काव्य में मानवीय भूमि - human land in poetry

जयशंकर प्रसाद काव्य में रचनात्मक यथार्थ को स्वीकार तो करते हैं, लेकिन वे इस मत को भी उतनी दृढ़ता के साथ स्थापित करते हैं कि यथार्थ आदर्श को भी साथ लेकर चले और मानवीय भूमि ही अन्ततः काव्य- सृजन का आधार बने । काव्य में मानवीय भूमि को लेकर वे साहित्य की स्वतन्त्र हैसियत पर काफी बल देते हैं. तथा किसी नियम या आदेश को इसकी स्वतन्त्र रचनात्मक प्रक्रिया पर हस्तक्षेप स्वीकार करते हैं। मानवीय सरोकार को लेकर प्रसाद किसी वाद के भी पक्षधर प्रतीत नहीं होते हैं, क्योंकि वे सभी तरह के विचारों के बीच सन्तुलन एवं समन्वय के समर्थक हैं।


अपने काव्य-चिन्तन में प्रसाद ने शैव दर्शन के प्रत्यभिज्ञा दर्शन की मान्यताओं का भी समावेश किया है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन में समरसता सिद्धान्त का विशिष्ट स्थान है। आचार्य अभिनवगुप्त ने समरसता की व्याख्या करते हुए लिखा है कि "आनन्द शक्ति विश्रांते योगी समरसौ भवेत ।" अर्थात् आनन्द शक्ति में विश्रांति पाने पर योगी समरस हो जाता है । यही स्थिति काव्य-सृजन में रचनाकार की होती है। वस्तुतः यह समरसता की स्थिति अभेदतत्त्व यानी कि शिवत्व की स्थिति है तथा यह विषमता की स्थिति से पूरी तरह भिन्न है। विषमता में द्वन्द्व बने रहते हैं जबकि समरसता में द्वन्द्व पूर्णतः समाप्त हो जाते हैं।

इसलिए कवि आलोचक प्रसाद यहाँ यह भी स्थापना करते हैं कि समरसता में पहुँचे हुए व्यक्ति को हानि-लाभ, जय-पराजय, सुख-दुःख, जीवन-मरण, यश-अपयश की प्रतीति अलग-अलग न होकर एक ही रूप में होती है।


प्रसाद विषमता की महत्ता को भी प्रतिष्ठित करते हैं, क्योंकि समरसता से पूर्व की स्थिति विषमता की है। यह विषमता भी उस चिति या भूमा से ही उत्प

न्न है और मानव जीवन के लिए अनिवार्य भी है। चूँकि विषमता में लीन रहकर ही संसार क्रियाशील एवं गतिशील रहता है। इसलिए विषमताओं के न होने पर संसार की सम्पूर्ण सक्रियता समाप्त हो जाती है। इस सन्दर्भ में उन्होंने साहित्य-सृजन के प्रत्येक क्षेत्र में समरसता की स्थापना पर बल दिया है और इस दार्शनिक विचारधारा को मानव जीवन के निहितार्थ काव्य-सृजन के अनुरूप व्यावहारिक बना लिया है।


कवि आलोचक जयशंकर प्रसाद ने आनन्द पथ की ओर जाने वाले जीवात्मा के लिए उन सभी बातों का भी संकेत किया है जिनके कारण सहज ही आनन्द मानवीय आधार भूमि तक पहुँचा जा सकता है।

इसके लिए वे सर्वप्रथम जीवात्मा को प्रकृति की भाँति निरन्तर कर्मशील रहने के लिए अभिप्रेरित करते हैं। क्योंकि, अन्ततः कर्मशील रहकर ही इस संसार में आनन्द प्राप्त किया जा सकता है-


कर्म का भोग, भोग का कर्म,


यही जड़ का चेतन आनन्द ।


(- कामायनी)


इस प्रकार जयशंकर प्रसाद अपने काव्य-विवेचन में प्रत्यभिज्ञा दर्शन की आनन्दवादी विचारधारा को मानवीय भूमि के निहितार्थ सरस और व्यवहारिक रूप देकर प्रस्तुत करते हैं।