ऐतिहासिक-सांस्कृतिक आलोचना - historical-cultural criticism
ऐतिहासिक-सांस्कृतिक आलोचना में साहित्य की समीक्षा युगीन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में की जाती है। इसमें युग और साहित्य की पारस्परिक सम्बद्धता पर ध्यान देते हुए यह देखा जाता है कि वे एक दूसरे को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। रचना में अन्तर्निहित सांस्कृतिक तत्त्वों की पहचान तथा उनके महत्त्व का उद्घाटन इस पद्धति की विशेषता है। हिन्दी में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी इस आलोचना पद्धति के आदर्श आलोचक हैं। उन्होंने अपनी आलोचना पुस्तक 'हिन्दी साहित्य की भूमिका' में इस दृष्टि को स्पष्ट करते हुए साहित्य के मूल्यांकन मैं क्रमागत सामाजिक,
सांस्कृतिक और जातीय सातत्य को दृष्टिगत रखने की अनिवार्यता प्रतिपादित की है। उनके अन्य आलोचना-ग्रन्थ भी उनकी इस समीक्षा-दृष्टि की पुष्टि करते हैं।
पण्डित विश्वनाथ मिश्र और आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने भी ऐतिहासिकसांस्कृतिक आलोचना के विकास में योगदान दिया है। पण्डित विश्वनाथ मिश्र ने 'भूषण ग्रन्थावली' और परशुराम चतुर्वेदी ने 'उत्तरी भारत की सन्त परम्परा' में ऐतिहासिक दृष्टि से कवियों का मूल्यांकन किया है।
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