महादेवी वर्मा का गीति-सौष्ठव - Geeti-Saushthav of Mahadevi Verma
है। भारत में गीति काव्य की परम्परा उतनी ही प्राचीन मानी गई है जितना कि वेद, क्योंकि वेदों में भी भावमय संगीत सहज ही दृष्टिगोचर होता है। विभिन्न विद्वानों ने गीतिकाव्य को इस प्रकार परिभाषित किया है-
" गीतिकाव्य में विशुद्ध कलात्मक धरातल पर कवि के अन्तर्मुखी जीवन का उद्घाटन प्रमुख रूप से होता
है और उसमें उसके हर्ष उल्लास, सुख-दुःख एवं विषाद को वाणी प्रदान की जाती है। "
- विश्वकोश
" गीतिकाव्य के छोटे-छोटे गेय पदों में मधुर भावनापन्न स्वाभाविक आत्मनिवेदन रहता है। इन पदों में शब्द की साधना के साथ-साथ संगीत के स्वरों की भी उत्कृष्ट साधना रहती है। इनकी भावना प्रायः कोमल होती है और एक-एक पद में पूर्ण हो कर समाप्त हो जाती है। "
- डॉ. श्यामसुन्दरदास
" जिस काव्य में एक तथ्य या एक भाव के साथ-साथ एक ही निवेदन, एक ही रस, एक ही परिपाटी हो - वह गीतिकाव्य है।"
- डॉ० दशरथ ओझा
" गीतिकाव्य में निजीपन के साथ रागात्मकता रहती है और यह रागात्मकता भाव की एकता और संक्षिप्तता के साथ संगीत की मधुर लय में व्यक्त होती है इसीलिए संगीत यदि गीतिकाव्य का शरीर है तो भावातिरेक उसकी आत्मा है।"
• आचार्य गुलाब राय
वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान, उमड़ कर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान ।
- कविवर पन्त
"सुख-दुःख की भावावेशमयी अवस्था विशेष का गिने-चुने शब्दों में स्वर-साधना के उपयुक्त चित्रण कर देना ही गीत है । साधारणतः गीत व्यक्तिगत सीमा में तीव्र और सुख-दुःखात्मक अनुभूति का शब्द रूप है जो अपनी ध्वन्यात्मकता में गेय हो सके।"
- महादेवी वर्मा
समग्रतः कहा जा सकता है कि गीतिकाव्य वह विशिष्ट काव्यधारा है जिसके अन्तर्गत संगीतात्मकता, सरस और रोचक पदावली, रागात्मकता, संक्षिप्तता, भावों की एकता, मधुरता और भावातिरेकता की प्रधानता होती है।
प्रस्तुत विवेचन के आधार पर गीतिकाव्य के निम्नलिखित तत्त्व निरूपित किए जा सकते हैं-
(i) आत्माभिव्यंजकता, (ii) रागात्मकता, (iii) काल्पनिकता, (iv) संगीतात्मकता, (v) भावगत एकरूपता, (vi) आकारगत लघुता, (vii) शैलीगत सुकुमारता । महादेवी की कविता में गीतिकाव्य की उपर्युक्त समस्त विशेषताएँ उपलब्ध होती हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है-
आत्माभिव्यंजकता
आत्माभिव्यंजकता से तात्पर्य है व्यक्तिगत सुख-दुःखात्मक अनुभूति की अभिव्यंजना ।
महादेवी के - गीतों में उनकी आन्तरिक भावनाएँ अभिव्यक्त हुई हैं। उन्होंने स्वयं 'यामा' में लिखा है- "मेरे गीत मेरे आत्मनिवेदन भाव हैं - इन्हें में व्यंकिंचन भेंट के अतिरिक्त कुछ नहीं मानती।" उन्होंने अनेक गीतों में अपने जीवन की करुण कथा कही है, हृदय की वेदना का सरल सम्प्रेषण प्रस्तुत पंक्तियों मेंद्रष्टव्य है-
अब न लौटाने कहो, अभिशाप की वह पीर, बन चुकी स्पन्दन हृदय में, वह नयन में नीर।
महादेवी ने अपने हृदय की संचित अनुभूतियों को गीतों के रूप में अभिव्यक्त किया है।
उनके गीतों मे व्यक्तिगत सुख-दुःख के साथ-साथ विश्व की करुण दशा का भी चित्रण हुआ है-
विरह का जलजात जीवन, विरह का जलजात । वेदना में मिला जन्म, करुणा में मिला आवास । अश्रु चुनता दिवस इनका, अश्रु गिनती रात । जीवन विरह का जलजात ।
रागात्मकता
रागात्मकता गीतिकाव्य की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। रागात्मकता का तात्पर्य है भाव और रस - का समावेश। इसी के प्रभावस्वरूप गीत में प्रेषणीयता आती है और वह श्रोता या पाठक के हृदय को सहज ही प्रभावित कर पाता है।
महादेवी के गीतों में विद्यमान रागात्मकता के कारण श्रोता भाव-सरिता में गोते लगाने लगता है। उनके आरम्भिक गीतों में यह तत्त्व अपेक्षाकृत अधिक मिलता है। काव्य-संग्रह 'नीहार' में संकलित 'मिलन' का उदाहरण द्रष्टव्य है। -
कैसे कहती हो सपना है,
भरे हुए अब तक फूलों में,
अलि ! उस मूक मिलन की बात । मेरे आँसू उनके हास ।
काल्पनिकता
काल्पनिकता का तात्पर्य है कल्पना द्वारा रमणीय अर्थ की सृष्टि करना। महादेवीजी के गीतों में कल्पना - चित्रों की भरमार है। यद्यपि उन्होंने अपने गीतों में अनुभूतिपरक मार्मिक चित्र अंकित किए हैं तथापि कल्पना की तूलिका से उनमें विविध रंगों का समावेश कर दिया गया है। परिणामस्वरूप यह अनुभूतिपरक मार्मिक चित्र अपनी सजीवता, सरसता और सुकुमारता के कारण काल्पनिक होकर भी वास्तविक जान पड़ते हैं। उदाहरण के लिए आत्मा-परमात्मा की एकता का यह चित्र द्रष्टव्य है-
बीन हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ । नयन में जिसके जलद वह तृषित चातक हूँ, शलभ जिसके प्राण में वह निठुर दीपक हूँ,
फूल को उर में छिपाए विकल बुलबुल हूँ, एक होकर दूर तन से छाँव वह चल हूँ, दूर तुम से हूँ अखण्ड सुहागिनी भी हूँ।
संगीतात्मकता
संगीत गीति काव्य का मूल आधार है। कवि अपने गीतों को गेय बनाने के लिए प्रायः दो साधनों का आश्रय लेता है - स्वर का संगीत तथा शब्द-योजना का संगीत। महादेवी ने अपने गीतों को गेय बनाने के लिए इन दोनों तत्त्वों का आश्रय लिया है। उनका वर्ण विन्यास बड़ा ही लयात्मक और भावानुरूप है। उनका गीति-काव्य संगीत का अक्षय भण्डार है जिसमें संगीत की सुमधुर सरिता प्रवाहित होती रहती है।
स्वयं महादेवी के शब्दों में- "मेरे गीत अध्यात्म के अमूर्त आकाश के नीचे लोकगीतों की धरती पर पले हैं।" स्पष्ट है कि उनके गीतों का आधार आध्यात्मिक है और उनके गीतों पर लोकगीतों का प्रभाव है। लोकगीतों की सरल, सहज लय के कारण उनका गीतिकाव्य और भी अधिक मधुर और प्रभावशाली बन गया है।
लाए कौन सन्देश नये घन । अम्बर गर्वित, हो आया नत, चिर निस्पन्द हृदय में उसके, उमड़े री पुलकों के सावन । लाए कौन सन्देश नये घन ।
भावगत एकरूपता
गीतिकाव्य में भाव की तीव्रता को बनाए रखने के लिए भाव की एकता अनिवार्य होती है। साहित्य की विविध विधाओं में विविध भावों का संयोजन होता है किन्तु गीतिकाव्य में एक ही भाव निरन्तर चलता है और वह भाव उस गीत की सीमा में अखण्ड रूप से विद्यमान रहता है। उदाहरण द्रष्टव्य है-
मैं नीर भरी दुःख की बदली परिचय इतना इतिहास यही उमड़ी कल थी मिट आज चली।
संक्षिप्तता
महाकाव्य और खण्डकाव्य दीर्घाकार होते हैं जबकि गीतिकाव्य में लघु आकार के अन्तर्गत मार्मिक भावों की अभिव्यंजना की जाती है। महादेवी वर्मा ने अपने गीतों में कम शब्दों में अधिक कहने की कहावत को सिद्ध किया है। प्रकृति के उपमानों को ग्रहण करते हुए वे अपने भावों को अत्यन्त संक्षिप्त शैली में प्रस्तुत करते। हुए कहती हैं-
सब आँखों के आँसू उजले, सबके सपनों में सत्य पला, जिसने उसको ज्वाला सौंपी, उसने इसमें मकरन्द भरा, आलोक लुटाता वह घुल घुल देता झर यह सौरभ बिखरा, दोनों संगी पथ एक किन्तु, कब दीप खिला कब फूल जला ।
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