बिम्ब-विधान - imagery
बिम्ब एक तरह के शब्द चित्र होते हैं। वे पाठक के मन में किसी विशेष चित्र या भाव या विचार को मूर्तिमान करते हैं। यानी वे पाठक के ऐन्द्रिय बोध को जगाने का प्रयत्न करते हैं। बिम्ब के निर्माण के लिए बाहर के वस्तु जगत् से प्रत्यक्ष सम्बन्ध और कल्पना का होना आवश्यक है। बिम्ब के इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए केदारनाथ सिंह ने उसे परिभाषित करते हुए कहा है "बिम्ब वह शब्दचित्र है जो कल्पना के द्वारा ऐन्द्रिय अनुभवों के आधार पर निर्मित होता है।" इस परिभाषा से स्पष्ट है कि बिम्ब शब्दों के माध्यम से बनाये गए चित्र हैं और उनके निर्माण के लिए कल्पना और ऐन्द्रिय अनुभव का होना अनिवार्य है।
ऐन्द्रिय अनुभव के लिए बाहरी संसार से प्रत्यक्ष रागात्मक सम्बन्ध का होना एक अनिवार्य शर्त है। यह रागात्मक सम्बन्ध जितना गहरा और ठोस होगा बिम्ब निर्माण और उसके ग्रहण में सफलता उतनी ही ज्यादा मिलेगी। इसका अर्थ यह भी है कि किताबी ज्ञान अथवा अन्तर्दृष्टि के आधार पर बिम्ब का निर्माण नहीं किया जा सकता है और ना ही किताबी ज्ञान और अन्तर्दृष्टि के आधार पर बिम्ब को ग्रहण ही किया जा सकता है। अतः बिम्ब के निर्माण और उसके ग्रहण के लिए आवश्यक है कि बाहरी संसार के साथ कवि और पाठक का सम्बन्ध प्रत्यक्ष और गहरा हो ।
बिम्ब को शब्दचित्र अथवा मूर्त कहने का यह अर्थ नहीं है कि उसका सम्बन्ध सिर्फ़ दृश्यता से ही होता है। दृश्यता तो बिम्ब का एक प्रकार मात्र है। वह बिम्ब का एक स्थूल छोर मात्र है जबकि बिम्ब का दूसरा छोर बेहद सूक्ष्म होता है। कवि की अनुभूतियाँ अमूर्त और निजी होती हैं। वह अपनी अनुभूतियों को सार्वजनिक करना चाहता है यानी अपने पाठकों तक पहुँचाना चाहता है। इसके लिए वह भाषा को माध्यम के रूप में चुनता है। कवि भाषा में अपनी अनुभूतियों की पुनर्रचना करता है।
उसकी निजी अनुभूतियाँ एक सार्वजनिक माध्यम (भाषा) में आकार ग्रहण करती हैं। वह अपनी अनुभूति अथवा संवेदना को भाषा में मूर्त करता है। बिम्ब को मूर्त कहने का आशय भी यही है। बिम्ब का सम्बन्ध मनुष्य की पाँचों इन्द्रियों से होता है जिसके माध्यम से वह बाहर की दुनिया को जान, समझ और महसूस कर पाता है। अर्थात् दृश्यता के साथ-साथ स्वाद, स्पर्श, गन्ध और श्रवण का भी बिम्ब-निर्माण से गहरा सम्बन्ध होता है। यदि शब्दचित्र पाठक के मन में स्वाद, गन्ध, स्पर्श और श्रवण से सम्बन्धित ऐन्द्रिय बोध को जगाने में सफल होता है तो वह भी बिम्ब के ही श्रेणी में माना जाता है। इन्हीं पाँच इन्द्रियों के आधार पर बिम्ब को पाँच भागों में बाँटा जाता है दृश्य बिम्ब,
ध्वनि बिम्ब, स्पर्श बिम्ब, स्वाद बिम्ब और प्राण (गन्ध) बिम्ब । केदारनाथ सिंह की कविता में इन बिम्बों के उदाहरण भरे पड़े हैं। विषय के आधार पर भी बिम्बों के अनेक प्रकार किये जा सकते हैं। आपके पाठ्यक्रम में संकलित 'चींटियों की रुलाई' शीर्षक कविता के उदाहरण से बिम्बों के इन भेदों को समझा जा सकता है-
सुनो, आज सुबह उठा तो आसमान मेरी खिड़की से इस तरह दिखा जैसे वह भोंपू की आवाज़ हो जैसे वह आता हुआ वायुयान हो
जैसे कोई तौलिया सूख रहा हो
कौवे की आवाज़ ऐसी सुनाई पड़ी
एक जाता हुआ वायुयान ऐसा लगा
मेरी तरफ !
इस काव्यांश में आसमान का सूखने के लिए डाले गए तौलिये की तरह दिखना दृश्य बिम्ब का उदाहरण है जबकि कौवे की आवाज़ भोंपू की तरह सुनाई देना ध्वनि बिम्ब का उदाहरण है और जाते हुए वायुयान हुए वायुयान की तरह लगना गतिज बिम्ब का उदाहरण है।
यहाँ यह भी ध्यान देना चाहिए कि ये सारे बिम्ब सादृश्य धर्म के कारण उपमान के रूप में प्रयुक्त हुए हैं और शहर के विडम्बनापूर्ण जीवन की ओर संकेत करते हैं।
काव्य में बिम्ब-निर्माण की प्रवृति आधुनिककाल की देन है। आधुनिक कवि अपने काव्य में बिम्ब- निर्माण के लिए सचेत रूप से प्रवृत हुए। अतः आधुनिक कविता में बिम्ब की उपयोगिता पर विचार करना भी समीचीन है। कविता में बिम्ब भाव की ग्राह्यता और सम्प्रेषणीयता को बढ़ाते हैं।
वे काव्य में मौलिक अनुभूति को तीव्रतर करते हैं। बिम्ब किसी अनुभूति को मात्र प्रतिबिम्बित ही नहीं करते हैं अपितु उसे एक नये स्तर पर पुनर्निर्मित भी करते है। वे सिर्फ़ विचारों और भावों का वहन ही नहीं करते हैं अपितु सूक्ष्मता से पढ़ा जाए तो उन विचारों और भावों के पीछे की सम्पूर्ण उलझनों और संघर्षो को भी सूचित करते हैं। इतना ही नहीं, बिम्ब भाषा को संक्षिप्त, केन्द्रित और संगठित भी करता है। इसका मूल कारण यह है कि बिम्ब सन्दर्भ सापक्ष होते हैं। इससे भाषा अर्थवान् और पारदर्शी बनती है। बिम्ब अक्सर अपने अर्थ के लिए लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्तियों का प्रयोग करते हैं। वे काव्य में शब्दों के अपव्यय को रोकते हैं और गागर में सागर भरने की पुरानी युक्ति को आधुनिक युग में चरितार्थ करते हैं।
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