काव्य का स्वरूप - form of poetry

हिन्दी साहित्य की विकास परम्परा में प्रयोगवाद के विमर्श का प्रारम्भ मूलतः एक विशिष्ट प्रकार की सर्जना और उसके साथ होने वाले प्रयोगों के सन्दर्भ में ही हुआ है। इस विशिष्ट सर्जना की युगीन अनिवार्यता के औचित्य को सिद्ध करने के लिए उसके समर्थकों ने एक आधारभूत सिद्धान्त पक्ष भी प्रस्तुत किया है, अतः यह विमर्श केवल सर्जना तक ही सीमित न रहकर काव्य-चिन्तन के क्षेत्र तक व्याप्त है। पूर्ववर्ती सर्जना से अपनी सर्जना के वैशिष्ट्य को प्रतिपादित करते हुए उस सर्जना को सही सन्दर्भों में पहचानने और परखने के लिए जो नयी मान्यताएँ तथा विचार सर्जक कवियों के द्वारा सामने लाए गए थे, जिसे हम प्रयोगवादी समीक्षा के नाम से अभिहित करते हैं, वह और कुछ नहीं,

उन्हीं नयी मान्यताओं और सिद्धान्तों का प्रतिरूप है। यों तो 'तारसप्तक' नामक संकलन में सम्पादक कवि आलोचक अज्ञेय के अतिरिक्त छह अन्य नये रचनाकारों की रचनाएँ भी संकलित हैं, किन्तु सिद्धान्त प्रतिपादन का मुख्य कार्य कवि आलोचक अज्ञेय द्वारा ही सम्पन्न हुआ है । इस नाते यदि प्रयोगवादी काव्य के प्रवर्तन के साथ-साथ अज्ञेय को प्रयोगवादी काव्य-समीक्षा के प्रवर्तन का भी श्रेय दिया जाए तो अनुचित न होगा। अज्ञेय न केवल छायावादोत्तर कविता के एक श्रेष्ठ सर्जक हैं, अपितु वे छायावादोत्तर समीक्षा तथा छायावादोत्तर काव्य-चिन्तन के समर्थ पुरस्कर्त्ता भी हैं। उनकी साहित्य व आलोचना सम्बन्धी मान्यताएँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। एक पूरी पीढ़ी की रचनाशीलता तथा चिन्तन पर उन्होंने अपनी गहरी छाप छोड़ी है। काव्य की आत्मा, काव्य के तत्त्व, काव्य के विषय काव्य के प्रेरक उपकरण, काव्य का प्रयोजन, काव्य एवं कला का स्वरूप और काव्यभाषा सम्बन्धी उनका चिन्तन प्रयोजनीय है।