काव्य एवं कला का स्वरूप - form of poetry and art

काव्य या कला के स्वरूप के विषय में अज्ञेय के स्फुट विचार विविध प्रसंगों में व्यक्त हुए हैं जिन्हें काव्य या कला के बारे में प्रयोगवादी मत का प्रतिनिधि माना जा सकता है। इस सम्बन्ध में उन्होंने दो स्थलों पर गहराई से अपना मत प्रकट किया है पहला, 'त्रिशंकु' के 'कला का स्वभाव और उद्देश्य' शीर्षक निबन्ध के अन्तर्गत तथा - दूसरा, 'त्रिशंकु' के 'रूढ़ि और मौलिकता' नामक निबन्ध के अन्तर्गत। वैसे फुटकल निबन्धों में भी यत्र-तत्र इस विषय का उल्लेख हुआ है, किन्तु अन्य निबन्धों में जहाँ कहीं भी इसकी चर्चा हुई है वह उपर्युक्त दो निबन्धों में की गई चर्चा को ही पुष्ट करती है। उल्लेखनीय है कि कविता के स्वरूप तथा उसके प्रतिमानों के निर्धारणों में अज्ञेय के विचारों पर मनोविज्ञान तथा पश्चिमी जगत के आधुनिकतावादी विचारक टी. एस. एलियट का पर्याप्त प्रभाव देखा जा सकता है।


कविता या कला के वर्तमान स्वरूप के विषय में अज्ञेय स्वीकार करते हैं कि युगीन सन्दर्भों के बदल जाने के कारण पूर्ववर्ती काव्य और वर्तमान समय में रचे जा रहे काव्य में निश्चित रूप से अन्तर आ गया है। यों वे कवि के कथ्य को उसकी आत्मा का सत्य मानते हैं; व्यक्ति सत्य को व्यापक सत्य बनाने की बात करते हैं; किन्तु साथ ही स्पष्ट कर देते हैं कि यह व्यापकता सापेक्ष ही है। जीवन की बढ़ती हुई जटिलता के परिणामस्वरूप व्यापकता का घेरा क्रमशः अधिकाधिक सीमित होना चाहता है।

पूर्व में रचित काव्य और आधुनिक युग में रचे जा रहे काव्य में अन्तर स्पष्ट करते हुए अज्ञेय कहते हैं कि "एक समय था, जबकि काव्य एक छोटे से समाज की थाती था। उस समाज के सभी सदस्यों का जीवन एक रूप होता था, अतः उनकी विचार संयोजनाओं के भी सूत्र बहुत कुछ मिलते-जुलते थे। कोई एक शब्द उनके मन में प्रायः समान चित्र या भाव उत्पन्न करता था। इसका एक संकेत इसी बात में मिलता है कि आचार्यों का काव्य-विषयों का वर्गीकरण सम्भव हो पाया और कवि को मार्गदर्शन करने के लिए बता सके कि अमुक प्रसंग में अमुक अमुक वस्तुओं का वर्णन या चित्रण करने से सफलता मिल सके। आज यह बात सच नहीं रही,

आज काव्य के पाठकों की जीवन परिपाटियों में घोर वैषम्य हो सकता है, एक ही सामाजिक स्तर के दो पाठकों की जीवन परिपाटियाँ इतनी भिन्न हो सकती हैं कि उनकी विचार संयोजनाओं में समानता हो ही नहीं, ऐसे में शब्द बहुत कम हों, जिनसे दोनों के मन में एक ही प्रकार के चित्र या भाव उदित हों।"


अज्ञेय यह मानकर चलते हैं कि कविता की परख या पहचान के बारे में पुराने मत आज एकदम सटीक नहीं हो सकते। जीवन पद्धति और युग सन्दर्भ बदलने के साथ-साथ कविता का स्वरूप, उसकी परख तथा पहचान के प्रतिमानों का बदलना भी स्वाभाविक है।

अज्ञेय यह भी मानते हैं कि प्रत्येक युग में कवि या काव्य का अपना एक सत्य हुआ करता है जो युग के बदलने के साथ-साथ बदल जाया करता है। आज के कवि अपने युग के काव्य- सत्य की खोज में लीन है और उसी को प्राप्त करने के लिए वे विभिन्न स्तरों पर नये-नये आयोजनों में रत हैं। अज्ञेय स्वीकार करते हैं कि "युग सन्दर्भों के बदल जाने के बावजूद हमारे मूल राग-विराग नहीं बदले... वे शायद बदलते भी नहीं हैं। प्रेम अब भी प्रेम है,

घृणा अब भी घृणा है।" हालांकि, वे बल देकर इस तथ्य का पुष्टि अवश्य करते हैं कि "राग वही रहने पर भी रागात्मक सम्बन्धों की प्रणालियाँ बदल गई हैं और कवि का क्षेत्र रागात्मक सम्बन्धों का क्षेत्र होने के कारण इस परिवर्तन का कवि कर्म पर बहुत गहरा असर पड़ता है .... जैसे-जैसे बाह्य वास्तविकता बदलती है, वैसे-वैसे हमारे उससे रागात्मक सम्बन्ध जुड़ने की प्रणालियाँ भी बदलती हैं और अगर नहीं बदलतीं, तो उस बाह्य वास्तविकता से हमारा सम्बन्ध टूट जाता है।" कहना न होगा कि जो आलोचक इस परिवर्तन को नहीं समझ पा रहे हैं, वे उस वास्तविकता से टूट गए हैं जो आज की वास्तविकता है।


अज्ञेय काव्य को अनुभूति की अभिव्यक्ति नहीं, अपितु अनुभूति से मोक्ष मानते हैं। उनका कहना है कि अनुभव करने वाले मन और रचना करने वाले मन को अलग-अलग रहना चाहिए ताकि अभिव्यक्ति होने के उपरान्त रचनाकार अपने को मुक्त अनुभव कर सके। इलियट के शब्दों में ही अज्ञेय ने भी कहा है कि "कलाकार जितना ही बढ़ा होगा, उतना ही वह अपनी रचना से तटस्थ होगा, उसका रचनाशील मानस उसके अनुभव करने वाले मानस से पृथक होगा।" अज्ञेय ने अपने सम्पूर्ण लेखन में कविता के स्वरूप की व्याख्या के समानान्तर उसके मूल्यांकन हेतु नये प्रतिमानों की आवश्यकता भी प्रतिपादित की है।