प्रगतिवाद का मूलभाव - fundamentals of progressivism
प्रगतिवाद बनाम प्रगतिशीलता
'प्रगति' का साधारण अर्थ आगे बढ़ना या उन्नति करना है। परन्तु आज साहित्य में 'प्रगतिवाद' शब्द से केवल प्रगति का ही अर्थ न लेकर एक विशिष्ट राजनैतिक विचारधारा से प्रभावित साहित्य से लिया जाता है, जिसका मूलाधार मार्क्सवादी दृष्टिकोण है। पन्तजी के शब्दों में "छायावाद अब शून्य सूक्ष्म आकाश में अति काल्पनिक उड़ानें भरने वाली अथवा रहस्य के निर्जन अदृश्य शिखर पर विराम करने वाली कल्पना मात्र रह गया, तो उसके प्रतिक्रियास्वरूप जीवन और जगत् का सच्चा चित्र अंकित करने के लिए प्रगतिवाद का जन्म हुआ। "11
डॉ. भोलानाथ तिवारी ने अपने निबन्ध 'हिन्दी कविता में प्रगतिवाद' में 'प्रगतिवाद' के अर्थ के अभिप्राय को रेखांकित करते हुए कहा है कि 'प्रगति' का सामान्य अर्थ है किसी विशेष दिशा में विशेष ढंग से आगे बढ़ना किन्तु 'प्रगतिवाद' शब्द के अन्तर्गत प्रगति का एक विशेष अर्थ है और वह है, 'द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद' । 12
द्वन्द्ववाद में विश्वास रखने वाले भूतवादी के अनुसार विश्व का निर्माण लगभग सौ भौतिक तत्त्वों से हुआ हैं। मानव मस्तिष्क और चेतना भी, जिसे अध्यात्मवाद प्रकारान्तर से आत्मा कहता है, शरीर तथा अन्य भौतिक चीजों की तरह इन भूतों से ही निर्मित है।
आत्मा का इसके अतिरिक्त कोई मस्तिष्क नहीं है किन्तु उसे जड़वादी सिद्धान्त से अलग मानना चाहिए। भौतिकवाद में भूत या पदार्थ जड़ नहीं है। उनमें दो परस्पर विरोधी-तत्त्व हैं और इनका द्वन्द्व होता रहता है। यही स्थिति समाज में है। इन तत्त्वों में एक तो हासोन्मुख होता है और दूसरा विकासोन्मुख । दोनों के परस्पर संघर्ष का नाम गति है। अतः द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का दर्शन है जो जीवन को एक ऐसी प्रगतिशील भौतिक वास्तविकता मानता है जिसके मूल में परस्पर दो विरोधी शक्तियों का संघर्ष चल रहा है। इस दर्शन में विश्वास रखने वाला इन शक्तियों का हासोन्मुख या विकासोन्मुख की गति देखकर ह्रासोन्मुख को हास के पथ पर और विकासोन्मुख को विकास के पथ पर तेजी से अग्रसर होने में सहायता देता है।
इसी कलागत या साहित्यक अभिव्यक्ति का नाम है 'प्रगतिवाद । इस प्रकार दर्शन के क्षेत्र में जो मार्क्सवाद या द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है, साहित्य के क्षेत्र में वह प्रगतिवाद है।
हिन्दी में विद्वानों का एक वर्ग प्रगतिवादी साहित्य और प्रगतिशील साहित्य में अन्तर मानता है। यथार्थतः प्रगतिवाद का सम्बन्ध मार्क्सवाद से है, किन्तु मार्क्सवाद के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद या भौतिकवाद में विश्वास न रखता हुआ व्यक्ति भी प्रगति के पथ का पथिक हो सकता है। भक्तिकाल के सन्त कवि कबीर अपने युग के प्रतिनिधि कलाकार थे। उनका कलाकार युग की पुकार है। कबीर ने किसी वाद के घेरे में रहकर काव्य-रचना नहीं की है।
फिर भी वे प्रगति के विरोधी रचनाकार नहीं माने जा सकते। इसके बावजूद आधुनिकता के सन्दर्भ में उन्हें प्रगतिवादी नहीं माना जा सकता। क्योंकि, वे भूतवादी न होकर अध्यात्मवादी थे। साहित्य के अध्ययन विश्लेषण की पृष्ठभूमि में प्रगतिशील और प्रगतिवादी दो शब्दों को मान लेना अनुचित नहीं कहा जा सकता।
प्रगतिवाद युग की पुकार है। युग बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, पुरानी मान्यताएँ बदलती हैं, साहित्य के आवेष्ठन के रूप-रंग बदलते हैं। साहित्यकार समाज को नवीन सन्देश देता है।
वह समाज और इतिहास की लीक पर नहीं चलता। जो विचारधाराएँ देश और समाज की प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध करती हैं, रचनाकार वैसे विचारों और मान्यताओं को मानने से स्पष्ट इनकार कर देता है। वस्तुतः रचनाकार अतीत की गलत मान्यताओं का विरोध करता है। वह व्यष्टि से समष्टि की ओर अग्रसर होता है। क्योंकि साहित्यकार अपने समय का स्रष्टा और द्रष्टा होता है। युग और समाज के अद्वितीय मार्गदर्शन के लिए कलाकार नये काव्य रूपों की उद्भावना करता है। इन्हीं सुनहरे आदर्शों और स्वप्नों से चालित साहित्य का नाम 'प्रगतिशील साहित्य' है । इसी की एक निश्चित विचारधारा पर आश्रित साहित्य का नाम है, 'प्रगतिवादी साहित्य' ।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जब रचनाकार मार्क्सवादी विचारधारा पर आधारित कविताएँ लिखते हैं उस काव्य को 'प्रगतिवादी काव्य' कहा जाता है। जब रचनाकार किसी विचारक, चिन्तक या दार्शनिक मान्यताओं के तहत प्रतिबद्ध होकर साहित्य-सृजन करता है तो वह प्रतिबद्ध साहित्यकार माना जाता है। स्पष्ट है, मार्क्सवादी-लेनिनवादी को साहित्यिक रूप देने वाले कलाकार को प्रगतिवादी साहित्यकार माना जाता है। इसके विपरीत प्रगतिशील साहित्यकार अपनी मौलिक मान्यताओं के तहत रचना करता है। वह किसी वाद के प्रति प्रतिबद्ध नहीं रहता।
वह निर्भीक और स्वतन्त्रतापूर्वक सामाजिक वैषम्य की कटु आलोचना करता है। देश और समाज के स्तर पर जो भी विसंगतियाँ होती हैं ऐसा साहित्यकार उनका विरोध करता है। यानी प्रगतिशील साहित्यकार खुशहाल समाज के निर्माण के लिए किसी वाद का सहारा नहीं लेता वरन् वह वर्तमान की कुरूपता पर व्यंग्य करता है और वह समाज को नवीन सन्देश देता है। प्रगतिशील साहित्यकार की रचनाएँ अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों का संगम-स्थल होता है। वह अतीत का मंथन इसलिए करता है ताकि भविष्य के लिए निर्देश मिले।
राजनैतिक सन्दर्भ
(i) विचारधारा का सन्दर्भ : राजनैतिक सन्दर्भ में सबसे प्रमुख स्थान विचारधारा का है। आज किसी भी देश की राजनीति एक न एक विचारधारा को मानकर चलती है वा चलाई जाती है। कहीं विचारधारा का आधिपत्य दीखता है तो कहीं उसका स्पष्ट ध्रुवीकरण सामने आता है और कहीं-कहीं बीच की स्थिति भी प्राप्त होती है। यह सन्दर्भ सीधे ही व्यवस्था और समाज को प्रभावित करता है। प्रजातान्त्रिक देशों में चुनाव तक इस विचारधारा से प्रभावित होते हैं।
(ii) नेतृत्व का सन्दर्भ देश के समाज का नैतिक उत्थान या नैतिक पतन नेतृत्व पर निर्भर करता है।
सही नेतृत्व समाज को खुशहाली का सन्दर्भ देता है और गलत नेतृत्व समाज को भटकाता है, भ्रष्टाचार फैलाता है। साथ ही, अनेकानेक प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न करता है। आदर्श और यथार्थ के अलग-अलग कोणों के दर्शन यहाँ सहज सम्भव दीखते हैं। अतः राजनैतिक सन्दर्भों के घटकों में इस सन्दर्भ का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
(iii) प्रशासन का सन्दर्भ : प्रशासन समाज को चलाता है। समाज प्रशासन पर निर्भर है।
जैसी सत्ता होती है, प्रशासन तदनुकूल होता है। प्रशासन आम जनता को सुख-सुविधा देता है। उनकी मुश्किलों को आसान करता है। जनजीवन में विधि-व्यवस्था ठीक रखना, लोगों में न्याय दिलाना उसी का धर्म है। प्रशासन से जुड़ी अनेक प्रकार की समस्याएँ उस घटक की रचना करती है। एक व्यापक सामाजिक सन्दर्भ इस सीमा में घिर आता है।
(iv) धार्मिक सन्दर्भ : धार्मिक सन्दर्भ के अन्तर्गत दो कोटि के लोग हैं। एक वर्ग धर्म और ईश्वर में विश्वास रखता है जबकि दूसरा वर्ग उसका विरोध करता है। प्रगतिवादी कवियों के काव्य में धार्मिक सन्दर्भ किस दृष्टि से निरूपित किया गया है, उसका मूल्यांकन और रेखांकन साहित्य के अध्ययन-विश्लेषण की पृष्ठभूमि में समीचीन प्रतीत होता है।
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