नवगीत के स्वरूप - form of new song
'नवगीत' के स्वरूप को लेकर पर्याप्त चर्चा हुई है। डॉ० शंभुनाथ सिंह गिरिजा कुमार माथुर, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, त्रिलोचन शास्त्री, डॉ. रामदरश मिश्र, वीरेन्द्र मिश्र, बालस्वरूप राही, रवीन्द्र भ्रमर तथा रमेश कुंतल मेघ ने समय-समय पर विविध पत्र-पत्रिकाओं में इसके स्वरूप को स्पष्ट करने की चेष्टा की है। राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने नवगीत के पाँच तत्त्वों का उल्लेख किया है जीवनदर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व-बोध, प्रीति-तत्त्व और परिसंचय ।
डॉ. शंभुनाथ सिंह ने नवगीत की परिभाषा देते हुए कहा है "नवगीत गीत रचना की परम्परा और भावबोध को छोड़कर नवीन भाव सारणियों को अभिव्यक्त करने वाले 'गीत' जब भी और जिस युग में भी लिखे जाएँगे,
'नवगीत' कहलाएँगे।" (डॉ॰ शम्भुनाथ, नवगीत दशक-2 की भूमिका)
बालस्वरूप राही ने "आधुनिकता को नवगीत की अनिवार्य शर्त माना है।" (राजेन्द्र गौतम, हिन्दी नवगीत : उद्भव और विकास)
रवीन्द्र भ्रमर ने "नवगीत में दर्दिकता तथा अनुभूति की प्रधानता आवश्यक मानी है।"
डॉ. रामदरश मिश्र ने नवगीत की निम्नलिखित विशेषताएँ बतायी हैं अनुभूति की सच्चाई,
नवीन सौन्दर्य-बोध, आकार की लघुता और नवीन बिम्बों, प्रतीकों तथा उपमानों की योजना । परन्तु प्रश्न यह है कि ये विशेषताएँ तो सामान्य रूप से सभी गीतों की होती है तो इन्हें ही 'नवगीत' नाम
क्यों दिया जाए ? यहाँ उत्तर यह हो सकता है कि नवगीत को गीत विधा से पृथक् करने वाला मूल तत्त्व 'लोकोन्मुखता' का भाव ही है। नवगीत की रचनाओं का एक विहंगम पर्यावलोचन यह सिद्ध करता है कि 'नवगीत' में 'लोकोन्मुखता का भाव अत्यन्त प्रबल है। इसी विशेषता ने उसके स्वरूप को सजाया-सँवारा है और उसे एक नयी विधा के रूप में प्रतिष्ठित किया है।
डॉ. विश्वनाथ प्रसाद ने 'नवगीत' की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है. -
(1) संवेदन के अनुरूप लय को संवृत्त और विवृत्त करने का प्रयास ।
(ii) मात्राओं से अधिक लय पर बल ।
(iii) संक्रमित मानसिकता के अनुरूप वस्तुबोध और जीवन के यथार्थबोध को व्यक्त करने वाली पैनी शब्दावली ।
(iv) इन सबके अन्तराल से छानकर प्रवाहित होती हुई मध्यमवर्ग की छटपटाहट भरी जिंदगी को नवगीत में ढालने की चेष्टा ।
शुरुआत में लोगों की धारणा थी कि 'नवगीत' खुरदरी अनुभूतियों को व्यक्त करने में असमर्थ है किन्तु धर्मवीर भारती के नवगीत संग्रह 'सात गीत वर्ष' ने उनकी इस धारणा को निर्मूल सिद्ध कर दिया। ओम प्रभाकर, रमेश रंजक और अनूप अशेष जैसे नवगीतकारों ने लोक जीवन की कोमलता और संवेदनाओं के अतिरिक्त खुरदरे यथार्थ को भी वाणी दी। 'नवगीत' की पहचान यही है कि उसका रचयिता तनाव, टूटन, कुण्ठा को व्यक्त करते हुए भी राग की ऊष्मा से अपना नाता जोड़े रखता है। निराशा और व्यर्थता के क्षणों में भी अंचल की माटी की सोंधी- सोंधी महक से वह आशा के नवसंचार का एहसास कराता रहता है ताकि पराजय और हताशा की स्थिति में भी मानव जिजीविषा से परिपूर्ण रहे।
नवगीत की कलापरक विशेषताओं को इस प्रकार रेखांकित किया जा सकता है-
टटकी भाषा का प्रयोग ।
आंचलिक भाषा की मिठास का प्रयोग ।
(iii) यथार्थ की खुरदरी भाषा को गेयता के अनुरूप ढालने की चेष्टा ।
नूतन शब्दावली एवं नवीन छन्दों का प्रयोग ।
प्रकृति से गृहीत अछूते बिम्बों का प्रयोग ।
समग्रतः कहा जा सकता है कि 'नवगीत' हिन्दी साहित्य की वह विधा है जिसका सम्बन्ध लोकजीवन से है और जिसमें नवीन छन्दों एवं बिम्बों के माध्यम से आंचलिकता के साथ टटकी भाषा का प्रयोग किया गया है।
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