फ्रायडवाद और मार्क्सवाद - Freudism and Marxism
कार्ल मार्क्स के साम्यवादी दर्शन, फ्रायड के प्रकृतिवादी या अतियोनवादी दर्शन और डार्विन के विकासवादी दर्शन ने आधुनिक युग को प्रभावित कर प्राचीन न्याय संगत मान्यताओं का उन्मूलन कर दिया है। विचारकों ने डार्विन के विकासवाद का खण्डन कर दिया है, परन्तु फ्रायड के 'प्रकृतिवादी दर्शन' का संसार के आधुनिक साहित्य पर गम्भीर प्रभाव पड़ा है। फ्रायडवादियों का मत है कि वास्तविक जगत् में जो वस्तु हमें प्राप्त नहीं होती, उसकी पूर्ति स्वप्न में होती है। इसीलिए कला भी एक स्वप्न ही है। कुछ आलोचकों के अनुसार काम- भावना ही भौतिक भावना है।
मार्क्सवादी दर्शन भौतिकवादी है। इसलिए उनके अनुसार फ्रायड दर्शन कुण्ठावाद को जन्म देता है। मार्क्सवाद समाज को महत्त्व देता है। वही फ्रायड और वैयक्ति संवेदन की एकमात्र अभिव्यक्ति हैं। फ्रायडवाद कला में दमित भावनाओं का विस्फोट मात्र मान समाज पक्ष को नगण्य बना देता है जबकि मार्क्सवाद जनता, धरती और श्रम के प्रति प्रतिबद्ध है। मार्क्स दर्शन में लोक-कल्याण की भावना प्रस्फुटित होती है इसलिए यह प्रगतिवादी है। हिन्दी साहित्य में फ्रायड का यह सिद्धान्त 'कुण्ठावाद' के नाम से जाना जाता है।
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