कविता का स्वरूप - form of poetry

विजयदेवनारायण साही उन कवि आलोचकों और विचारकों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्होंने नयी कविता के स्वरूप पर ही नहीं, उसके माध्यम से कविता मात्र के स्वरूप पर भी प्रकाश डाला है। उनके विचार केवल नयी कविता के बारे में ही नहीं, वरना कविता मात्र के बारे में हमारी समझ को नया आयाम प्रदान करते हैं। वैसे तो परम्परा से कविता के सम्बन्ध में चिन्तन करने वाले कवि और विचारक इस बात को कहते आए हैं कि कविता को किसी भी प्रकार की परिभाषा में बाँध पाना सम्भव नहीं है, क्योंकि उससे कविता के स्वरूप और विकास की दिशाएँ अवरुद्ध और सीमित होती हैं।

इसके बावजूद अपनी-अपनी दृष्टि से कविता को समझने का प्रयास करते हुए स्थापित विचारकों ने कविता की अपनी-अपनी परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं और इस तरह कविता के एक शास्त्र का निर्माण करने में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है।


विजयदेवनारायण साही ने यद्यपि कविता को परिभाषाओं में बाँधने का प्रयास नहीं किया है, फिर भी नयी कविता के स्वरूप की व्याख्या के क्रम में उनके विचार सारगर्भित हैं। उनकी मान्यता है कि "नयी कविता के अन्तर्गत न केवल कविता का ऊपरी कलेवर बदला है या नये प्रतीकों या बिम्बों या शब्दावली की तलाश हुई है;

बल्कि गहरे स्तर पर काव्यानुभूति की बुनावट में ही परिवर्तन आ गया है,... चेतना के जो तत्त्व काव्यानुभूति के आवश्यक अंग दिखते थे, उनमें से कुछ अनुपयोगी या असार्थक दिखने लगे, कुछ अन्य जो पहले अनावश्यक या विरोधी लगते थे, काव्यानुभूति के केन्द्र में आ गए और कुल मिलाकर काव्यानुभूति और जीवन की काव्येतर अनुभूतियों में जो रिश्ता था, वह रिश्ता भी बदल गया।"


डॉ. नामवर सिंह ने भी साही के इस मत का समर्थन किया है और साही द्वारा दी गई अज्ञेय और प्रसाद की तुलना का उल्लेख करते हुए उनकी इस स्थापना का भी समर्थन किया है कि किस प्रकार अनुभूति शब्द समान होते हुए भी प्रसाद और अज्ञेय में उसके अर्थ भिन्न-भिन्न हैं और अर्थ की यह भिन्नता कविता के मूल धर्म तथा परिभाषा में भी भिन्नता का कारण बन गई है।

डॉ. नामवर सिंह भी नयी कविता में रूप के भाव ग्रहण की चेष्टा करते हैं।


छायावाद से भिन्न नयी कविता के अन्तर्गत जिस प्रकार रूप भाव ग्रहण करता है, तथ्य सत्य हो जाता है और अनुभूति निर्वैयक्तिक हो जाती है, विजयदेवनारायण साही ने एक मौलिक स्थापना कर उसे स्पष्ट करते हैं। उनके अनुसार "छायावादी कलाकृति मूलतः एक विस्फोट करता हुआ कला रूप है, जैसे केन्द्रीय अर्थ फूटकर चारों ओर क्रमशः विलीन होता बिखर रहा हो। तीसरे दशक की कलाकृति उसे विस्फोट की तरह नहीं, बल्कि एक लहर की तरह निर्मित करती है जिस प्रयास में महादेवी से लेकर बच्चन तक के गीत निर्मित होते हैं, नयी कविता उस तरंग के रूप को एक स्ट्रेक्चर में बदल देती है,

जैसे हीरे का क्रस्टल हो।" 'लघु मानव के बहाने हिन्दी कविता पर बहस' शीर्षक निबन्ध में प्रस्तुत साही के मंतव्य पर अपनी समर्थन सूचक टिप्पणी देते हुए डॉ. नामवर सिंह का कहना है कि 'औसत नयी कविता क्रस्टल या स्फटिक की सघन संरचना के समान है। इसका प्रमाण यह है कि आलोचना में उद्धरण की सुविधा के लिए उससे कोई एक अंश चुनना कविता के साथ अन्याय हो जाता है, और जब भी ऐसा किया जाता है तो कविता की अन्विति की कीमत पर समग्र अर्थ की कीमत पर। "


विजयदेवनारायण साही के अनुसार नयी कविता अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि निर्मिति है। हिन्दी आलोचना की दुनिया में कविता के स्वरूप को लेकर निश्चय ही यह एक नयी दृष्टि है, नयी स्थापना है, लेकिन नयी कविता के स्वरूप के विषय में साही की यह व्याख्या और कालान्तर में डॉ. नामवर सिंह द्वारा किया गया उसका समर्थन पूरी तरह शंकाओं से रहित और आलोचना से परे हो, ऐसी बात नहीं है। परम्परागत काव्यशास्त्र की भूमि पर डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी जैसे प्रबुद्ध विचारक ने उस पर प्रश्न चिह्न लगाया है।

उनका मानना है कि "यदि नयी कविता में सब कुछ संरचना ही संरचना है किसी अन्य विजातीय द्रव्य का वहाँ मिश्रण नहीं है, तब तो रस यानी अनुभूति मात्र के विपक्ष में कुछ कहने को मिलता नहीं ।" अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. त्रिपाठी इस सन्दर्भ में कुछ समाधान भी प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। वे कहते हैं कि "नये कवि आलोचक जिस अनुभूति की बनावट को हीरे की संरचना से उपमित करते हैं, उसका भी विवरण और समन्वय व्याख्या के आधार पर दें, तभी बात आगे बढ़ सकती है।" डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी का मन्तव्य विचारणीय है तथापि साही का चिन्तन अपेक्षाकृत अधिक सरल और ग्राह्य है क्योंकि उन्होंने कम-से-कम गहराई में जाकर नयी कविता बनावट और उसके स्वरूप को पूर्ववर्ती कविता से अलग करके दिखाया है;

अन्यथा कविता के स्वरूप को लेकर की गई अन्य कवि आलोचकों की व्याख्याएँ पूर्ववर्ती कविता से उसके वैशिष्ट्य को निरूपित नहीं कर पातीं। जहाँ तक कविता के स्वरूप का प्रश्न है, विजयदेवनारायण साही की मान्यताएँ किन्हीं पूर्व निर्धारित निर्णयों का विरोध करती-सी प्रतीत होती हैं। इस मायने में वे अनेक दृष्टियों को सामने रखकर ही बहस की प्रक्रिया में आगे बढ़ाने और विचार आमन्त्रित करने के पक्षपाती हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि नयी कविता और पूर्ववर्ती कविता को भिन्न करने में वे समर्थ नहीं हुए हैं। वस्तुतः साही की मान्यताएँ महत्त्वपूर्ण हैं, आवश्यकता है उनके व्यावहारिक निदर्शन की।