श्मशानी कविता - funeral poem
श्मशानी कविता काव्यान्दोलन के प्रवक्ता निर्भय मलिक थे। उनकी पत्रिका 'श्मशानी पीढ़ी' के द्वारा उन्होंने यह काव्यान्दोलन चलाया। छह अंक प्रकाशित होने के पश्चात् 'श्मशानी पीढ़ी' पत्रिका का नाम बदलकर 'विभक्ति' कर दिया गया। इस छठे अंक का समर्पण वाक्य श्मशानी कविता का स्वभाव स्पष्ट करता है- "जैनेन्द्र की सुनिता को जो अपने पति के दोस्त के लिए खुशी से नंगी हो जाती है। "25
अस्वीकार, आक्रोश, क्रोध, यौन असंगतियों के खुले वक्तव्य, सपाटबयानी और संस्कारों का घोर निषेध श्मशानी कविता की प्रधान विशेषताएँ कही जा सकती हैं।
इसके प्रवक्ता निर्भय मलिक का निम्नलिखित वक्तव्य श्मशानी कविता का रूपाकार स्पष्ट करता है "किसी तथाकथित राजनैतिक तुर्क के मुँह से प्रगतिवाद का नाम सुन हिन्दुस्तान की मूर्ख जनता खुश हो सकती हैं, फिराक की शायरी सुनने के लिए लिजलिजे गदहों की भीड़ इकट्ठी हो सकती है और लाख-दो लाख का पुरस्कार भी दिया जा सकता है, किसी बाजारू औरत की सुख- सुविधा के लिए किसी धनी आदमी की तिजोरी खाली हो सकती है और सेठों के लौंडे ज्यादा से ज्यादा संख्या में उसके इर्द-गिर्द चक्कर भी काट सकते हैं, किन्तु किसी श्मशानी लेखक की रचना पढ़कर भीड़ इकट्ठी होगी, ऐसा मुझे कतई विश्वास नहीं होता।
"26 निर्भय मलिक स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि 'संस्कारी गदहों' के बीच उनकी कविता के पाठक बहुत कम हैं। उनके मतानुसार युवा पीढ़ी में संस्कारी गदहों की संख्या अधिक है। अतः प्रत्येक पुराने और कुछेक नयों को वे बुर्जुआ मानते हैं। श्मशानी कविता के साथ सव्यसाची, विष्णुचन्द्र शर्मा, विश्वम्भरनाथ उपाध्याय जैसे सशक्त नाम भी जुड़े हैं जो सोयी हुई संवेदनाहीन व्यवस्था को जगाने के लिए पूरे सपाटपन के साथ ऐसी शब्दावली विशेषतः यौन शब्दावली का प्रयोग करते हैं कि जाग्रति की बजाय वितृष्णा का भाव अधिक जगता है। उनके मतानुसार वे सजगता के साथ मानव अस्तित्व की चिन्ता का वहन करते हुए अपने परिवेश का साहित्य रचते हैं।
वे अपनी तुलना श्मशानी विचारक अल्वेअर कामू से करते हैं। श्मशानी पीढ़ी के कवि सकलदीप सिंह इस कविता के धर्म को लेकर कहते हैं "समकालीन लेखन के उस हिस्से को भी यह पीढ़ी नंगा करने पर अड़ी है जो सेठों की रंगीन पत्रिकाओं में पूँजीवादी लेखन परम्परा को जीवित रखे रहने की साजिश कर रहा है और सामाजिक स्वस्थता के नाम पर आर्य समाजी लहजे में अपनी अश्लील, लिजलिजी रोमांटिक संवेदना को प्रगतिशीलता या वाममार्गी रंग चढ़ाकर आज के करप्शन को आगे बढ़ा रहा है। 27
श्मशानी कविता बोध, संवेदना और मानसिकता की एकरूपता के बिना लेखन को असम्भव मानती है और इस एकरूपता का अस्तित्व केवल श्मशानी कविता में स्वीकारती है।
लेखकीय विद्रोह और समसामयिक परिवेश के प्रश्नों के प्रति ईमानदारी इस एकरूपता के लिए आधारभूमि का निर्माण करते हैं। श्मशानी कविता के कविगण मूल्य परम्परा आदि के प्रति अपना दृष्टिकोण इस प्रकार स्पष्ट करते हैं "मनुष्य, सभ्यता, संस्कृति, क्षमा, दया, ममता, प्रेम, आदर्श, मूल्य और इतिहास आदि शब्द परम्पराविहीन हैं। इन शब्दों की परम्परा से देखने पर एक सपाट चेहरा उसे दिखता है। वह चेहरा मुखौटा वाला है।" इन्हीं मुखौटों, परम्परा आदि का निषेध अत्यन्त अश्लील शब्दावली के साथ करना मानों इनका एकमात्र कविधर्म रहा। एक अतिप्रसिद्ध उदाहरण द्रष्टव्य है-
सुनो दोस्तों
मरने के बाद
मेरी लाश पर वीर्यपात कर मूत देना
और किसी रजस्वला औरत
के कपड़े में लपेट कर कहाँ मिलेगी इतनी बड़ी मुर्दों की भीड़
पार्लियामेंट के घर में फेंक देना
और इतनी बड़ी कब्रगाह हिन्दुस्तान में । 29
निःसन्देह यह भाषा अश्लीलता की हर सीमा का उल्लंघन करती है पर श्मशानी कवि मानता है कि जब सभ्य और श्लील शब्दावली के प्रयोग से बात नहीं बनती तब ऐसी ही शब्दावली का प्रयोग करना पड़ता है। मार्क्सवाद द्वारा अपनायी गई शैली में श्मशानी कवि पूँजीवाद का विरोध नहीं करता। पूँजीवाद का विरोध करने की उसकी अपनी शैली है। उनकी भाषा-शैली और प्रतीकों में यौन शब्दों की भरमार है। इन कवियों ने सेक्स के माध्यम से क्रान्ति करने का निश्चय किया था किन्तु वास्तव में इनमें सेक्स को वरीयता और क्रान्ति को निम्नता दी हुई दिखाई देती है। श्मशानी कवि जिस सामाजिक बदलाव के आकांक्षी थे उस सामाजिक बदलाव का कोई ठोस चित्र इनके पास नहीं था।
शायद इसीलिए श्रीमती विजय चौहान श्मशानी पीढ़ी से इस बात की गारंटी माँगती हैं। कि "पानी के साथ बच्चे को भी टब से बाहर नहीं फेंका जाएगा। यह गारंटी ज़रूरी है क्योंकि कई फुलवारियाँ उजड़ चुकी हैं। "30
काम और कामुकता के माध्यम से समाज में क्रान्ति लाने का स्वप्न देखते श्मशानी कवि आचार्य रजनीश जैसे चिन्तकों में अपना भविष्य तलाशते हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि अश्लीलता, कामुकता ने ही श्मशानी पीढ़ी की रचनात्मकता को ध्वस्त कर श्मशानी कविता को भी पूर्णविराम लगा दिया।
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