ग़ज़ल : तात्पर्य एवं स्वरूप - Ghazal: Meaning and Form

ग़ज़ल कुछ विशेषताएँ अपनी संरचना में तो कुछ विशेषताएँ अपने अन्तरंग में छुपाये हुए होती है। इन विशेषताओं के कारण भी ग़ज़ल विधा अन्यान्य विधाओं से विशिष्ट बनती है। लय, ताल, तुकान्तता, गीत न होते हुए भी भीतर सँजोयी हुई गीतात्मकता अर्थात् काफ़िया, रदीफ़, बहर आदि बातें ग़ज़ल का मिज़ाज बनाती हैं, साथ ही ग़ज़ल में निहित प्रेमाभिव्यक्ति से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक आदि संवेदनाएँ भी गजल के स्वरूप को गठित करती हैं।


ग़ज़ल के स्वरूप को गठित करने वाला संरचनात्मक पक्ष उसकी बनावट बुनावट से उभरता है। ग़ज़ल, जैसा कि इससे पूर्व भी कहा गया है, शेरों से बनने वाली असम्बद्ध रचना है।

इसका प्रत्येक शेर स्वतन्त्र अर्थ प्रदान करने की ताकत रखता है। प्रत्येक ग़ज़ल में कम से कम पाँच शेर होने चाहिए। ग़ज़ल में शेरों की संख्या विषम अर्थात् दो से न कटने वाली हो। यथा पाँच, सात, नौ, ग्यारह आदि। ग़ज़लों में अधिकतम शेर कितने हों, इस - विषय में कोई निर्धारित मत नहीं है। वैसे तो शेरों की संख्या, उनका विषम संख्या में होना आदि पारम्परिक बातों का भी आधुनिक ग़ज़लकारों द्वारा न केवल उल्लंघन बल्कि विरोध भी हो रहा है।


ग़ज़ल की प्रत्येक पंक्ति 'मिसरा' कहलाती है। दो मिसरे मिलाकर एक शेर बनता है। प्रत्येक मिसरा अपने आप में सम्पूर्ण भावाभिव्यक्ति करने में सक्षम होता है। ग़ज़ल में शेर का एक निश्चित बहर अर्थात् छन्द के साथ चलना ग़ज़ल की खूबसूरती की दृष्टि से आवश्यक माना जाता है अपनी तमाम संकेतप्रधानता के बावजूद शेर अबोधगम्य न हो।

शेर की सम्प्रेषणीयता में उसकी संकेतात्मकता बाधक न बने। शेर केवल खूबसूरत शब्दों का गुच्छा मात्र न हो बल्कि अपनी तासीर, अपने प्रभाव में अत्यधिक सार्थक हो।


ग़जल का पहला शेर अपनी दोनों पंक्तियों में काफ़िया और रदीफ़ को समेटे हुए होता है। ग़ज़ल के पहले शेर को 'मतलअ' कहा जाता है। 'मतलअ' का शाब्दिक अर्थ 'उदय' है। ग़ज़ल के अन्तिम शेर को 'मकतअ' कहा जाता है। इसी में ग़ज़लकार अपने नाम या उपनाम का प्रयोग करता है। गोपालदास नीरज 'मतलअ' को 'आरम्भिका' और 'मकतअ' को 'अन्तिका' कहते हैं। मतलअ और मकतअ के बीच के शेर ग़ज़ल का मध्यभाग कहलाते हैं।


ग़ज़ल के पहले शेर अर्थात् 'मतलअ' की दोनों पंक्तियों के अन्त में आने वाले शब्द या शब्द-समूह को 'रदीफ़' अर्थात् समान्त कहा जाता है। मतलअ के बाद के प्रत्येक शेर में दूसरी पंक्ति में रदीफ़ का प्रयोग होता है। मतलअ की दोनों मिसरों में आने वाले रदीफ़ के पहले का शब्द या स्वर 'काफ़िया' अर्थात् 'तुकान्त' कहलाता है । मतलअ के बाद प्रत्येक शेर के दूसरे मिसरे में अर्थात् पंक्ति में काफ़िया प्रयुक्त किया जाताहै। ग़ज़ल में रदीफ़ और काफिये का यथोचित निर्वाह होना चाहिए। किन्तु आधुनिक ग़ज़लकार ग़ज़ल में रदीफ़ और काफ़िये के निर्वाह का शत प्रतिशत पालन नहीं करते हैं। ग़ज़ल के मिज़ाज के साथ ऐसी छेड़खानी निरन्तर जारी है।

इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि ग़ज़ल मूलतः अरबी-फारसी से उर्दू में आयी एक काव्य विधा है जिसे हिन्दी सारस्वतों ने हृदय से स्वीकारा है। ग़ज़ल की लोकप्रियता का एक महत्त्वपूर्ण कारण उसका मिज़ाज है। इसी मिज़ाज का विशुद्ध हिन्दीकरण करने का प्रयास ग़ज़ल के सौन्दर्य के लिए बाधक सिद्ध होगा।


'मतलअ' को 'आरम्भिका', 'मकतअ' को 'अन्तिका', 'मिसरा' को 'पंक्ति', 'रदीफ़' को 'समान्त', 'क्राफ़िये' को 'तुकान्त', 'बहर' को 'छन्द', 'शेर' को 'द्वैतिका' या 'द्विपदिका',

'ग़ज़ल' को 'गीतिका' कहना ग़लत तो नहीं किन्तु इससे 'ग़ज़ल' के उर्दू लहजे में निहित असीम सौन्दर्य और आपाततः समग्र ग़ज़ल की प्रभावपूर्णता पर अत्यधिक विपरीत परिणाम होता है। अतः ग़ज़ल के संरचनागत मिज़ाज को आघात पहुँचाने से बचना अधिक श्रेयस्कर है।


उर्दू में 'ग़ज़ल' का अर्थ 'प्रेमिका और प्रेमी के बीच की गुफ्तगू' बताया जाता है। 'शेर' भी अरबी शब्द है। जिसका अर्थ 'जनाना, जुल्फ या बाल' है। इन शब्द अर्थों से उर्दू ग़ज़ल का मिज़ाज स्पष्ट होता है कि ग़ज़ल प्रेमाभिव्यक्ति, सौन्दर्य, प्रेम से उपजी कसक, दुःख दर्द को बयान करती है।

उर्दू ग़ज़ल के इस मिज़ाज के साथ भी हिन्दी ग़ज़लकारों ने छेड़खानी की और कुछ अत्यन्त सुखद परिणाम सामने आए। ग़ज़ल की संवेदनाएँ जहाँ प्रेम, विरह, सौन्दर्य और समर्पण तक सीमित थीं वहीं हिन्दी ग़ज़लकारों ने उसमें सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि संवेदनाओं को व्यक्त करना आरम्भ किया। इससे ग़ज़ल का दायरा बढ़ा और हिन्दी ग़ज़ल उर्दू ग़ज़ल की सीमाओं को उल्लांघकर परिवार से समाज तक उनकी समस्याओं से समाधानों तक बेबाक टिप्पणी करने लगी।


गजलकार भी आपाततः एक सामाजिक इकाई होता है। अतः हिन्दी में सामाजिक चिन्तन से युक्त ग़ज़लें बेझिझक लिखी जाने लगी हैं। सामान्य मनुष्य,

उसके सुख-दुःख, मूल्य-क्षरण, महानगरीय जीवन-बोध, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही का सहज चित्रण इस समय ग़ज़ल में सामाजिकता भर रहा है-


जुबाँ है और बयाँ और उसका मतलब और अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा लुटेरे, डाकू भी अपने पे नाज करने लगे उन्होंने आज जो सन्तों का आचरण देखा


गोपालदास नीरज के यह शेर सामाजिक क्षरण को सुन्दरता से व्यक्त करते हैं।

पारम्परिक उर्दू ग़ज़ल की प्रेमविरहाभिव्यक्ति हिन्दी में आते-आते बड़ी यथार्थवादी हो जाती है, जैसा कि जावेद अख्तर कहते हैं-


लो देख लो ये इश्क है ये वस्ल है ये हिज्र


अब लौट चलें आओ बहुत काम पड़ा है।


राजनैतिक चित्रण भी हिन्दी ग़ज़ल के मिज़ाज में शामिल है। भारतीय राजनीति की तमाम विद्रूपताएँ, राजनेताओं की स्वार्थी और भ्रष्टाचारी वृत्ति, संसद और संसदीय तत्त्वों का अवमूल्यन,

खदर और मलमल की साँठगाँठ आदि बातों का जीवन्त चित्रण वर्तमान हिन्दी ग़ज़ल करती है-


काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में उतरा है रामराज विधायक निवास में पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में


अदम गोंडवी की इस ग़ज़ल ने न केवल नये भाषिक तेवर दर्ज किए हैं बल्कि भाव पक्ष की दृष्टि से भी नवीन संभावनाएँ व्यक्त की हैं। ठीक इसी प्रकार अर्थ जैसे नितान्त शुष्क मुद्दे पर भी हिन्दी ग़ज़ल बेबाक टिप्प्णी करती है।


भूख से मरता सामान्य आदमी, आर्थिक विषमता, पूँजीवाद का कसता पंजा आदि कई बातों पर हिन्दी ग़ज़ल टिप्पणी करती है-


लगी है होड़-सी देखो अमीरी और गरीबी में ये पूँजीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है। तुम्हारी मेज चाँदी की तुम्हारे जाम सोने के यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है।


दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनैतिक-आर्थिक संवेदनाओं को बेजोड़ तरीके से अभिव्यक्त करती हैं। मात्र इन्हीं संवेदनाओं को हिन्दी ग़ज़ल व्यक्त नहीं करती बल्कि इस समय जिन जीवन्त प्रश्नों से हम जूझ रहे हैं, उन बाज़ारवाद, पर्यावरण आदि को लेकर भी ग़ज़ल में समय-समय चेताया गया है। राजेश रेड्डी बाज़ारवाद को लेकर कहते हैं- ई-


काफिले लेके हर इक सिम्त चले सौदागर सारे संसार को बाज़ार बना कर छोड़ा इश्तहारों में जो थीं गैर ज़रूरी चीजें हमको उनका भी खरीदार बनाकर छोड़ा


संक्षेप में कहा जा सकता है कि संरचना और संवेदना दोनों ही दृष्टि से हिन्दी ग़ज़ल के मिज़ाज में कुछ ऐसी विशेषताएँ शामिल हैं जो हिन्दी ग़ज़ल को उर्दू ग़ज़ल से भिन्न, स्वतन्त्र रूपाकार के साथ स्थापित करती है।


भाषिक वैशिष्ट्य


हिन्दी ग़ज़ल ने वर्तमान समय में उर्दू ग़ज़ल से भिन्न अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बना लिया है।

संवेदना के स्तर पर जहाँ उर्दू ग़ज़ल हुस्न-ओ-इश्क में कैद अभिव्यक्ति देती रही, वहीं हिन्दी ग़ज़ल अनेकानेक समसामयिक विषयों पर मार्मिक टिप्पणी करती है। वर्तमान समय में जीवन्त बहस का विषय सिद्ध हो चुके प्रत्येक सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि मुद्दों पर हिन्दी ग़ज़ल ने सार्थक चर्चा छेड़ी है। कुछ तो अपने आधुनिक रूपाकार के कारण और कुछ वैविध्यपूर्ण संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने के कारण हिन्दी ग़ज़ल की भाषा अपने आप में कई विशेषताएँ समेटे हुए है। हिन्दी ग़ज़ल का भाषिक वैशिष्ट्य स्वतन्त्र चिन्तन का विषय है किन्तु यहाँ संक्षेप में उस पर विचार करने का प्रयास किया जाएगा।