आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की इतिहास-दृष्टि - Historical view of Acharya Ramchandra Shukla
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ज्ञान की भारतीय और पाश्चात्य परम्पराओं का गम्भीर अध्ययन किया था । उन्होंने अपने समय की रचनाशीलता का मूल्यांकन किया और अपनी प्रतिभा और स्वतन्त्र चिन्तन के आधार पर हिन्दी में एक सुसंगत साहित्य-दृष्टि का विकास किया। उनकी साहित्य-दृष्टि की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें परम्परा के रूढ़िवादी पक्षों का तिरस्कार और व्यक्तिवाद का विरोध है। उन्होंने साहित्य में सामन्ती प्रवृत्तियों की निन्दा की है तथा लोकजीवन और जनतान्त्रिक मूल्यों को अभिव्यक्त करने वाले साहित्य का पक्ष लिया है।
आचार्य शुक्ल की इतिहास-दृष्टि के विकास में भारतीय नवजागरण और राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
उनकी सामन्तवाद विरोधी चेतना के निर्माण में भारतीय इतिहास के इन दोनों चरणों के साथ-साथ भक्तिकालीन साहित्य का महत्त्वपूर्ण योगदान है। शुक्ल जी ने रहस्यवाद का विरोध किया है। दार्शनिक रूप से भाववादी होकर भी उनके चिन्तन में वैज्ञानिकता है। उनका दृष्टिकोण विकासवादी है। सुसंगत भौतिकवादी न होते हुए भी उनकी विचारधारा भौतिकवाद का समर्थन करती है। यह जानना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि शुक्ल जी ने साहित्य के विवेचन और मूल्यांकनमें उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि को हमेशा ध्यान में रखा है। उनके इतिहास - बोध की यह उल्लेखनीय विशेषता है।
'हिन्दी साहित्य का इतिहास' के आरम्भ में शुक्ल जी अपनी इतिहास दृष्टि को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं।
कि "जब कि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है, तब यह निश्चित हैं कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य परम्परा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही 'साहित्य का इतिहास' कहलाता है।" अर्थात् साहित्य के विकास का जनचेतना के विकास से निश्चित सम्बन्ध होता है। कभी साहित्य की अन्तर्वस्तु और रूप-रचना को सामाजिक परिस्थितियाँ निर्धारित करती हैं और कभी साहित्य सामाजिक परिस्थितियों का निर्धारण करता है।
इसी द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया से साहित्य का विकास होता है। इसलिए आलोचक और साहित्येतिहासकार के लिए साहित्य की सामाजिक पृष्ठभूमि पर विचार करना भी आवश्यक होता है। शुक्ल जी लिखते हैं कि "जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनैतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है। अतः कारणस्वरूप इन परिस्थितियों का दिग्दर्शन भी साथ ही आवश्यक होता है।"
शुक्ल जी की मान्यता है कि साहित्यकार को देश काल की सामाजिक परिस्थितियों का ज्ञान होना आवश्यक है। इस ज्ञान के अभाव में उसका लेखन कल्पना का खेल मात्र रह जाएगा, जनता की चित्तवृत्तियों का प्रतिबिम्ब नहीं बन सकेगा।
शुक्ल जी ने अपने इतिहास-बोध और आलोचनात्मक अन्तर्दृष्टि से न केवल हिन्दी साहित्य का सुव्यवस्थित इतिहास लिखा, बल्कि उस साहित्य का मूल्यांकन किया तथा आलोचना और साहित्येतिहास की भावी दिशा का निर्देश भी किया।
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