डॉ. रामविलास शर्मा की हिन्दी नवजागरण और राष्ट्रीय विकास - Hindi Renaissance and National Development of Dr. Ramvilas Sharma

आधुनिक हिन्दी साहित्य के उद्भव और विकास को समझने के लिए हिन्दी नवजागरण की विशेषताओं और भारत के राष्ट्रीय नवजागरण के साथ उसके सम्बन्धों को समझना आवश्यक है। हिन्दी नवजागरण व्यापक भारतीय नवजागरण का अभिन्न अंग है। जातीय भाषा के रूप में हिन्दी के विकास का घनिष्ठ सम्बन्ध हिन्दी नवजागरण से है। उत्तर भारत में जब विभिन्न प्रदेशों में आधुनिक जातियों का गठन होता है और बोलचाल की भाषाओं में साहित्य की रचना होने लगती है तब नवजागरण की शुरूआत होती है। हिन्दी नवजागरण कई स्तरों में दीर्घ अवधि तक चलने वाली परिघटना है। डॉ. शर्मा के अनुसार इस नवजागरण के दो मुख्य दौर रहे हैं।

पहला दौर जातीय भाषा के रूप में हिन्दी के विकास तथा भक्तिकालीन साहित्य में अभिव्यक्त सामन्त-विरोधी चेतना के रूप में पूरा हुआ और दूसरा दौर 1857 के स्वाधीनता संग्राम से शुरू हुआ जो आगे बढ़ते हुए भारतेन्दु युग, द्विवेदी और छायावाद के रूप में चार चरणों में पूरा हुआ। तेरहवीं शताब्दी में जब व्यापारिक पूँजीवाद का विकास आरम्भ हुआ उसी समय से हिन्दी जाति का गठन भी आरम्भ हुआ। तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में अमीर ख़ुसरो की 'खालिस खड़ी बोली' की रचनाओं में जातीय भाषा के रूप में हिन्दी का विकास आरम्भ होता है। भक्तिकाल में कबीर, सूर, तुलसी और जायसी आदि की रचनाओं में यह बहुत शक्ति के साथ प्रकट हुआ।

डॉ. शर्मा के अनुसार यह सामन्त विरोधी नवजागरण है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में इसी नवजागरण की विरासत को संभालते हुए साम्राज्य-विरोधी और सामन्त-विरोधी नवजागरण आरम्भ हुआ। यह नवजागरण अंग्रेजी राज और उसके प्रभाव से पनपे नये सामन्तवाद के विरुद्ध था।


डॉ. शर्मा नवजागरण की प्रक्रिया को बहुस्तरीय और जटिल प्रक्रिया मानते हैं। इसे समझने के लिए सम्पूर्ण भारत के इतिहास को समझना आवश्यक है और भारतीय इतिहास हिन्दी प्रदेश के बिना अधूरा है।

हिन्दी प्रदेश के इतिहास को समझने के लिए पहले 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम का अध्ययन किया जाए फिर क्रमशः भारतेन्दु-युग, द्विवेदी-युग और छायावाद, विशेष रूप से निराला, के साहित्य का अध्ययन किया जाए। डॉ. शर्मा के अनुसार यह नवजागरण मुख्य रूप से जनता के साम्राज्यविरोधी संघर्ष की उपज था परन्तु इसमें सामन्तवाद का विरोध, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के प्रयत्न, परम्परा का नया मूल्यांकन अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष, बुद्धिवादी दृष्टिकोण का विकास तथा स्वच्छन्दतावादी और यथार्थवादी रचना प्रवृत्तियों का विकास शामिल था । वस्तुतः यह नवजागरण पूर्व के लोकजागरण की निरन्तरता में विकसित एक सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन था। हिन्दी नवजागरण की मूल प्रेरणा सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन लाना है।