नागार्जुन की कविता में अभिव्यक्त लोकदृष्टि - Folk vision expressed in Nagarjuna's poetry
नागार्जुन की कविताओं को समसामयिकता मूलक अध्ययन की दृष्टि से निम्नलिखित सन्दर्भों में विभक्त किया जा सकता है - समसामयिक सामाजिक दृष्टि और समसामयिक राजनैतिक दृष्टि ।
सामाजिक दृष्टि
नागार्जुन की कविताओं में प्रमुख रूप में निम्नलिखित समसामयिक सामाजिक सन्दर्भ प्राप्त होते हैं- भूख का सन्दर्भ, लज्जा वसन का सन्दर्भ, रुग्णता और चिकित्सा का सन्दर्भ तथा शिक्षा की आवश्यकता और उसके अभाव का सन्दर्भ ।
समसामयिक सामाजिक लोकदृष्टि को नागार्जुन अपने सर्जक व्यक्तित्व के द्वारा समस्याओं को सही समय की दृष्टि से खोलने और व्याख्यायित करने का प्रयास करते हैं।
कहीं तो इस प्रक्रिया में वे रोष, आक्रोश और विरोध का तेवर उपस्थित करते हैं, तो कहीं निरुपायता और विवशता का निरूपण करते हुए व्यंग्य का कशाघात प्रस्तुत कर जाते हैं । उनके काव्य-संसार में इन विभिन्न समसामयिक सामाजिक लोकदृष्टि का चयन व्यापक मानवतावादी मूल्य की दृष्टि से किया जाता है। तभी उनकी ऐसी कविताओं में निरूपित सभी सामाजिक लोकदृष्टि के बीच मूल्य का प्रश्न अत्यन्त ज्वलन्त रूप में उपस्थित हुआ है। इस दृष्टि से वे यथार्थ के सृजन के सन्दर्भ में मूल्य की अपेक्षा पर विचार करते हुए अपना निर्णय प्रस्तुत कर बैठते हैं।
भूख का सन्दर्भ
यह सन्दर्भ प्रकट रूप में एक बालक के भूख का सन्दर्भ है,
वहाँ सामाजिक विषमता के क्रूर चक्र में फँसे, भूख से बिलखते हुए एक मासूम बच्चे का हृदय द्रावक चित्र उपस्थित किया गया है।
'नयी पौध" शीर्षक कविता से इस सन्दर्भ को उपस्थित करती है। इसमें उन्होंने एक ऐसे अस्वस्थ एवं कुरूप चेहरे को उपस्थित किया है, जिसकी आँत में भोजन न मिलने के कारण मरोड़ उठ रही है। भोजनाभाव में उसकी टाँगें तीलियों की तरह सूखी हैं। उसकी चाल अटपटी है। माता-पिता की असामर्थ्य में खाना न मिलने के कारण यह लड़का पीपल की फली के गिरने का इन्तजार में उसके नीचे खड़ा है। ऊपर की गिरी फलियों से जिस किसी तरह पेट भरने के बाद वह चुपचाप झोपड़े के अन्दर अपनी भूखी माँ के पेट से सटकर सो जाएगा। जाहिर है कि उसकी माँ भी झोपड़े के अन्दर भूखी पड़ी है।
इस प्रकार, नागार्जुन बच्चे को अग्रप्रस्तुत कर उसकी माँ और उसके पूरे परिवार की भूख का सन्दर्भ और इस रूप में एक पूरे तबके की भूख का सन्दर्भ उपस्थित करते हैं। इस सन्दर्भ में यहाँ यथार्थ निरूपण वर्णनात्मकता के स्तर पर हुआ है, वो अपनी प्रभावोत्पादकता में अत्यन्त करुण हो उठा है। व्यंजित रूप में उसके मूल में वर्गगत शोषण विद्यमान है। भूख का सन्दर्भ वृत्ति के स्पष्ट अभाव को रेखांकित करता है। सामाजिक मूल्य की दृष्टि से मनुष्य के बच्चे का पीपल जैसे पेड़ के निकृष्ट फल पर आश्रित रहकर भूख का जैसे-तैसे शमन करना समाज के अत्यन्त शोचनीय रूप में उपस्थित होता है।
'प्रेत का बयान' शीर्षक कविता भी भूख के सन्दर्भ को निरूपित करती है।
यहाँ भूख के सन्दर्भ को अत्यन्त व्यंग्यात्मक स्तर पर उपस्थित किया गया है। यह भूख सामान्य नहीं हैं, बल्कि मृत्यु तक पहुँचाने वाली भूख है। प्रायः समसामयिक व्यवस्था मूल से उत्पन्न होने वाली सामान्य जनता की मृत्यु को रोग आदि दूसरे कारणों से होने वाली मृत्यु में तब्दील कर देती है। यहाँ इस सन्दर्भ को अद्भुत मिथकीयता और नाटकीयता प्रदान की गई है।
इस कविता में भूख से मृत एक प्राईमरी स्कूल के शिक्षक का प्रेत यमराज के सामने अपना बयान दे रहा है। वह सरकार व्यवस्थापकों की आवाज़ में आवाज़ मिलाता हुआ लगातार इस तथ्य का निषेध कर रहा है कि उसकी मृत्यु भूख से हुई है ।
यमराज जब उससे कड़ककर पूछता है -
कैसे मरा तू ? भूख से अकाल से,
बुखार या कालाजार से ?
तब शिक्षक का प्रेत भूख से मरने के तथ्य का सरासर इनकार कर बैठता है।
अविश्वास की हँसी हँसा दण्डपाणि महाकाल
बड़े अच्छे मास्टर हो,
आये हो मुझको भी पढ़ाने वाह भाई वाह रे
मैं भी तो बच्चा हूँ
तो तुम भूख से नहीं मरे ?
प्रेत उत्तर देता है-
साक्षी है धरती, साक्षी है आकाश और और और भले व्याधियाँ हों भारत में किन्तु उठाकर दोनों बाँह किट किट करने लगा जोरों से प्रेत किन्तु भूख या क्षुधा नाम हो जिसका ऐसी किसी व्याधि का पता नहीं हमको
सावधान महाराज
नाम नहीं लीजिएगा हमारे सामने कभी भूख का ।
इस प्रकार भुखमरे स्वाभिमानी सुशिक्षित प्रेत की इस दहाड़ के सामने यमराज, महामहिम नरकेश्वर निरुत्तर रह जाते हैं। यहाँ कवि ने भूख का एक पूरा परिवेश ही उत्सृजित कर दिया है। भूख के इस आत्मनिषेध में उसकी व्यंग्यात्मक सत्यता बड़ी घनीभूतता में उजागर हो उठी है।
नागार्जुन की 'अकाल और उसके बाद' शीर्षक कविता उनकी एक अत्यन्त प्रसिद्ध कविता है। इस कविता के एक भाग में कवि ने भूख के सन्दर्भ का रेखांकन यथार्थता के धरातल पर किया है। काव्यांश अवलोक्य M-
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त
इस कविता में भूख का दायी अकाल का समय है। पर व्यवस्था की ओर से इस त्रासद स्थिति से निदान का कहीं कोई प्रबन्ध नहीं है कि दुर्भिक्ष में अन्नाभाव के कारण कई दिनों तक चूल्हा रोता रहा, चक्की उदास पड़ी रही। कई दिनों तक कानी कुतिया भी उसके पास सोयी पड़ी रही। कई दिनों तक अन्नाभाव के कारण चूहों की हालत भी दयनीय बनी रही। इस प्रकार यहाँ संकेत-रूप में घर में अन्न के एक-एक दाने का अभाव निरूपित कर दिया गया है। सरकारी ओर से किसी प्रकार की सुविधा या राहत कार्य का उल्लेख नहीं मिलता ।
लज्जा वसन का सन्दर्भ
नागार्जुन की काव्य-रचना में समसामयिक लोकदृष्टि के अन्तर्गत लज्जा वसन के सन्दर्भ को कवि ने 'मन करता है' शीर्षक कविता में रेखांकित किया है। कवि ने वस्त्र के अभाव के सन्दर्भ को कई भाव- रिंगणों (मूड्स) में उपस्थित किया है। प्रथमतः, वह इस अभावात्मकता को वैयक्तिक निर्लज्जता में सन्दर्भित करता है। वाचक निपट नंगा होकर समुद्र तट पर खड़ा रहना चाहता है। पूँजीपति समाज और व्यवस्था ने कपड़ों का यह वास्तविक अभाव पैदा किया है। इसलिए वह कहता है'-
यो भी क्या कपड़ा मिलता है ? धनपतियों की ऐसी लीला !
यहाँ धनपतियों में व्यावसायिक, उच्चतम प्रशासक सभी सम्मिलित हैं। यह नग्नता वस्तुः वस्त्रहीन स्थिति के विरोधी स्वीकार में कवि के द्वारा चिन्त्य सामाजिक मार्यादा का सहन अतिक्रमण करने वाली है।
वस्त्र के अभाव में वाचक नंगा रह लेगा। वह अपने शरीर के यत्किंचित शेष वस्त्र को भी आग लगा कर नष्ट कर देने की बात करता है। वह तो अपने वस्त्रहीन निर्लज्ज जीवन से कहीं हितकर कालकूट अथवा विष पी लेने की स्थिति का संवरण करना मानता है। उस अभाव में वह दिगम्बर भोला बन जाना चाहता है।
वह सागर तट पर नंगा खड़ा होकर जीवन गुजार देना चाहता है, क्योंकि उसने समसामयिक परिस्थितियों से सीखा है कि समाज में कपड़ा पाना आसान नहीं है और जब कपड़ा नहीं मिलता तो थोड़ी-थोड़ी लाज ढकने से बेहतर नंगा हो जाना ही है। इसलिए वह कहता है". -
मन करता है:
नंगा होकर खड़ा रहूँ सागस्तट पर नंगा होकर -
कुछ घंटों तक क्या, जीवन-भर
यो भी क्या कपड़ा मिलता है।
यहाँ द्रष्टव्य है कि वस्त्र के अभाव में कवि सामाजिकता का परित्याग कर एकाकी हो जाना चाहता है। वह नग्नता को स्वीकार तो करता है, किन्तु भीड़ और समाज के बीच नहीं ।
गिसवर्गों वीटनिकों की तरह वह सामाजिक मर्यादा का अतिक्रमण भीड़ और सभागृहों में नहीं करता, बल्कि प्रकृति के एकान्त सागर तट पर नग्न होकर जीवन बसर कर लेना चाहता है। वह विष पीकर आत्महत्या की भी बात सोचता है, किन्तु वाचक से यह भी सम्भव नहीं हो पाता, क्योंकि कहीं भी विष नहीं मिल पाता है।
कवि हिन्दू धर्म के देवताओं पर भी चोट करता है वह क्षीर सागर में शेषनाग की सेज पर सोने वाले विष्णु के प्रति, जिन्हें त्रिदेव में पालनकर्त्ता माना जाता है, वस्त्राभाव नहीं दूर कर पाने की स्थिति में वाणी से प्रताड़ित करता है।
वह मान लेता है कि यदि पालनकर्त्ता हमें वस्त्र नहीं दे पाता है तो वह मर चुका है। इस प्रकार वह पीताम्बरधारी विष्णु को महामृतक मानकर उसे नंगा कर उसकी अन्त्येष्टि सम्पन्न करना चाहता है। वह अन्य सारे देवताओं को भी निर्लज्ज कहता है और उन्हें सलाह देता है कि विष्णु को नग्न रूप में दफना देने के बाद उसका अनमोल रेशमी पीताम्बर सभी सुरेश, कुबेर आदि छिप-छिप कर क्रम-क्रम से पहनें। कवि मान लेता है कि जब सामाजिकों को वस्त्र नहीं मिलते तो निश्चय ही देवताओं के यहाँ भी वस्त्र की कमी होगी। इसलिए वह सबसे बड़े पालक देवता को नंगा जलाकर उसके वस्त्र को ही पहनने का ताना अन्य देवताओं को देता है।
कवि मार्क्सवादी चेतना से प्रेरित होकर इस कविता की रचना करता है।
जो ईश्वर सामाजिकों की अनिवार्य भौतिक ज़रूरतों को मुहय्या नहीं कर सकता, सामाजिकों और कवि की दृष्टि में उसे जीने का अधिकार नहीं है। इन सबके लिए वह मर चुका है। इसलिए वह उसकी अन्त्येष्टि सम्पन्न कराना चाहता है।
कहना न होगा कि नागार्जुन की समसामयिकता में कपड़े पर कई बार कंट्रोल हुआ है। इस विवशता और अभाव को नागार्जुन ने निकट से देखा है। जहाँ हिन्दी के दूसरे कवि की दृष्टि ऐसे सन्दर्भों की ओर नहीं गयी है वहाँ समसामयिक समस्या के प्रति जागरूक होने के कारण नागार्जुन की संवेदना ने काव्य-रचना के लिए ऐसे सन्दर्भ का सार्थक और उपयुक्त चयन किया है,
साथ ही अपनी प्रतिक्रियाएँ भी व्यक्त की हैं। यहाँ धर्म की मिथकें टूट गई हैं और कवि आक्रोश और व्यंग्य को एक ही साथ वाणी देने में समर्थ हो गया है।
नागार्जुन की ऐसी सन्दर्भित कविता की विशेषता यह है कि अन्य उपसन्दर्भों से जुड़ जाने के कारण कालाकित होकर भी सन्दर्भ को शाश्वत बनाने की क्षमता से सम्पन्न हो उठती है ।
रुग्णता और चिकित्सा का सन्दर्भ
नागार्जुन के यहाँ रुग्णता और चिकित्सा के अभाव का सन्दर्भ भी प्राप्त होता है। 'जया' और 'नयी पौध' इस सन्दर्भ को उजागर करने वाली कविताएँ हैं।
जया एक बहरी गूँगी लड़की है। वह एक साधारण मास्टर की बेटी है। जया का जन्म निम्न मध्यमवर्गीय कुल में हुआ है। वह चार साल की है। उसका पिता अर्थाभाव के कारण अपनी लड़की के बहरेपन की चिकित्सा नहीं करवा पाता है। चिकित्सा एवं प्रतीकार- विषयक उस गरीब पिता की असमर्थता के बारे में कवि कहता है'-
माँ-बाप गरीब न कर सकते प्रतीकार बहरापन का।
स्पष्ट है कि कवि ने प्रकारान्तर से यहाँ चिकित्सा की समस्या को उपस्थित किया है।
पर ऐसी महँगी चिकित्सा का दरवाजा निम्न मध्यम वर्ग के व्यक्तियों के लिए बन्द है। अपने केस में चिकित्सा शत-प्रतिशत अर्थ पर आधारित है और जया जिस परिवार की पुत्री है उसकी सामर्थ्य से यह बाहर है कि तभी कवि कहता है-
कैसा असा, कितना जर्जर यह मध्य वर्ग का निचला स्तर ।
इस प्रकार नागार्जुन की यह कविता अपने समाज के एक उदाहरण को निर्दिष्ट करती हुई एक व्यापक समस्या की ओर हमारा ध्यान खींचती है, जिसमें उसके अभिभावक की अशक्ति, असमर्थता और विवशता निहित है। वस्तुस्थिति यह है कि ऐसी रुग्णता के उपचार के लिए आज भी देश के स्वतन्त्र हो जाने पर कोई सार्थक पहल नहीं की जा सकी है।
'नयी पौध' शीर्षक कविता में नागार्जुन ने निम्नतम सामाजिक वर्ग के एक बच्चे की रुग्णता का चित्र प्रस्तुत किया है, जो कुपोषण के कारण कई रोगों की एक साथ मार सह रहा है। बढ़ा हुआ पेट उसके यकृत-विकार का सूचक है, तो धँसी-धँसी आँखें और फूले-फूले गाल उसकी रक्तहीनता का, तीलियों की तरह टाँग उसके सूखा रोग को घोषित करती हैं। मवाद उसके शरीर में उभरे फोड़ों और व्रणों को सूचित कर रहा है। इस तरह की रुग्णता से ग्रस्त वह लड़का जब भूख मिटाने के लिए ही तड़प रहा है और उसी का प्रबन्ध सम्भव नहीं हो पा रहा है। तब उसकी चिकित्सा और उपचार की बात तो अधर में ही टैंगी रह जाती है।
स्पष्ट है कि समाज में बाल-रोग की समस्या और निम्नतम वर्ग में रुग्णता तथा उपचार की अभावात्मकता की समस्या इस कविता में अच्छी तरह व्यक्त हुई है। यहाँ कवि का यथार्थ वर्णन ही इसे अच्छी तरह उपस्थित कर देता है। समाज में एक ओर निम्नतम वर्ग की यह शोचनीय स्थिति है, दूसरी ओर उच्च वर्ग सारी सुख-सुविधाओं से लैस है। इस प्रकार यह कविता एक भयानक सामाजिक यथार्थ से हमारा साक्षात्कार करा पाती है।
शिक्षा की आवश्यकता और उसके अभाव का सन्दर्भ
नागार्जुन ने समाज के अर्थ पीड़ित वर्ग को रेखांकित करते हुए शिक्षा की आवश्यकता, अपेक्षा और उसके अभाव को भी सन्दर्भित किया है।
प्रत्यक्ष रूप में उनके प्रथम चरण की कविताओं में 'जया' में यह सन्दर्भ खुलकर निरूपित हुआ है और व्यंजित रूप में 'नयी पौध' में भी यह सन्दर्भ आद्यन्त विद्यमान है।
इस कविता में कवि ने अपनी आत्मीयता चार साल की चपल चतुर और बहरी गूँगी जया नामक लड़की के प्रति व्यक्त की है। कवि के लिए उसका नाम सुन्दर नयनाभिराम है। जब कवि उसे स्नेह-सुधा से तृप्त कर देता है तब वह कृतज्ञ-सी हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करती है। जया के माँ-बाप गरीब हैं। इसलिए उसमें काफी सूझ-बूझ के रहते हुए भी उसकी शिक्षा की व्यवस्था करने में वह असमर्थ रह जाते हैं।
कवि कहता है कि जया चित्रकार बन सकती है। वह नर्तकी बन सकती है। उसमें बुद्धि और प्रतिभा दोनों है। लेकिन अर्थाभाव के कारण उसके सपनों पर पानी फिर जाता है। पिता उसके जीवन-यापन का भविष्य पथ गरीबी के कारण नहीं पकड़वा पाता है'-
बन सकती है वह चित्रकार
हो सकती है वह नाच सीख जिससे न किसी पर पड़े भार जिससे न माँगनी पड़े भीख
पर एक स्कूल मास्टर के लिए यह नितान्त आवश्यक है। कवि इस यथार्थता को वाणी देता है10-
स्कूली जीवन के मास्टर का हो जिसमें लेखा ।
मैंने झाँका तो देखा
बाहर सफेद अन्दर धुंधला बहरी गूँगी उस बच्ची को शिक्षा-दीक्षा का इन्तजाम ।
क्या कर सकता वह बाप भला
इस प्रकार यह कविता समाज की एक यथार्थ समस्या से हमारा परिचय कराती है। यहाँ शिक्षा एक अनिवार्यता के रूप में आवश्यक है, जिससे विकलांगता की मारी लड़की अपने भविष्य जीवन को अपने पैरों पर सँभालने में समर्थ हो सके।
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