महादेवी की विरहानुभूति - feeling of separation from Mahadevi
विरह प्रेम का उदात्त स्वरूप है, इसे प्रेम की कसौटी भी कहा जाता है। महादेवी वर्मा के काव्य में अज्ञात प्रियतम के प्रति विरह वेदना की अभिव्यक्ति हुई है, उनके सम्पूर्ण काव्य में आद्योपान्त करुणा और वेदना की धारा प्रवाहित हुई है। जिसके कारण उन्हें आधुनिक मीरा कहा जाता है। उनके काव्य में वियोगावस्था की अनेकानेक मनोदशाओं के चित्र उपलब्ध होते हैं। स्वयं महादेवी ने 'यामा' की भूमिका में लिखा है "दुःख मेरे निकट जीवन का ऐसा काव्य है जो सारे संसार को एक सूत्र में बाँधकर रखने की क्षमता रखता है। हमारे असंख्य सुख हमें चाहे मनुष्यता की पहली सीढ़ी तक भी न पहुँचा सके, किन्तु हमारा एक बूँद आँसू भी जीवन को अधिक मधुर उर्वक बनाए बिना नहीं गिर सकता ।
व्यक्तिगत सुख विश्व वेदना में घुलकर जीवन को सार्थकता प्रदान करता है, तो व्यक्तिगत दुःख विश्व के सुख में घुलकर जीवन को अमरत्व । " स्पष्ट है कि दुःख जीवन को प्रेरणा और स्फूर्ति देता है। उसमें निर्माण की शक्ति विद्यमान है और वह जीवन को अमरत्व देने के साथ ही सुख का दूत भी है। महादेवी की विरहानुभूति को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है -
प्रेम वेदना की गहनता
महादेवी को वेदना की कवयित्री कहा जाता है। उनके काव्य में वेदना,
पीड़ा, विरह आदि का विशेष महत्त्व है। प्रिय के वियोग में पीड़ा की अतिशयता ने महादेवी को वेदनाप्रिय बना दिया। उन्हें विरह भी उतना ही प्यारा है, जितना प्रियतम उनके काव्य में प्रेम-वेदना की गहनता सर्वत्र विद्यमान है। वेदना ही वह माध्यम है। जिसने उन्हें सर्वशक्तिमान् ईश्वर के दर्शन करवाये - मेरे बिखरे प्राणों में सारी करुणा दुलका दो, मेरी छोटी सीमा में अपना अस्तित्व मिटा दो। पर शेष नहीं होगी यह मेरे प्राणों की क्रीड़ा, तुमको पीड़ा में ढूँढ़ा तुममें ढूँढूँगी पीड़ा।
करुणा की प्रधानता
विरह की गहन अनुभूति के प्रभावस्वरूप महादेवी के हृदय में करुणा का सागर उमड़ पड़ा।
उनके करुणा भाव में निराशा या अवसाद नहीं है वरन् जीवन का संकल्प और दूसरों के दुःख से द्रवीभूत होने की क्षमता है । वे पुष्प की भाँति सुगन्ध देकर, बादलों की भाँति वर्षा कर, दीपक की भाँति जलकर संसार को प्रकाश युक्त करने की भावना से ओतप्रोत होकर दूसरों के दुःख में सम्मिलित होने में जीवन की सार्थकता स्वीकारने लगीं। तभी तो वे कहती हैं-
जिन प्राणों से लिपटी हो, पीड़ा सुरक्षित चन्दन-सी
जिसको जीवन की हारें, हों जय के अभिनन्दन सी, वर दो यह मेरा आँसू, उसके उर की माला हो !
भावोद्रेक की नैसर्गिकता
महादेवीजी की वेदना में कहीं कृत्रिमता नहीं, किसी तरह का बाहरी आडम्बर नहीं। उनकी विरहानुभूति सहज, सरल गति से प्रवाहित हुई है। जिसमें भावोद्रेक सहज द्रष्टव्य है। कुछ विद्वानों ने उनकी वेदना पर काल्पनिक होने का आरोप लगाया है, किन्तु महादेवी वर्मा ने इस आक्षेप का निराकरण करते हुए जो उत्तर दिया है, उससे स्पष्ट है कि उनकी पीड़ा सच्ची और सहज नैसर्गिक है-
जो न प्रिय पहचान पाती।
दौड़ती क्यों प्रति शिरा में प्यास विद्युत-सी तरल बन क्यों अचेतन रोम पाते चिर व्यथामय सजग जीवन ?
किस लिए हर साँस तम में सजल दीपक राग गाती ।
नारीसुलभ सात्त्विकता
महादेवी के काव्य में नारीहृदय की कोमल भावनाओं के साथ सात्त्विक गुणों का भी पूर्ण परिपाक हुआ है। उनके गीतों में प्रेम की जिस वेदना का चित्रण हुआ है, उसमें हृदय की कलुषता, द्वेष, घृणा, कटुता, प्रतिकार की भावना को मिटाकर उसे पवित्र पावन बनाने की क्षमता विद्यमान है। उनकी वेदना में विश्वव्यापी करुणा का अगाध सागर लहराता है। उनकी करुण पुकार में नारी हृदय की वेदना का स्पष्ट चित्र द्रष्टव्य है-
जो तुम आ जाते एक बार !
कितनी करुणा कितने सन्देश पथ में बिछ जाते बन पराग, गाता प्राणों का तार-तार अनुराग भरा उन्माद राग, आँसू लेते वे पद पखार!
विरह की आध्यात्मिकता
महादेवी की वेदना निराशा और अकर्मण्यता की पर्याय न होकर संकल्प की दृढ़ता और पावनता की प्रतीक है।
परोक्ष प्रिय के प्रति अलौकिक और आध्यात्मिक वेदना के कारण महादेवी ने अपने अन्तःकरण का परिष्कार किया है। वे सुख की अपेक्षा दुःख में, मिलन की अपेक्षा विरह में आनन्द की अनुभूति करने लगती हैं। वे मुक्ति और मिलन की अपेक्षा विरहिणी ही रहना चाहती हैं क्योंकि विरह ही उनका पाथेय बन जाता है-
विरह की घड़ियाँ हुई अलि मधुर मधु की यामिनी-सी ! सजनी अन्तर्हित हुआ है 'आज में धुंधला विफल कल' हो गया मिलन एकाकार मेरे विरह में मिल राह मेरी देखती स्मृति अब निराश पुजारिनी-सी !
चिर- विरह की आकांक्षा
महादेवी वर्मा अत्यधिक पीड़ा और वेदना के उपरान्त भी प्रिय के साथ मिलन की अपेक्षा न करके चिर विरह की आकांक्षा करती हैं। वे वियोग में ही संयोग की अनुभूति करती हैं। उनकी विरह भावना में नदी की तीव्र धारा के समान अजस्र स्रोत है, जिसकी गति अखण्डित है। उनके हृदय में मिलन की चाह नहीं वरन् चिर विरह की साधना का भाव है। उनके व्याकुल प्राणों का संगी अँधेरा ही है-
शून्य मेरा जन्म था अवसान है मुझको सवेरा। प्राण आकुल के लिए संगी मिला केवल अँधेरा । मिलन का मत नाम ले मैं विरह में चिर हूँ ।
महादेवी के काव्य का मूल भाव वेदना है, लेकिन उसमें आनन्द भी समाहित है। वे सुख और दुःख दोनों के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए भी दुःख को अधिक महत्त्वपूर्ण मानती हैं। दुःख और वेदना की अनुभूति ने ही महादेवी के गीतों को रसपूर्ण ने बनाया है। गंगाप्रसाद पाण्डेय के शब्दों में "महादेवीजी की वेदना मानवीय चेतना के उच्चतम शिखर से फूटकर बहने वाली आध्यात्मिक गंगा है, जो अलौकिक भावनाओं की शत-शत लहरियों से विश्व के संतप्त प्राणों को परिप्लावित करती हुई चिर शान्त सागर की ओर बराबर प्रवाहित है।"
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