भारतेन्दुयुगीन आलोचना - Indian-era criticism

भारतेन्दु-युग हिन्दी आलोचना के उद्भव का कालखण्ड था। पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित समीक्षाओं और लेखों में आधुनिकता के अंकुर फूट रहे थे। हिन्दी आलोचना का आरम्भ हो रहा था।


सन् 1857 के स्वतन्त्रता संघर्ष के पश्चात् भारत की जनता और रियासतों के लिए सम्मान और अधिकारों के पक्ष में महारानी विक्टोरिया की घोषणा से शिक्षित और उच्च वर्ग में तो देश के आर्थिक विकास और सामाजिक सुधारों के प्रति उम्मीदें बढ़ी, लेकिन आम जनता में अंग्रेज़ी शासन के प्रति अविश्वास की भावना बलवती हुई।

देश की स्वतन्त्रता के लिए लोगों में नयी आशा का संचार हुआ। इस सामाजिक द्वन्द्व की स्थिति में हिन्दी साहित्य ने युगीन आवश्यकताओं को समझते हुए नयी रचनाशीलता के साथ सामाजिक यथार्थ में हस्तक्षेप किया । हिन्दी साहित्य में आधुनिक चेतना और यथार्थ से प्रेरित नाटक, कविताएँ, उपन्यास, निबन्ध और आलोचना की शुरूआत हुई।


भारतेन्दु-युग राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जागृति का युग था । भारतीय जनता में बौद्धिकता और तार्किकता का प्रसार होने लगा था। वैज्ञानिक आविष्कारों की जानकारी और शिक्षा के प्रसार ने राष्ट्रीय चेतना को बढ़ाया।

इस राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक संघर्ष की अभिव्यक्ति हिन्दी साहित्य में होने लगी । आधुनिकता और वैचारिकता की अभिव्यक्ति के लिए गद्य का अभूतपूर्व विकास हुआ और वह साहित्य की लोकप्रिय विधा बन गया । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसीलिए आधुनिक युग को गद्य युग कहा है। गद्य के विभिन्न रूपों के उद्भव के साथ ही उनके प्रकाशन के लिए पत्र-पत्रिकाओं की आवश्यकता अनुभव की गई और 'कविवचन सुधा', 'हरिश्चन्द्र मैगजीन' (आठ अंकों के बाद 'हरिश्चन्द्र चन्द्रिका'), 'बाला बोधिनी', 'हिन्दी प्रदीप', 'ब्राह्मण', 'आनन्द कादम्बिनी',

'सार सुधानिधि', 'भारत मित्र' आदि अनेक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगीं। इस युग की आलोचना में पुस्तक समीक्षाओं की अधिकता है। इसका विकास पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों, टिप्पणियों और स्वतन्त्र पुस्तिकाओं के रूप में हुआ। यह आकस्मिक नहीं है कि इस युग की आलोचना में रचना के गुण-दोषों के विवेचन के साथ-साथ कृति के सामाजिक सन्दर्भों की परख भी मिलती है। वस्तुतः आधुनिक हिन्दी आलोचना का जन्म समकालीन साहित्य को समझने और उसकी सामाजिक भूमिका पहचानने की प्रक्रिया में ही हुआ है।