आलोचना के प्रकार्य - functions of criticism
किसी भी रचना के गहन अर्थ को जानने और उसे सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए उसकी आलोचना की आवश्यकता होती है। आलोचना कृति के सम्यक् मूल्यांकन के आधार पर उसके अन्तर्निहित अर्थ को प्रकट करते हुए उस कृति का महत्त्व प्रतिपादित करती है। इस प्रक्रिया में आलोचना रचना विशेष का विभिन्न प्रकार से विवेचन-विश्लेषण करते हुए रचना और पाठक को एक-दूसरे से जोड़ने का कार्य करती है। वह पाठक के लिए रचना के सौन्दर्य का उद्घाटन करते हुए उसके सामाजिक मूल्य का निर्देश भी करती है। आलोचना पाठक की दृष्टि से ओझल गुण-दोषों को दर्शाते हुए उसकी समझ का विस्तार करती है। वह साहित्य के सन्दर्भों को रेखांकित करते हुए पाठक की रुचि का परिष्कार भी करती है।
आलोचना का मुख्य कार्य साहित्य का विश्लेषण और मूल्यांकन करना है। जहाँ एक ओर यह साहित्य- सृजन की सहयोगी क्रिया है वहीं दूसरी ओर यह एक स्वतन्त्र अनुशासन भी है। आलोचना साहित्य के सम्बन्ध में नये ढंग से सोचने का मार्ग दिखाती है। यह हमें विभिन्न साहित्यिक रचनाओं की बारीकियों और ताने-बाने समझने तथा उनके विश्लेषण के तरीक़ों को पहचानने और समझने में हमारी सहायता करती है। आलोचना साहित्य के उच्चतर मान-मूल्यों तथा आदर्शों के प्रति हमारा ध्यान दिलाती है। यह हमें अपनी साहित्यिक परम्परा से जोड़ती है और हमारे समकालीन साहित्य से हमें रू-ब-रू करवाती है। आलोचना लेखकों को उन तत्त्वों और कारकों को समझने में मदद करती है जो साहित्यिक कृतियों के स्तर और गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इस तरह वह लेखकों को श्रेष्ठ रचनाएँ लिखने के लिए प्रेरित करती है।
आलोच्य कृति के अपने विश्लेषण में आलोचक रचना के कथ्य और शिल्प का उद्घाटन करते हुए यह दर्शाता है कि लेखक का मन्तव्य क्या है और वह उसे कितनी सफलता से अभिव्यक्त कर पाया है। वह रचना में प्रस्तुत विषयवस्तु तथा रचना-सौन्दर्य के सामाजिक महत्त्व का मूल्यांकन करता है। एक आलोचक साहित्यिक रचना के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण करते हुए उसे पाठक के लिए सुबोध और ग्राह्य बनाता है। वह विषयवस्तु, भाव और कला की दृष्टि से रचना के महत्त्व का निदर्शन करता है। वह बताता है कि रचना का सामाजिक और साहित्यिक मूल्य क्या है तथा जीवन और समय के अनुसार उसकी सार्थकता क्या है।
मूल्यांकनकी इस प्रक्रिया में आलोचक लेखक की अनुभूति को व्यापक जीवनानुभूति के समक्ष रखकर देखता है और सामाजिक विकास और युग की जटिलताओं और आवश्यकताओं के सन्दर्भ में उसका मूल्य और महत्त्व बताता है। आलोचना सामाजिक सरोकारों के आलोक में कृति में अन्तर्निहित संकेतों को अर्थवत्ता प्रदान करती है। आलोचना की सार्थकता अपने समय और परिवेश के सन्दर्भ में ही सिद्ध होती है। इसी से रचना की मूल्यवत्ता प्रमाणित होती है। अतः आलोचना नवीन जीवन-दृष्टि और बदलते सामाजिक सन्दर्भों में परीक्षण और पुनर्परीक्षण की सतत प्रक्रिया है।
आलोचना कवि या लेखक और पाठक के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है।
आलोचना का मुख्य कार्य यह है कि वह किसी साहित्यिक रचना की अच्छी तरह परीक्षा करके उसके रूप, गुण और अर्थ का निर्धारण करे। डॉ० नगेन्द्र ने लिखा है कि "किसी कृति की विशेषताओं पर विचार करना, उसकी उपलब्धियों एवं अभावों का मूल्यांकन करना, सहृदयों के हृदय पर उसकी प्रतिक्रिया का विश्लेषण करना, उसकी श्रेष्ठता अथवा अभावों के विषय में निर्णय देना, उसे श्रेणीबद्ध करना आदि अनेक कार्य आलोचना के अन्तर्गत आते हैं।" डॉ. श्यामसुन्दरदास के शब्दों में "साहित्यिक क्षेत्र में ग्रन्थ को पढ़कर उसके गुण-दोष का विवेचन करना और उसके सम्बन्ध में अपना मत प्रकट करना आलोचना कहलाता है।
यदि हम साहित्य को जीवन की व्याख्या मानें तो आलोचना को उस व्याख्या की व्याख्या मानना पड़ेगा।" अर्थात् आलोचना का कार्य साहित्यिक रचना की व्याख्या के माध्यम से जीवन की व्याख्या करना है 1
अंग्रेज़ी आलोचक मैथ्यू अर्नाल्ड ने कविता को जीवन की आलोचना मानते हुए आलोचना को काव्य से अधिक महत्त्वपूर्ण माना है। उसके अनुसार आलोचना ही महान विचारों के सम्प्रेषण द्वारा उत्कृष्ट साहित्य के सृजन को प्रेरित करती है । अर्नाल्ड ने आलोचना के तीन मुख्य कार्य बताए हैं जीवन और काव्य की महान् -
उपलब्धियों को समझना, इन उपलब्धियों के विचारों को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करना और जीवन में उत्कृष्ट विचारों का संचार करते हुए ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिसमें महान् साहित्य का सृजन हो सके। आलोचना काव्य की सीमाओं से परे जा कर सांस्कृतिक नव-निर्माण का मार्ग प्रशस्त करे। टी. एस. एलियट के शब्दों में "आलोचना मूल संवेदना का विस्तार है, निकृष्ट आलोचना मात्र भावाभिव्यक्ति ।" एलियट के अनुसार आलोचना का कार्य "साहित्य की समझ और आस्वाद चेतना में अभिवृद्धि करना है।"
आलोचना का एक प्रकार्य यह भी है कि वह लोगों की संवेदनशीलता में आने वाले उन परिवर्तनों को अभिव्यक्ति प्रदान करे जिनसे रचनाओं के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता अनुभव की जाती है। यह बात नयी नहीं है कि अनेक रचनाएँ आरम्भ में नकार दिए जाने के बावजूद बाद में बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हो जाती हैं। कामायनी की आरम्भिक समीक्षाएँ उसके महाकाव्य होने की कोई सूचना नहीं देती हैं। आज कामायनी का महाकाव्यत्व स्थापित हो चुका है।
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