प्रगतिवादी साहित्य का वैचारिक आधार - ideological basis of progressive literature

प्रगतिवादी काव्य पर मार्क्सवादी चिन्तनधारा का प्रभाव


बाबू गुलाबराय की वाणी में "कवि या लेखक अपने समय का प्रतिनिधि होता है। उसको जैसा मानसिक खाद मिल जाता है वैसी ही उसकी कृति होती है। वह अपने समय के वायुमण्डल में घूमते हुए विचारों को मुखरित कर देता है । कवि वह बात कहता है जिसका सब लोग अनुभव करते हैं, किन्तु जिसको सब लोग कह नहीं सकते । सहृदयता के कारण उसकी अनुभव-शक्ति औरों से बढ़ी चढ़ी रहती है।" 13


यदि रचनाकार केवल कला का ही चित्रण करना चाहेगा तो वह अपने समाज से अस्पृष्ट कैसे रहता है ?

वह अपनी सामयिक परिस्थितियों से गम्भीर प्रेरणा ग्रहण करता है। यह सत्य है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। । कुछ आलोचक साहित्य को मनोरंजन का साधन मानते हैं जो उचित प्रतीत नहीं होता है। साहित्य-प्रेमी रसिकों की भर्त्सना करते हुए डॉ० रामविलास शर्मा ने ठीक ही कहा है कि "यदि रसिकगण दर्पण में अपना ही प्रतिबिम्ब देखना चाहते हैं तो उन्हें साहित्य की परिभाषा बदल देनी चाहिए। तब कहना चाहिए कि साहित्य वह दर्पण है जिसमें समाज के इन विशेष लोगों की ही शक्ल दिखाई देती है जो दुपल्ली टोपी लगाए, पान खाए, सुरमा रचाए इस दुनिया से दूर नायिका भेद के संसार में विचरण करते हैं।

इन साहित्य-मर्मज्ञों के हृदय इतने सहृदय हो गए हैं कि जिस बात से चालीस करोड़ जनता के हृदय को ठेस पहुँचती है, वह उनके मर्म को छू भी नहीं पाती। उनका कुसुम- कोमल हृदय नकली गर्मी से उगने वाले पौधे की तरह एक कृत्रिम साहित्य की उत्तेजना पाकर ही विकसित होता हैं। ये लोग कहें तो ठीक ही होगा कि लेखकों को जनता से दूर ही रहना चाहिए। 14


इस प्रकार साहित्य और समाज एक-दूसरे को अविराम प्रभावित करते आ रहे हैं। संसार के समस्त परिवर्तनों के मूल में कोई न कोई चिन्तनधारा कार्यशील रही है।

इस विचारधारा का वर्णन साहित्य द्वारा होता है। वही हमारे ज्ञान क्षेत्र को विस्तृत करता हुआ हमें मौजूदा व्यवस्था के प्रति असंतोष उत्पन्न करता है। फ्रांस की प्रसिद्ध राज्य क्रान्ति में बाल्तेयर और रूसो के क्रान्तिकारी विचार ही प्रेरणास्रोत थे। रूसी लेखकों की उग्रवादी विचारधारा ने रूस की राज्य क्रान्ति को तीव्र किया। वस्तुतः तत्कालीन समाज साहित्य को प्रभावित करता है। साहित्यकार का सम्बन्ध वर्तमान से ही न होकर अतीत और भविष्य भी होता है।


हिन्दी साहित्य में छायावाद के युग के पतन के बाद नयी आशाएँ और अपेक्षाएँ लिए प्रगतिवाद युग का पदार्पण होता है। महादेवी वर्मा की वाणी में "वह व्यष्टि सत्य की समष्टिगत परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहा । "15 साथ ही पन्त ने छायावाद के पतन और हास को रेखांकित करते हुए लिखा है "छायावाद के शून्य सूक्ष्म आकाश में अतिकाल्पनिक उड़ान भरने वाली अथवा रहस्य के निर्जन अदृश्य शिखर पर विराम करने वाली कल्पना को जनजीवन का सच्चा चित्र अंकित करने के लिए एक हरी-भरी ठोस जनपूर्ण धरती की आवश्यकता थी।" 16