हिन्दी ग़ज़ल परम्परा - Hindi Ghazal tradition
हिन्दी ग़ज़ल परम्परा को लेकर काफी मतभेद देखे जा सकते हैं। अधिकांश विद्वान् हिन्दी ग़ज़ल परम्परा का आरम्भ खड़ीबोली के प्रथम कवि अमीर ख़ुसरो से मानते हैं। अमीर खुसरो द्वारा रची गई ग़ज़लें अपने कथ्य, शब्द-संयोजन, प्रभाव आदि सभी दृष्टि से अद्वितीय कही जा सकती हैं। एक उदाहरण देखिए-
जब यार देखा नैन भर दिल की गई चिन्ता उतर ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाए कर जब आँख से ओझल भया तड़पन लगा मेरा जिया हक्का इलाही,
क्या किया आँसू चले भर लाए हैं तू तो हमारा यार है तुझ पर हमारा प्यार कर तुझ दोस्ती बिसियार है इक शब मिलो तुम आये कर जाना तलब तेरी करूं दीगर तलब किसकी करूँ तुमने जो मेरा मन लिया तुमने उठा ग़म को दिया तेरी जो चिन्ता दिल धरूँ, इक दिन मिलो तुम आये कर तुमने मुझे ऐसा किया जैसे पतंगा आग पर खुसरों कहें बातें ग़ज़ब दिल में न लावें कुछ अजब कुदरत ख़ुदा की है अजब, जब दिल दिया गुल लाय कर
हिन्दी में लिखी अमीर ख़ुसरो की ग़ज़ल के कुछ अश्आर पढ़कर यह कहने में कोई हर्ज नहीं मालूम होता कि हिन्दी ग़ज़ल परम्परा के आद्य ग़ज़लकार अमीर खुसरो हैं।
लेकिन इस बात को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद है । एक ओर हिन्दी ग़ज़ल परम्परा को ख़ुसरो से भी पहले के समय से जोड़ा जा रहा है तो दूसरी ओर, ठीक विपरीत मत व्यक्त करते हुए हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा को एकदम आधुनिककालीन बताया जा रहा है। दोनों पक्षों के अपने-अपने प्रमाण हैं। दोनों पक्ष इन प्रमाणों के आधार पर अपने मत को सही सिद्ध कर रहे हैं।
नित्यानन्द श्रीवास्तव हिन्दी ग़ज़ल परम्परा को खुसरो से भी पहले की बताते हुए कहते हैं- "अमीर खुसरो से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व विद्यमान महाकवि जयदेव की एक अष्टपदी में इस काव्य-विधा की तकनीक और अन्तर्वस्तु के स्पष्ट संकेत मिलते हैं।" वे जिस अष्टपदी के आधार पर यह बात कहते हैं, उस अष्टपदी के कुछ अंश द्रष्टव्य हैं-
जितकमलाकुचमण्डल घृतकुण्डल ए
कलितललित वनमाल जय जय देव हरे । दिनमणि मण्डल मण्डन भवखण्डन ए। मुनिजनमानसहंस! जय जय देव हरे ॥ कालिय विषधरगंजन जनरंजन ए यदुकुल नलिन दिनेश जय जय देव हरे ॥
इस उदाहरण के पश्चात् श्री नित्यानन्द श्रीवास्तव कहते हैं "इसी गीति-बन्ध में 'ग़ज़ल' के शिल्प की - पहचान की जा सकती है। जयदेव की इस रचना में 'काफ़िया' का ठीक-ठीक प्रयोग और नौवीं पंक्ति को छोड़कर शेष अष्टपदी में 'हुस्न-ए-मतला' की उपस्थिति दर्शनीय है। यह तो तय है कि इस गीतिबन्ध को भारतीय परिवेश में 'ग़ज़ल' नहीं कहा गया, फिर भी उसकी उपस्थिति इस सम्भावना को पुष्ट करती है कि इसके समरूप काव्य रूप भारतीय भाषाई परिवेश में आयातित और नये नहीं हैं।"
हिन्दी ग़ज़ल के कुछ विद्वान् आलोचक कबीर को हिन्दी का पहला ग़ज़लकार बताते हैं। उनकी एक ग़ज़ल देखिए-
हमन है इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या रहें आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या जो बिछड़े हैं पियारे से भटकते दर व दर फिरते न पल बिछुड़े पिया हमसे, न हम बिछुड़े पियारे से, उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से जो चलना राह नाजुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या
इसे एम.ए. गनी अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ़ द पार्शियन लैंग्वेज एट अ मुगल कोर्ट' में हिन्दी की पहली ग़ज़ल के रूप में स्वीकारते हैं। लेकिन ख़ुसरो,
कबीर को हिन्दी ग़ज़ल परम्परा में शामिल करना ही कुछ विद्वानों को मंजूर नहीं। हिन्दी के प्रसिद्ध गजलगो ज्ञान प्रकाश विवेक इस सन्दर्भ में लिखते हैं- "वस्तुतः हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा अमीर खुसरो या कबीर में ढूँढना हिन्दी के ग़ज़ल विद्वानों की कोई ग्रन्थि प्रतीत होती है। वे हर हाल में यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा, उर्दू ग़ज़ल की रिवायत से पहले की है।.... यदि हिन्दी ग़ज़ल की कोई परम्परा होती तो हिन्दी ग़ज़ल का पाँच सौ वर्षों का विकासक्रम स्पष्ट दिखाई देता, जिस प्रकार उर्दू ग़ज़ल में नज़र आता है। हिन्दी ग़ज़ल परम्परा बहुत बाद की है ......
अमीर खुसरो खड़ीबोली हिन्दी के आद्यकवि हैं अतः उनकी हिन्दी में लिखी ग़ज़ल को हिन्दी परम्परा का आरम्भ बिन्दु मानना जितना उचित है,
उतना ही विचारणीय यह मुद्दा भी है कि वास्तव में यदि हिन्दी ग़ज़ल प्राणवान् थी तो भारतेन्दु युग तक उसकी परम्परा में निरन्तरता क्यों नहीं रही, बहरहाल, यह निश्चित है कि हिन्दी ग़ज़ल का शंखनाद अमीर खुसरो और कबीर के द्वारा हो चुका है।
हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा भारतेन्दु निराला, हरिऔध, शमशेर, दुष्यन्त से आज तक अनवरत रूप से जारी है । भारतेन्दु के पिता गिरधरदास ने भी कुछ ग़ज़लें लिखीं जिन पर उर्दू ग़ज़लों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ग़ज़ल परम्परा को सही मायने में आगे बढ़ाया। उन्होंने 'रसा' और 'हरिश्चन्द्र' दो नामों के साथ ग़ज़लों का सृजन किया । 'तखल्लुस' के साथ ग़ज़ल लिखना, उनका ग़ज़ल के प्रति समर्पण दर्शाता है । प्रेमाभिव्यक्ति, ध्वन्यात्मक सौन्दर्य, लोच हर दृष्टि से भारतेन्दु की ग़ज़लें अद्वितीय कही जा सकती हैं-
दिल मेरा ले गया दग़ा करके बेवफा हो गया वफा करके वक्ते रूखसत जो आये वली पर खूब रोये गले लगा करके दोस्तों, कौन मेरी तुरबत पर रो रहा है रसा रसा करके
मक्ते में तखल्लुस का अप्रतिम प्रयोग कर भारतेन्दु ने उर्दू ग़ज़ल की सी परिपक्व हिन्दी ग़ज़ल का निर्माण किया। उर्दूमुहावरे से हटकर विशुद्ध हिन्दी में भी उन्होंने ग़ज़लों का निर्माण किया है-
वंशी बजा के हमको बुलाना नहीं अच्छा घर-बार को तो हमसे छुड़ाना नहीं अच्छा मिल जायेंगे हम कुंज में मौका जो मिलेगा गलियों में हमारे सदा आना नहीं अच्छा 'हरीचंद तुम्हारे ही हैं हम सभी तरह से यो अपने गुलामों को सताना नहीं अच्छा
इस ग़ज़ल में भारतेन्दु ने ग़ज़ल के हिन्दी मिज़ाज को परवान चढ़ाया है।
हिन्दी ग़ज़ल की सृजनधर्मिता और उर्दू की खूबसूरती का सुन्दर समन्वय भारतेन्दु की ग़ज़लों में पाया जाता है।
भारतेन्दु के पश्चात् स्वामी रामतीर्थ ने आध्यात्मिक संवेदना से भरपूर ग़ज़लें लिखीं। उनकी ग़ज़लों में देशभक्ति के स्वर भी गूँजते हैं। भाव वैविध्य से भरपूर स्वामी रामतीर्थ की ग़ज़लों को हिन्दी ग़ज़ल परम्परा का महत्त्वपूर्ण पड़ाव कहना होगा- -
न है कुछ तमन्ना न कुछ जुस्तजू हैं कि वहदत में साकी न सागर न बू है मिली दिल की आँखें जमी मारफत की जिधर देखता हूँ सनम रू-ब-रू है।
बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' की ग़ज़लें हिन्दी ग़ज़ल परम्परा में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं-
तेरे इश्क में हमने दिल को जलाया कसम सर की तेरे मजा कुछ न आया नज़र खार की शक्ल आते हैं सब गुल इन आँखों में जब से तू आकर समाया तुझे शेख जिसने बनाया है मोमिन हमें भी है हिन्दू उसी ने बनाया इसी दौर में प्रतापनारायण मिश्र, गोपाललाल गुल, श्रीधर पाठक आदि कई कवि अप्रतिम ग़ज़लें रच रहे थे। लाला भगवान 'दीन' की ग़ज़लें इन दिनों खासी लोकप्रिय हो गई थीं-
तुमने पैरों में लगाई मेहंदी
है हरी ऊपर मगर अंतस है लाल
मेरी आँखों में समाई मेहंदी है ये जादू की जगाई मेहंदी चुनरी से है सवाई मेहंदी 'दीन' को इस हेतु भायी मेहंदी
प्रस्तुत ग़ज़ल में हिन्दी शब्दों के प्रयोग के साथ ग़ज़ल की रचना ग़ज़ल को सौन्दर्य प्रदान करती है। द्विवेदी युग में मैथिलीशरण गुप्त और अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने भी ग़ज़लें रचकर हिन्दी ग़ज़ल को पुष्ट किया ।
छायावादी समय में निराला और प्रसाद ने एक से बढ़कर एक ग़ज़लें लिखीं। प्रसाद काफिया, रदीफ़, मतला और मक्ता की परिपाटी को निभाते हुए विशुद्ध हिन्दी शब्द प्रयोग के साथ ग़ज़ल लिखते हैं जो एक अद्भुत गंगा-जमनी संस्कृति का निर्माण करती हैं-
सरासर भूल करते हैं उन्हें जो प्यार करते हैं बुराई कर रहे हैं और अस्वीकार करते हैं उन्हें अवकाश ही कहाँ रहता है मुझसे मिलने का किसी से पूछ लेते हैं यही उपकार करते हैं न इतना फूलिए तरूवर, सुफल कोरी कली लेकर बिना मकरंद के मधुकर नहीं गुंजार करते हैं 'प्रसाद' उनको न भूलो तुम तुम्हारा जो प्रेमी है न सज्जन छोड़ते उसको जिसे स्वीकार करते हैं
निराला हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। निराला से पहले तक हिन्दी ग़ज़ल का मुख्य विषय बड़ा ही पारम्परिक रहा। प्रेम, विरह, शृंगार, समर्पण की कसकभरी अभिव्यक्ति हिन्दी ग़ज़ल में होती रही।
निराला पहले ऐसे ग़ज़लकार कहे जा सकते हैं जिन्होंने ग़ज़लों की विषयवस्तु में आमूलचूल परिवर्तन किये। निराला ने ग़ज़लों की भाषा के साथ भी कई प्रयोग किये। उन्होंने पहली बार विशुद्ध हिन्दी शब्दों के प्रयोग का मोह त्याग दिया। चुन-चुनकर हिन्दी शब्दों का प्रयोग करने की अपेक्षा हिन्दी-उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी में ग़ज़लें लिखना निराला ने अधिक श्रेयस्कर समझा। निराला की ग़ज़ल संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं को अधोरेखित करती रही -
आँख के आँसू न शोले बन गए तो क्या हुआ काम के अवसर न गोले बन गए तो क्या हुआ जान लेने को ज़मीं से आसमां जैसे बना काठ के कोठे न पोले बन गए तो क्या हुआ पेच खाते रह गए गैरों के हाथों आज तक पेच में डाले न चोले बन गए तो क्या हुआ नींद से जगकर बला की आफतों के सामने जी से घबराए न तोले बन गए तो क्या हुआ धार से निखरे हुए ऋतु के सुहाने बाग में आम भरने के न झोले बन गए तो क्या हुआ
दुष्यन्त ने हिन्दी ग़ज़ल को जिस रूपाकार में ढाला, उसकी प्रेरणा उन्होंने निश्चित रूप से महाप्राण निराला से ही पायी।
हिन्दी ग़ज़ल के आगामी पड़ाव पर त्रिलोचन और शमशेर बहादुर सिंह का नाम प्रधानता के साथ लेना होगा। त्रिलोचन की ग़ज़लों में निजी दुःख-दर्द की अभिव्यक्ति विशेष रूप से मिलती है-
ये दिल क्या है देखा दिखाया हुआ है- मगर दर्द कितना समाया हुआ है। मेरा दुःख सुना चुप रहे फिर वो बोले कि ये राग पहले से गाया हुआ है।
यही दर्द था जिसने तुमसे मिलाया ये यों ही नहीं जी को भाया हुआ है। त्रिलोचन सुनाओ हमें गान अपने जहाँ दर्द जी का समाया हुआ है।
"मैं हिन्दी और उर्दू का दोआब हूँ, मैं वो आईना हूँ जिसमें आप हैं" कहते हुए हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में अविस्मरणीय योगदान देनेवाले शमशेर बहादुर सिंह को हिन्दी ग़ज़ल परम्परा के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर कहना होगा। शमशेर ने 'शमशेरियत' के साथ ग़ज़लें रचीं ।
वही उम्र का एक पल कोई लाए तड़पती हुई-सी ग़ज़ल कोई लाए हक़ीकत को लाए तख़ैयुल से बाहर मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाए
शमशेर की ग़ज़ल समझने के लिए उर्दू ग़ज़ल का जानकार होना अत्यावश्यक है। शमशेर की ग़ज़लों में रूमानियत भी है और समय से दो हाथ करने का भाव भी हर तरह की संवेदना को समेटते शमशेर ने हिन्दी ग़ज़ल परम्परा को असीम संभावनाओं से परिपूर्ण बना दिया। दुष्यन्त का हिन्दी ग़ज़ल परम्परा में अविर्भाव इसी पृष्ठभूमि पर हुआ। दुष्यन्त तक आते-आते हिन्दी ग़ज़ल को अपनी राह मिल गई थी। दुष्यन्त ने हिन्दी ग़ज़ल परम्परा को एक अवर्णनीय ऊँचाई प्रदान की ।
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