति ।


चाँदनी के कौमार्य में पर्वत की विशालता और उसके पास ही अतीत से निकलकर भविष्य की ओर बहती नदी का सौन्दर्य ही कवि के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि वह संस्कृति भी महत्त्व वाली है जो इस परिवेश में फली-फूली है।

पर्वत की कठोरता और नदी की मृदुलता बुंदेली संस्कृति को योग और भोग का सामंजस्य प्रदान करती है । वह बुंदेलों को मर्यादित भोग का पाठ पढ़ाती है। पहाड़ आसक्ति और भोग को मर्यादित करता है जबकि नदी की गतिशीलता मर्यादित भोग वाली और अतीत से निकलकर भविष्य की ओर जाने वाली बुंदेलखंडी संस्कृति का रूपक है। इन पंक्तियों के माध्यम से केदारनाथ अग्रवाल यह भी इशारा करना चाहते हैं कि मानव सभ्यता और संस्कृति को बनाने और संवारने में नदियों की बड़ी भूमिका रही है ऐसी ही भूमिका के बुंदेलखंड में बहने वाली नदी केन की भी देखते हैं-


केन मनुष्यों के जीवन की है पथगामी


बूँद-बूँद है रक्त स्वेद-सा इसका नामी


भूरागढ़ का किला सुनाता है यह गाथा ऊँचे सूरज से ऊँचा है जन का माथा दोनों और हरे खेतों का दाना दाना दूर खड़ा टुनटुनिया पत्थर पास बुलाता केन नदी की बाँह पकड़ने को ललचाता


आशा का बुनता रहता है ताना-बाना


नदी मनुष्य के जीवन पथ की सहगामी है। वह अपने पानी से सिर्फ़ उनके फसलों को ही नहीं सींचती बल्कि उनके जीवन और संस्कृति को भी सींचती है। केदारनाथ अग्रवाल इस बात को समझते हैं और अपनी कविता में प्रकारान्तर से कहते भी हैं। इस केन नदी की पानी से अपना जीवनरस खींचने वाली और उसके कछार में पैदा होने वाली और खेत में उसक के साथ खड़ी हरी फसल का एक बिम्ब देखिए जिसे केदारजी बहुत आत्मीयता से चित्रित करते हैं. -